माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंविचारवान् पुरुष संसारके यावन्मात्र दुःखोंको उसी क्षण भूल जाता है जब
अपने प्राणनाथ प्रभुका नाम प्रेमपूर्वक उसके कर्णरन्ध्रोंके द्वारा हृदयके अन्दर
पहुँचकर अपना निवास बना... ॥
ओ नाथ! फिर, जब आप स्वयं मेरे पास पधारे तब फिर मुझे किसी भी बात
का अंदेशा या संशय भला क्यों हो, इस बात को जाने दो, मुझे केवल यह बता
कृपा करो कि इस संसार में जिस बात को सब लोग भला या बुरा कहते हैं वह
भला बुरा वस्तुतः है, या नहीं? संसार केवल भ्रम ही भ्रम प्रतीत होता
है, प्रभु इस भ्रम को दूर करो जिससे मुझे न संशय रहे, जिससे कि मैं सुखी होऊँ! यह
सब बात सुनकर
प्रभु ने कहा, 'तात!
जो बात प्रभु ने कही वह तो परम रहस्य थी जिसे केवल ज्ञानी पुरुष ही
समझ सकते हैं। हे भरद्वाज, इस बातको समझकर जो सो रहा है वह जागेगा
कि जो कुछ ज्ञान दृष्टिसे अथवा पंच ज्ञानेन्द्रियों और मन के द्वारा इस संसार
विषयक जो कुछ भी रूप रंग या गुण दोष दीख पड़ता, या अनुभव में आता प्रतीत
होता ऐसा है? प्रभु बोले?
सुनो हे तात, जैसे स्वप्न संसार मिथ्या होता है उस दशा, ज्ञान दशा में सत्य
रूप में भास हो रहा है! जाग्रत दशा में ही, स्वप्न दशा मिथ्या हो कर नष्ट हो
जाती है। स्वप्नकाल में जाग्रत संसार मिथ्या हो जाता है, जब स्वप्न समाप्त हो जाता
तब, जाग्रत! संसार का सत्य रूप सामने उपस्थित! होता है। वास्तव में देखा
जाये तो दोनों दशाएं एक-दूसरे को नष्ट कर रहीं हैं! इन दोनों से परे जो आत्मा है, वही सत्य
है। वह, आत्माही परमार्थ रूप से सत्य स्वरूप, अपने आपको भूलने पर ही
यह मोह या अविद्या रूपी संसार सत्य सा भास होता, जिससे यह प्रतीत हुआ, कि मन ही
कारण है सुख या दुःखको उत्पन्न कर देने वाला या बनाने में निमित्त? कदापि! नहिं मन
तो केवल एक साधन मात्र ही इस जग प्रपंच को रचने वाला
सो यह बात यथार्थ सत्य रूप सिद्ध हो कर प्रकट हुई कि जीव, जिसे भ्रम हो रहा है
इस बात का कि वह स्वयं दुख रूप तथा इस बात को भी जान चुका कि आत्मा सर्वदा
सुख ही सुख है। सो इस से यह सिद्ध हुआ कि जीव भी भ्रम के कारण इस
संसार में या दुःख में फंसा हुआ प्रतीत हो रहा है, जो अविद्या ही का कार्य है।
इस लिए केवल आत्म-अनुसन्धान ही, अविद्या को दूर करने का एक मात्र उपाय
हुआ अतः सर्वदा-सर्वकाल में, केवल उस एक, अपनी स्वरूप निष्ठा रूपी ही
सत्य में ही लीन रहने रूपी प्रयत्न ही सब को कल्याण कर देने के उपाय में श्रेष्ठ
रूप सिद्ध हुआ। क्योंकि सुख तो अपना रूप, अविद्या जन्य संशय, भ्रान्ति रूपी
इस संसार में केवल भ्रम ही भ्रम दृष्टिगोचर होता रहता है। प्रभु के मुखारविन्द से इस
बात को सुन कर सब श्रोतागण अति प्रफुल्लित हो, अपने स्वरूप को ही सत्य समझ, उस ओर
ही लीन हुए, सबने ही प्रभुके इस परम रहस्य युक्त वचनकी भूरि भूरि
ही सराहना की। प्रभु का कहना था कि अविद्या रूपी भ्रम, मनुष्य जिसके वशीभूत हो
कर इस संसार सम्बन्धी, सब बातों को सत्य समझ? के सुख और, दुःख पाता रहता
है। वस्तुतः, भ्रम और मन से परे आत्मा रूपी केवल आनन्द ही आनन्द
मात्र ही तो है? जब इस बात का निश्चय पूर्ण रूप से मन में दृढ़ता पूर्वक हो गया
तो फिर? प्रभु के इस उपदेश से सब लोग जो उस समय एकत्र थे तृप्त होकर परम आनन्द को,
प्राप्त हो गये, भगवान् रामचन्द्र जी की जय जय ध्वनि से गगन, उस समय
गुंजायमान होने लगा, अनेक प्रकार के वाद्य उस समय बजने लगे!
इस प्रकार विचार कर संसार से परे उस परमात्मा को ही सबने अपना जीवन का
मुख्य ध्येय बना कर निश्चय किया, सो ही इस संसार में सब बातों से बड़ा कर्तव्य
सब जीवों का परम कल्याण कर सकता जिससे जीव मुक्त होकर, परमेश्वर स्वरूप,
सनातन स्वरूप, सर्वव्यापक सच्चिदानन्द घन को प्राप्त करने का यत्न कर सके।
हे भरद्वाज जी, भगवान् रामके परम पद, उस दिव्य रूप को जो कोई भक्त निरन्तर अपने
मन ध्यान द्वारा, प्रेमपूर्वक धारण करता रहेगा, उस व्यक्ति विशेष रूपी सब
संसार सागर से पार निकल जाना, केवल भगवान् रामके चरणोंमें ही मन लगाने
मात्रसे सहज होगा।
केवल दो ही अवस्था हैं संसार में, अज्ञान रूप तो, यह जग है, और एक मात्र
भगवान् ही स्वरूप रूपी कैवल्य, केवल रूपी ज्ञानका, ही नाम है। जिस को
जान कर मनुष्य मुक्त