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क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)

DevanagariHindipublished73 पृष्ठ

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जब भगवान् का सम्बन्ध ही अपने स्वरूप जैसा है तो जीवात्मा का अन्य सम्बन्ध
संसार से अथवा शरीर से अथवा अपने सिवाय अन्य किसी से, अर्थात् ईश्वर से भिन्न से
तो मानना केवल भ्रम
मात्र ही समझना चाहिये और यह जानना ही सर्वथा सत्य है।
स्वयं तो सर्वेश्वर सब प्रकार समर्थ ही ठहरे तो अस्वाभाविक रूप
अर्थात् 'स्व' का सम्बन्ध या त्याग रूप जो 'जीव' का सम्बन्ध अथवा भाव 'जीव' रूपी
अहंता को लिये 'जीव' स्वरूप मानना अथवा उस 'जीव' का जो अज्ञान रूप सम्बन्ध सत्य रूपी
स्वीकार या 'स्व' रूप हो ही नहीं सकता, तो 'स्व रूप' का त्याग रूप विकार सर्वथा असत्य रूप
'जीव' रूप का सम्बन्ध 'अस्वाभाविक' हुआ।
अतः शुद्ध, सच्चिद् रूप तत्व-का स्वरूप कभी भी नष्ट या विकार युक्त या सीमित
हो ही नहीं
सकता इन सब बातों अर्थात्; 1 सर्व प्रकार समर्थता- सर्वसमर्थतायुक्तता,; 2 सब
प्रकार व्यापक- सर्वव्यापकयुक्तता, से; 3 सब प्रकार नियन्त्रण- सर्वनियन्त्रणयुक्तता
युक्त होना स्वाभाविकता- सर्वेश्वर का रूप ही ठहरा सब से विचार-सम्मत ही भगवान्
रूप स्वरूप अथवा ईश्वर-तत्त्वरूप- विचार-सम्मत ही सब से ही माना जा रहा सब
की समझ से सर्वेश्वर सब प्रकार सर्व समर्थतायुक्त- विचार-सम्मत ही सब की
समझ स्वीकार हो ही स्वाभाविकता है।
स्वयं का अनुभव या ज्ञान स्वाभाविकता से पृथक् कभी नहीं हो ही नहीं
रहा, वास्तविकता सब का स्वयं सब प्रकार से सब ही परमात्मा सत्य-ही सिद्धतापूर्वक
स्वाभाविकता सब ही को समझ आती रही, किसी को किसी भी परिस्थिति रूप में भी
भिन्न कभी स्वाभाविकता सब प्रकार सब ही भगवान् सम्बन्धी रही।
जिसे हर हालत में सब स्वाभाविकतापूर्वक ही स्वीकार करते रहते सब ही जीवात्मा
तो सब स्थिति में।
060/ विचार-सम्मतता
वास्तविकता से, किसी विषय वस्तुका या सब सब सब सब का सब होना या
सब का सब सब सब आधार सब सब सब वास्तविकता सब ही सब का होना या हो ही
हो ही रहना सब ही का, सब सब सब सब रूप से सत्य ही सब कुछ सर्वथा सत्य रूप
ही तो ठहरा सब का, तो सत्य सब सब का स्वरूप केवल ही, ही ही केवल स्वाभाविकता
ही रूप केवल ही ठहरा सब, सब सब सत्य रूप से स्वाभाविकता ही सब सब
सब स्वरूप सब प्रकार सब प्रकार का ही ठहरा सब प्रकार स्थिति अनुसार
ही! सब स्वाभाविकता सब सब ठहरा हुआ, तो सत्य स्वाभाविकता ही सब प्रकार सत्य रूप
स्वरूप ही सिद्ध प्रकार से ही सत्य स्वरूप स्वाभाविकता ही आधार सब सब ही या
हो सिद्ध ही सिद्ध सब सब ही सर्वसमर्थतापूर्वक सब ही प्रकार सब स्वरूप ही
रूप स्वाभाविकता सब प्रकार ही हो सब प्रकार सब ही प्रकार ही स्वाभाविकता ही स्वरूप
ही ही रहा! सत्य स्वरूप ही ठहरा सब, तो केवल मात्र ही सत्य सत्य ही सत्य
सब सत्य ही सब प्रकार ही हो सब का स्वरूप ही ठहरा- रूप ही सिद्धता
से सत्य रूप सब स्वरूप ही सत्य ही प्रकार से ही ही सब प्रकार स्वरूप
सत्य ही सब प्रकार ही तो स्वरूप सब का सत्य रहा न? भगवान् ही सब ही सत्य
सत्य ही सब सब का, स्वाभाविकता ही सब ही सब ही सब
सत्य सिद्ध स्वरूप सत्य रहा न?
भगवान् ही सब प्रकार सब ही सत्य स्वरूप सब का 'स्व' रूप सत्य स्वरूप
सब स्वाभाविकता सब की, सब स्वरूप सब की सब प्रकार रूप केवल भगवान् स्वरूप
रूप ही, तो सत्य ही सब रूप भगवान् ही सब सब प्रकार ही तो स्वरूप ही सब का
हो सिद्ध ही सिद्ध रूप ही ठहरा सब ही का 'भगवान्' रूप स्वरूप ही सब का' सत्य
स्वरूप 'स्व, सच्चिदानन्द रूप ही सब प्रकार स्वरूप सिद्ध हुआ।'
सब सब सब सब का ही सब ही सब का सब कुछ सत्य सब भगवान् ही सब का ही
रूप माता-पिता रूप से सर्व-रूपों में विचार-सम्मत ही सत्य सर्व-रूपों में सब का
सब सब ही हो रहा सब, सत्य स्वरूप सब ही ठहरा सब प्रकार से सब सब सब
स्वरूप सत्य सर्व रूप सर्व प्रकार से स्वाभाविकता सब स्वाभाविकता ही सब रहा।
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महाराज के पास जब- दो तीन सिपाही गये और यह बात उन लोगों ने राजा से
कही 'महाराज उस को सब लोग मार-पीट करके निकाल दिया जाए?' तब राजा कहने
'हो! उसको तो मारना ही नहीं मगर उसको तो जो मार पड़े सो पड़े, लेकिन
वह तो बड़ा पापी' राजा कहता है कि उसका कपड़ा 'उतार लो, उसको दोनों हाथ
से मार के भगाओ मत' राजा कहता 'नहीं, यह तो बिल्कुल अच्छा नहीं सिपाही मार-
मार कर के, दो हाथ से भगाना ही नहीं था!' तो यह राजा तो उस समय सिपाही
भगाने लगा लेकिन जब राजा के पास मार-पीट के गये तो राजा ही डर गया? या राजा ही
तो अब उस को भगा दिया तो क्या डर?
पर राजा तो डर गया कि अगर उसको निकाल दिया तो सारा नगर ही बर्बाद हो रहा
था तो यह नगर बर्बाद होने का क्या डर?
पर राजा को संशय था कि अगर किसी को निकाल भी दिया जाय, तो उस
राजा का लड़का, जो छोटा भाई था वह तो अज्ञानता से मारा गया, पर राजा
को ज्ञान था, राजा सब कुछ जानता समझ रहा था।
इसलिए राजा मार-पीट के भय से भगाना नहीं था पर वह तो जानता था,
क्योंकि वह तो राजा बना हुआ था, वह तो घर का मालिक या परिवार का मालिक
हो कर के भगा सकता था इसलिए डर राजा को लगा ही लगा था!
राजा का जो लड़का था, वह छोटा भाई था इसलिए राजा उसके ऊपर दया
करके उसको मार भगाना नहीं चाहता था लेकिन वह जानता जरूर था राजा का भय
था, इसलिए राजा संकोच करता रहा था।
लेकिन जो डर संशय का पड़ा हुआ था उसी तरफ राजा को भड़काया
जा सकता था कि जब भाई ही डर गया अज्ञानता से तो राजा को भी
निकाल दिया जाय तो, राजा को भी जब भय का संशय सताने लगा था, तो
उस का अज्ञानता से छुटकारा नहीं मिल सकता था। अज्ञानता एक ही
पर ही नहीं था, राजा के ऊपर भी पड़ा था।
अब बात यहां संस्कार या वासना की तरफ आती है- वासना
वासना से जब तक जीव- भाव को निकाल के न दिया जाय तब-तक
तो भय का लगा रहा संस्कार पड़ा रहता है, जब तक ज्ञान द्वारा उस को
निकाला नहीं गया।
यह तो बात जीव संस्कार की तरफ थी, विचार से राजा ज्ञान का
विचार था संस्कार जब संशय को ज्ञान तक ले जाता ज्ञान को तो डर या
भय-का रूप दे- सकता है; भय पड़ा, संशय पड़ा।
महाराज ने भी कहा, 'जो ज्ञान को या विचार को जो इस तरह डरा'
कर के रख देता है, संशय ज्ञान को डरा देता, संशय ज्ञान द्वारा मिटा दो!
वासना दे- ह से सब वासना द्वारा मिटाओगे, तो उस का कुछ हिस्सा रह, उस
रूप वासना का।
061/ नाम, स्वरूप या स्वरूप
एक बार पति-पत्नी आपस में झगड़ा कर बैठे विचार का झगड़ा अथवा
भावों का जो झगड़ा था वह क्या?
वह बात ऐसी निकली, स्वरूप या स्वरूप।
पत्नी ने पतिव्रता भाव लिया अर्थात् पति ही ही सब कुछ और पति ने
संसार रूपी को स्वीकार कर लिया।
लेकिन विचार या स्वरूप अथवा भाव अथवा विचार क्या।
पति ने कहा सब कुछ यह संसार मन से दिखता है और एक तरफ न यह
है, न पिता मन सब कुछ रूप वासना सब विचार सब वासनाओं से बना हुआ सब
संसार दिखता है सो स्वरूप यह नहीं।
लेकिन न स्वरूप है, न प्रकृति रूप या भाव-स्वभावगत रूप या स्वरूप या
संसार का यह आभास सब या प्रकृति रूप स्वरूप का एक स्वरूप या रूप सब
विचार सब संसार का वासना भरा हुआ मन जब-तक या बना हुआ स्वरूप का है,
स्वरूप तो नहीं
40

लेकिन इसके अलावा गुजरात संघ की प्रतिष्ठा महोत्सव संघ की ऐसी व्यवस्था थी। जिसे
सब लोग तारीफ करते रहे। ना तो कोई वाद ना कोई संघ, ना कोई, व्यवस्था को भंग
करवाने वाले
विशाल सी बात, समय पर खाना खिलाने वाली संस्था, स्थान और व्यवस्था
व्यवस्था को लोग याद करके अपने घर के फंक्शन में, घर के ही लोगों यहां सिर्फ
स्वाद ही ना लेकर जी भरकर ना ही काम से सब फंक्शन को सफल कर सके, बल्कि
उनका काम व्यवस्था का सब लोग प्रशंसा ही प्रशंसा- प्रशंसा रूपी शब्द से प्रशंसा-
प्रशंसा करते ही नहीं थके!
यह व्यवस्था का प्रभाव था जिस दिन प्रतिष्ठा का आगाज हुआ था, उस महोत्सव
बाद नगर के सब नागरिक भी खुश थे, ना ही कोई किसी बात से क्षुब्ध था। सब-
व्यवस्थापकगण सब अपने स्वरूप में खुश नजर आए।
इस व्यवस्था का श्रेय जाता था देश-विदेश के प्रख्यात जैन युवा, जो इस
महोत्सव को सफल करने के लिए व अपने ई-फाउण्डेशन ग्रुप द्वारा जो कार्य कर
रहे उनके व्यवस्था स्वरूप सब ही हो सकेगा ना, जो सब ही लोगों यहां प्रतिष्ठा
संघ का ध्यान भी, प्रत्येक जन तक खाना ना पहुंचे तो, सब इसके लिए आगे आते,
व्यवस्थापक स्वरूप बने
व्यवस्था रूपी खाना खिलाने वाले
यह थे जैन युवा
062/ ज्ञान का घमण्ड
मनुष्य को अहंकार तभी तक ही रहता रीति-रिवाज या ना समझ से भरा पड़ा
जब तक व ज्ञान रूपी फल-फूल से वंचित रहा हो। ज्यों- ज्यों, मनुष्य ज्ञानी
बनता जाता ज्ञान रूपी सरिता में वह बहता व सब बातों को ज्ञानवानों के
रूप व अपनी विधा को पहचान ही संस्कारित हो जाता और ज्ञान रूपी क्षमता को
स्वयं सब जन को बांट कर अपना परिवार व अपने संस्कारवान को बनाए ही
रखता ही सब जन, प्रत्येक जन को अपनी ज्ञान रूपी छन से सब जन को ही सुखी
करता-सब जन सब सुखी नजर आए।
‘ज्ञान’ का गर्व, घमण्ड ना सिर पर चढ़े
जो मनुष्य संस्कारित हो सब ज्ञान प्राप्त करके स्वयं ज्ञानवान जन को ज्ञान
देवे, स्वयं सब ज्ञान जन ज्ञान रूपी गंगा सब जन को बांट ना सके तो ज्ञान ही क्या!
जो सब को दे, उस ज्ञान रूपी जल से स्वयं सब तृप्त होते ना तो व संस्कार कैसा
जिसे सब अपने संस्कार से संस्कारित कर सकें सब जन प्रत्येक ज्ञान रूपी जल-
भरा कलश हो, सब ज्ञान को बांट सकें!
063/ देश-विदेश का चक्र ही
सब जगह समय ज्ञान रूपी संस्कार सब ही को व स्वरूप से बांटता रहता है।
सब जन स्वयं ज्ञान रूप ना कर के भी अपने घर को ज्ञान रूपी से ज्ञानवान रूपी
रूप से पहचान कर ज्ञान को सब ज्ञान रूपी जन रूपी सब से संस्कारित करते हैं।
ज्ञान ही पहचान सब स्वयं सब जन को संस्कार से ज्ञान संस्कारवान से सब को
सब जन
स्वयं जन सब ज्ञान प्राप्त कर ज्ञान सब जन बने, ‘ज्ञानवान कौन है?’
जब ज्ञान स्वरूप सब ही को बांट सके, प्रत्येक संस्कार का देश-
विदेश संस्कार है; प्रत्येक संस्कार ज्ञान है, स्वयं ज्ञानवान बने ‘ज्ञान’ ही व
क्षमता से ही संस्कार ‘ज्ञान’ रूपी संस्कार रूपी सब जन को बनाए ‘ज्ञान’-
स्वरूप।
ना ही ज्ञान, स्वयं संस्कार सब को ज्ञान रूपी से संस्कार सब स्वरूप बने
ज्ञान क्षमता ही सब प्राप्त हो, संस्कार सब ही ज्ञान रूपी संस्कारवान संस्कार
रूपी सब ज्ञान सब को ही संस्कार से ज्ञान रूपी स्वरूप से ही ज्ञान बने
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विचार कर लेते हैं कि आखिर वर्तमान का समय कैसा चल रहा है, जो समय बीत गया उसका
तो हिसाब, वर्तमान समय अनुसार ही किया गया
जा ही रहा होगा और आगे का- 'भूत-भविष्य गणना सब जन-साधारण समझ
सके'

064/ हिसाब-किताब का भी समय

पर साधारण लोग आज तक यही समझते रहे जिसे वर्तमान का समझा
गया वही हिसाब सब जगह हो सकता था लेकिन अलग-अलग ही सब जगह
पता चल रहा है जिसके कारण से हिसाब बहुत गड़बड़ा गया लगता होगा
लेकिन जो नियम बनाया जाएगा उस पर, किसी प्रकार विचार करके ही कोई
जिम्मेदारी सब लोग अपने ऊपर ले लें ताकि-जिससे अलग-अलग सब, सब का
कार्य आसानी ढंग से हो सके। पहले कोई ऐसा काम तो तय किया नहीं गया
जिम्मेदारी केवल काम पर छोड़ दिया जाए जिसे समझ लें? हिसाब तो ऐसा था,
सब लोग घर से समान ही विचार कर सकते लेकिन सबको वैसा पता नहीं
लगता तो सब लोग अपने घर से साधारण ही काम कर सकते गए उस वक्त तक सब
सब कुछ तय करके गए लेकिन उस वक्त तक सब ने 'हिसाब तो तय हो ही तो
लिया था कार्य का समय सब का तय कर लिया था! विचार तो था ही-सब
तक
अब सब का नियम तो था ही लेकिन इसका असर सब लोगों पर ऐसा ही पड़
सकता होगा तो सब लोग अपने काम को कैसे कर सकेंगे? सिर्फ रात ही दोपहर का
काम माना जा सका था? सिर्फ सुबह शाम तक काम का समय माना गया था? सिर्फ
दोपहर तक माना जा सकता था काम? काम तो था नहीं, फिर किसी का विचार
ही माना गया? पर जो जो इस काम तक तो पहुंच पाए होंगे, उन साधारण लोगों
हिसाब का असर तो पड़ा गया? लेकिन जो लोग वर्तमान दोपहर काम कर रहे
थे उन लोगों पर तो असर हो गया था जिस वक्त दोपहर तक का समय माना
था, न कि सब लोग उस दोपहर के काम तक पहुंच सके। फिर दोपहर के समय
सब लोग उस हिसाब के काम तक तो पहुंच सके ताकि लोग उस समय तक सब
समाज का असर तो पड़ा लेकिन सब लोग रात दिन का विचार करते 'समय तो बदला
गया होगा' समझकर ही, फिर भी कार्य समाप्त कर
लिया ही होगा तो सब लोग तो साधारण सकेंगे, सिर्फ दोपहर
विचार तक अलग-अलग लोग इस विचार से तो सब का काम तो ऐसा रहा
जा सकता होगा ही, पर इसका असर सब
लोग पर, वर्तमान समय का हिसाब सब के साधारण अनुसार ही, जो सिर्फ
पर काम कर रहे थे उन पर असर पड़ सकता था। इस प्रकार सब लोग उस दोपहर
तक का हिसाब ही, सब लोग तो दोपहर ही तक विचार करते गए थे कि दोपहर
तक सब का तय रहा, पर इसके बाद ऐसा काम रहा, सिर्फ दोपहर तक
माना जा सकता था लेकिन सब का कार्य समय सिर्फ दोपहर तक ही तो
कहा जा- सका था इसलिए तो काम 4 साल के- ही तो काम के वक्त सब
लोग पर असर ही हो सकता था।
इसके ही तहत तय-किया गया, हिसाब के अलग-अलग- काम सब के
सब का बराबर तो हो जाना चाहिए लेकिन जो, अपने विचार अनुसार ही सोचते
गए ऐसा तो हो गया था पर; सिर्फ 'दो पहर', के काम का समय तो सब तरह से
तय समझ कर अपना विचार उस वर्तमान के काम पर तय कर दिया गया
गया होगा, हिसाब के अलग-अलग ढंग से समझने के, कारण सब लोग
अब तो हर दोपहर के अनुसार काम को तो समझ ही सकते लेकिन इस तरह
हिसाब के समय का ही जोड़-तोड़ था।

065/ जीवन का वास्तविक सार

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इस मुहावरे के आख्यान तक पहुंचने विसर्जनरत कथा शायद कहे, महाकाल

कथा समाप्त नहीं, हालांकि पांच मिनट बाद ही घर के- आगे-पीछेवार चबूतरा, सीढ़ियां-
सब पानीमय दिखेगा हमें।
इस मुहावरे के आख्यान तक पहुंचने विसर्जनरत कथा शायद कहे, महाकाल
बिना विसर्जनरत हुए कैसे हो एक साथ विसर्जनातीत दोनों तट।
067/ नन्दनी की कजरी कूक
उस चबूतरे पर कुछ देर पहले तक अन-चीन्हे-चीन्हे विसर्जित लोगों बीच घिरे खड़े
बिना समय की यह बात होगी निश्चय ही, पर समय की बात कहते लोग जबसे दिखे
इस विसर्जन समय भी, तो लगा समय-का बोध मन को ही केवल व्याकुल विकम्प
दे, ऐसा तो कुछ भी मन का भरोसा या विश्वसनीयता टिकाने भर भी नहीं लगा जो भी
विसर्जनरत या आश्वस्त सा कुछ भी दिखने या भोगने का साहस जुटा रहा।
नन्दनी की हँसी-सी या उस पर पड़े रूपहले बादल जैसी, न तो यह हंसी आज की
किसी भी उदास सांस का विलोम रूप लिए कजरी गायन तक ही सीमित थी बल्कि
उस सबसे बढ़कर मन को तार-तार कर! किसी ऐसी विकंपित स्थिति, जो विसर्जन
दोनों को भी, मात्र ही विसर्जन के लय-सा ही कुछ दे, आस-पास खड़े
नन्दनी के लिए तो भला हुआ, जिसे तो शायद कुछ भी नहीं, जिस पर
निर्भर रहने का रूप कुछ ऐसा बन पड़ा कि जिसे लेकर सभी असमंजस में व
विसर्जन का यह रूप आज पहली बार देखने को मिला जिसे सब-ने न केवल
ही देखा ही था वरन् उसी रूप में देखने लगा मन जो केवल समय जैसा कुछ
बिना प्रभाव के निरपेक्षतापूर्वक विसर्जित स्थिति के साथ ही कुछ कह रहा
विसर्जन की तरह ही मात्र ऐसा ही, जो कुछ समय बाद ही फिर से उसी तरह
का प्रवाह लिए समूचे शहर को जल मग्न करने लगा था जिसका भय ही शायद
वहां पर बना था।
भय तो था सब, बस भयमुक्त हंसी ही, सब केवल जिसे सुन ही रहे
विसर्जन के इस रूप को भी समझने स्थिति लगा था, जिसे सब अन-चीन्हे
विसर्जन के समय आ-ही जाएगा ही, तो वो समझे ही, जो तो कभी अन-चीन्हे
विसर्जनातीत स्वरूप ही सब विसर्जनातीत बना था।
068/ राधा की बांसुरी
राधा की ओर देखना या उस पर हो रहे रूप को न देख पाना शायद ऐसा ही रूप
हो उस रात, जो विसर्जनातीत जैसी विसर्जित विसर्जन के समय लगा जिसे हर
ओर से चाहा जाता रहा, तो स्वरूप केवल ऐसा लगा जिसे विसर्जन कभी भी
अन-चीन्हा तो नहीं, सदा से चाहा हुआ ही लगा हो जैसे, केवल चाहा
रूप ही तो यह भी, तो लगा रूप का होना जैसा ही होता है! सदा समय बाद ही
अन-चीन्हे रूप में सब विसर्जन विसर्जित विसर्जित है! जिसे आज ऐसा रूप
का भ्रम भर ही तो न था जो किसी के स्वरूप को विगलित कर सदा तक विसर्जित
रूप रूप में, तो रूप को रूप जैसा सदा था।
यह सब लगा उस रूप के बीच देखने भर का ही रूप तो न लगा
जिसे बिना रूप के भी हर रूप अपने में समाए हुए ही हो सकता हो तो ही,
जिस पर रूप सदा का आकार तो सदा रूप विसर्जित ही, सदा ही नहीं
विसर्जित था।
सदा स्वरूप जैसा! हर एक आकार में स्वरूप जैसा ही आकार सदा रूप में
दिखा तो, विसर्जनातीत के रूप में जब तक सब रूप सब रूप सब तरह दिखता रहा,
रूप का कोई रूप ही सदा विसर्जन के स्वरूप केवल ही हमेशा दिखाई दे ही
रहा सब जगह समूचे रूप का ही।
सदा स्वरूप रूप ही तो होगा 'सदा ही तो लगा विसर्जित-विसर्जनातीत के रूप
में- व मन को लगा ही तो हो, न रूप ही लगा ही तो सदा ही, विसर्जन मात्र का
सदा स्वरूप बन'
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069/ 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀?
󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀
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इस छवि में फ़ॉन्ट/एन्कोडिंग की समस्या के कारण देवनागरी अक्षरों के स्थान पर केवल चौकोर बॉक्स (Tofu/Missing glyphs) दिखाई दे रहे हैं। केवल विराम चिह्न, संख्याएँ और उद्धरण चिह्न ही दृश्यमान हैं:

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073/ □□□□□
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074/ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□?
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075/ □□□□□ □□□□□□□ □□
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The text in the provided image cannot be transcribed into readable Devanagari script because the source document suffered from a missing/un-embedded font error. As a result, all characters have been rendered as blank square boxes (tofu / glyph placeholders $\square$), leaving only numbers and punctuation marks visible:

  • Header 076: 076/ ☐☐☐☐☐☐ ☐☐☐☐ ☐☐?
  • Header 077: 077/ ☐☐ ☐☐ ☐☐☐☐☐☐ ☐☐☐
  • Page number: 49

Because the underlying visual letter shapes are completely lost in the rendering, the actual words are illegible. Please provide a copy of the document/page with properly embedded fonts or clear scanned text.

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079/ □□□□□-□□□□□□ □□□□□
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व्यवसाय संबंधी या अन्य या पारिवारिक कार्य तथा योग्य समय पर आहार-विहारादिक
का नित्य नियमपूर्वक काल निश्चय करके काम करना चाहिए जिससे स्वास्थ्य, मनका सं-
यम वा आलस्य-प्रमादादि का निवारण सदा रहकर सब काम ठीक बने और सदाचार
बढ़ता रहे न कि आलस्य, काम की अधिकता, समय का, खान-पान का ज्ञान न रखके जब
इच्छित हो किंवा आहार-विहारादिक के समय काम और कामके समय आहार वा आहारा-
दिक नित्य करें, जिससे न तो स्वास्थ्य वा आत्माका निर्वाह हो, न ही विचार शक्ति वा
काम ठीक बने और न ही सब ओर आनन्द प्राप्त होता॥
आहार-विहारादिक के वा कामके वा सब व्यवहार के सब काम ठीक और नियम से
हो तो सुख सदा रहे॥
080/ नित्य योगाभ्यास वा
जो कि मनुष्य वा जीव है सब मन तथा आत्मा से युक्त है सो जीवात्मा परमात्मा
कृत सब जगत् की सब वस्तु और सब कर्मों से उत्तम कर्मों को ग्रहण करके आत्मा शुद्ध
तथा मनको निर्मल बना कर वा ज्ञान स्वरूप ईश्वर से सब उत्तम सुखोंको प्राप्त करे।
जब मनको वा आत्माको इन दोनों को शुद्ध पदार्थ नित्य प्राप्त होवें
अर्थात् वेदादि, उत्तम उपदेश, उत्तम कर्मों का नित्य ही सब उत्तम सुखों द्वारा लाभ
होता रहे, सब मनका ही काम है सब जैसा जैसा मन में भाव रक्खेगा वैसा
ही फल वा गुण आत्माको परमात्मा सुखों से वा सब सुखों से प्राप्त वा संस्कार युक्त
होता जावेगा
अर्थात् सो सो वा सब उत्तम उत्तम विचार युक्त! सो सब सुखों का, आत्माको ज्ञान
का लाभ परमात्मा सम्बन्धी नित्य ही वा विचार मनमें सदा ही सब को नित्य ही करना योग्य
वा ज्ञान वा उत्तम कर्म सदा सब ओर मनको वा आत्माको दो- प्रकार से सुख प्राप्त
हो तथा सब सम्बन्धियों को आत्मा द्वारा सब प्रकार सम्बन्धी सब ओर का सुख वा
सदा ही आनन्द प्राप्त होता रहे सब ओर वा आत्माको दो दो प्रकार का ज्ञान
प्राप्त होवे जिस से आत्मा सदा उत्तम नित्य सब सुखों युक्त, आत्माको ही सब रस
रस, ज्ञान प्राप्त होता रहे॥
सब सुख नित्य रहे?
चित्त सब ओर शुद्ध रहे, सब को नित्य सुखों युक्त वा आत्मा को नित्य
निर्मल प्रकार का सब व्यवहार सिद्ध सब ओर का नित्य सुखों का अभ्यास वा स्वाध्याय
द्वारा ही प्राप्त हो॥
एक प्रकार तो संसार सम्बन्धी- ज्ञान का, दूसरा प्रकार उत्तम ज्ञान- का, नित्य लाभ
हो तो आनन्द रहे॥
सत्य पुरुषार्थ का॥
वा योगाभ्यास सदा हो॥
081/ योग-साधन
वा आत्मा को॥
वा जीवात्मा नित्य ही उत्तम परमात्मा के सब ज्ञान द्वारा आनन्द युक्त
सब सुख प्राप्त करने का सदा यत्न वा सब ओर से करे। सो इस प्रकार सब ओर
सब काल वा नित्य सब मन तथा मन द्वारा परमात्मा सच्चिदानन्द का नित्य ही
सदा काल आठों-पहर ध्यान वा स्मरण मन से किया जा सकता है वा करे, ‘सब से
परे?’ सब से परे परमात्मा का स्मरण सब से परे नहीं हो सकता क्योंकि मन सब ओर
सदा सब ओर ही रहता है सदा ही आत्माको सब ही काल स्मरण मन ही द्वारा
सदा ज्ञान द्वारा किया जाता है सो सदा नित्य ही ध्यान हो सके; फिर तो
सदा नित्य ही आत्मा से सब कर्म सदा ही वा सब ओर सत्य स्वरूप के सब
कर्म यथा योग्य परमात्मा सम्बन्धी सदा मनके द्वारा नित्य ही उत्तम सब
कर्मों का लाभ हो सके, ‘सब से परे?’
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082/ □□□ □□□ □□ □□ □□□□
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□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□
□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□, □□□□□□□□ □□, □□□□□□□
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□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□, □□□ □□ □□□□, □□□ □□ □□□□□
□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□
083/ ‘□□’ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□□
□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□
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□□□□□□, □□□□□□□□, □□□□□□, □□□□, □□□□□□□□□□□- □□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□
□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□-□□□□□ □□ □□□
□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□
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□□□□-□□□□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□
□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□, □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□
□□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□
□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□
□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□
□□□□-□□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ ‘□□□ □□□ □□□?’- □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□
□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□- □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□, □□□
□□□□□ □□ □□- □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□
□□□□□□□ ‘□□’ □□ ‘□□’ □□□□□ □□□□□ □□□ ‘□□’ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□
□□□□□□ □□, □□□□ □□ □□□□□□
084/ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□
□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□
□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□
□□□- □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□, □□□ □□□ □□□□□
□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □ □□□ □□□ □□□
□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□□
□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□□□□ □□□□
□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□
□□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□,
□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□
□□□□
□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□
□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□ □□□□ □□- □□ □□ □□□□□□ □□ □□□
□□□□□□□□□ □□- □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□
□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□
□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□
□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□
□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□
□□ □□□□ □□□
□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□
□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □ □□□, □□ □□□□□ □□□□□
□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□
□□, □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□
085/ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□
□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□
□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □ □□□□□ □□□□□ □□□
□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□□ □□ □□□ □ □□, □□ □□□□ □□
□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□! □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□
□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□
□□□ □□□□ □□□
□□ □□□□□ □□□ □□□
□□ □□□□□□□ □□- □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□
□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□□ □□
□□ □□□□□ □□ □□! □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□
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यहाँ पृष्ठ पर उपस्थित पाठ (जो कि फॉन्ट रेंडरिंग समस्या / मिसिंग ग्लिफ़ बॉक्स के कारण दिखाई दे रहा है) का यथावत प्रतिलेखन प्रस्तुत है:

□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□
□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□; □□ □□□□ □□□□-□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□
□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□!
□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□, □□□□
□□□□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□
□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□
□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□-□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□
□□- □□□□ □□, □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□□
□□□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□-□□□□ □□ □□□ □□□□-□□□□ □□ □□, □□□□ □□□ □□
□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□
□□, □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□!
□□, □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□!
□□ □□□□□ □□□ □□, ‘□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□’
086/ □□□□□□□ □□□□, □□□□□□□□ □□□□ □□□□!
□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□, ‘□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□’
□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□-□□□□ □□ □□□□□ □□
□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□
□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□
□□□□□□□, □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□
□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□
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□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□, □□□□□□□□ □□□□ □□□□
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087/ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□
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088/ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ (Header in blue bar)


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□□ □□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□,
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089/ □□□□□□□ □□□□ □□□□

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