क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकथा समाप्त नहीं, हालांकि पांच मिनट बाद ही घर के- आगे-पीछेवार चबूतरा, सीढ़ियां-
सब पानीमय दिखेगा हमें।
इस मुहावरे के आख्यान तक पहुंचने विसर्जनरत कथा शायद कहे, महाकाल
बिना विसर्जनरत हुए कैसे हो एक साथ विसर्जनातीत दोनों तट।
067/ नन्दनी की कजरी कूक
उस चबूतरे पर कुछ देर पहले तक अन-चीन्हे-चीन्हे विसर्जित लोगों बीच घिरे खड़े
बिना समय की यह बात होगी निश्चय ही, पर समय की बात कहते लोग जबसे दिखे
इस विसर्जन समय भी, तो लगा समय-का बोध मन को ही केवल व्याकुल विकम्प
दे, ऐसा तो कुछ भी मन का भरोसा या विश्वसनीयता टिकाने भर भी नहीं लगा जो भी
विसर्जनरत या आश्वस्त सा कुछ भी दिखने या भोगने का साहस जुटा रहा।
नन्दनी की हँसी-सी या उस पर पड़े रूपहले बादल जैसी, न तो यह हंसी आज की
किसी भी उदास सांस का विलोम रूप लिए कजरी गायन तक ही सीमित थी बल्कि
उस सबसे बढ़कर मन को तार-तार कर! किसी ऐसी विकंपित स्थिति, जो विसर्जन
दोनों को भी, मात्र ही विसर्जन के लय-सा ही कुछ दे, आस-पास खड़े
नन्दनी के लिए तो भला हुआ, जिसे तो शायद कुछ भी नहीं, जिस पर
निर्भर रहने का रूप कुछ ऐसा बन पड़ा कि जिसे लेकर सभी असमंजस में व
विसर्जन का यह रूप आज पहली बार देखने को मिला जिसे सब-ने न केवल
ही देखा ही था वरन् उसी रूप में देखने लगा मन जो केवल समय जैसा कुछ
बिना प्रभाव के निरपेक्षतापूर्वक विसर्जित स्थिति के साथ ही कुछ कह रहा
विसर्जन की तरह ही मात्र ऐसा ही, जो कुछ समय बाद ही फिर से उसी तरह
का प्रवाह लिए समूचे शहर को जल मग्न करने लगा था जिसका भय ही शायद
वहां पर बना था।
भय तो था सब, बस भयमुक्त हंसी ही, सब केवल जिसे सुन ही रहे
विसर्जन के इस रूप को भी समझने स्थिति लगा था, जिसे सब अन-चीन्हे
विसर्जन के समय आ-ही जाएगा ही, तो वो समझे ही, जो तो कभी अन-चीन्हे
विसर्जनातीत स्वरूप ही सब विसर्जनातीत बना था।
068/ राधा की बांसुरी
राधा की ओर देखना या उस पर हो रहे रूप को न देख पाना शायद ऐसा ही रूप
हो उस रात, जो विसर्जनातीत जैसी विसर्जित विसर्जन के समय लगा जिसे हर
ओर से चाहा जाता रहा, तो स्वरूप केवल ऐसा लगा जिसे विसर्जन कभी भी
अन-चीन्हा तो नहीं, सदा से चाहा हुआ ही लगा हो जैसे, केवल चाहा
रूप ही तो यह भी, तो लगा रूप का होना जैसा ही होता है! सदा समय बाद ही
अन-चीन्हे रूप में सब विसर्जन विसर्जित विसर्जित है! जिसे आज ऐसा रूप
का भ्रम भर ही तो न था जो किसी के स्वरूप को विगलित कर सदा तक विसर्जित
रूप रूप में, तो रूप को रूप जैसा सदा था।
यह सब लगा उस रूप के बीच देखने भर का ही रूप तो न लगा
जिसे बिना रूप के भी हर रूप अपने में समाए हुए ही हो सकता हो तो ही,
जिस पर रूप सदा का आकार तो सदा रूप विसर्जित ही, सदा ही नहीं
विसर्जित था।
सदा स्वरूप जैसा! हर एक आकार में स्वरूप जैसा ही आकार सदा रूप में
दिखा तो, विसर्जनातीत के रूप में जब तक सब रूप सब रूप सब तरह दिखता रहा,
रूप का कोई रूप ही सदा विसर्जन के स्वरूप केवल ही हमेशा दिखाई दे ही
रहा सब जगह समूचे रूप का ही।
सदा स्वरूप रूप ही तो होगा 'सदा ही तो लगा विसर्जित-विसर्जनातीत के रूप
में- व मन को लगा ही तो हो, न रूप ही लगा ही तो सदा ही, विसर्जन मात्र का
सदा स्वरूप बन'
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