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सर्वकोश
क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)

DevanagariHindipublished73 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 73 में से

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महाराज के पास जब- दो तीन सिपाही गये और यह बात उन लोगों ने राजा से
कही 'महाराज उस को सब लोग मार-पीट करके निकाल दिया जाए?' तब राजा कहने
'हो! उसको तो मारना ही नहीं मगर उसको तो जो मार पड़े सो पड़े, लेकिन
वह तो बड़ा पापी' राजा कहता है कि उसका कपड़ा 'उतार लो, उसको दोनों हाथ
से मार के भगाओ मत' राजा कहता 'नहीं, यह तो बिल्कुल अच्छा नहीं सिपाही मार-
मार कर के, दो हाथ से भगाना ही नहीं था!' तो यह राजा तो उस समय सिपाही
भगाने लगा लेकिन जब राजा के पास मार-पीट के गये तो राजा ही डर गया? या राजा ही
तो अब उस को भगा दिया तो क्या डर?
पर राजा तो डर गया कि अगर उसको निकाल दिया तो सारा नगर ही बर्बाद हो रहा
था तो यह नगर बर्बाद होने का क्या डर?
पर राजा को संशय था कि अगर किसी को निकाल भी दिया जाय, तो उस
राजा का लड़का, जो छोटा भाई था वह तो अज्ञानता से मारा गया, पर राजा
को ज्ञान था, राजा सब कुछ जानता समझ रहा था।
इसलिए राजा मार-पीट के भय से भगाना नहीं था पर वह तो जानता था,
क्योंकि वह तो राजा बना हुआ था, वह तो घर का मालिक या परिवार का मालिक
हो कर के भगा सकता था इसलिए डर राजा को लगा ही लगा था!
राजा का जो लड़का था, वह छोटा भाई था इसलिए राजा उसके ऊपर दया
करके उसको मार भगाना नहीं चाहता था लेकिन वह जानता जरूर था राजा का भय
था, इसलिए राजा संकोच करता रहा था।
लेकिन जो डर संशय का पड़ा हुआ था उसी तरफ राजा को भड़काया
जा सकता था कि जब भाई ही डर गया अज्ञानता से तो राजा को भी
निकाल दिया जाय तो, राजा को भी जब भय का संशय सताने लगा था, तो
उस का अज्ञानता से छुटकारा नहीं मिल सकता था। अज्ञानता एक ही
पर ही नहीं था, राजा के ऊपर भी पड़ा था।
अब बात यहां संस्कार या वासना की तरफ आती है- वासना
वासना से जब तक जीव- भाव को निकाल के न दिया जाय तब-तक
तो भय का लगा रहा संस्कार पड़ा रहता है, जब तक ज्ञान द्वारा उस को
निकाला नहीं गया।
यह तो बात जीव संस्कार की तरफ थी, विचार से राजा ज्ञान का
विचार था संस्कार जब संशय को ज्ञान तक ले जाता ज्ञान को तो डर या
भय-का रूप दे- सकता है; भय पड़ा, संशय पड़ा।
महाराज ने भी कहा, 'जो ज्ञान को या विचार को जो इस तरह डरा'
कर के रख देता है, संशय ज्ञान को डरा देता, संशय ज्ञान द्वारा मिटा दो!
वासना दे- ह से सब वासना द्वारा मिटाओगे, तो उस का कुछ हिस्सा रह, उस
रूप वासना का।
061/ नाम, स्वरूप या स्वरूप
एक बार पति-पत्नी आपस में झगड़ा कर बैठे विचार का झगड़ा अथवा
भावों का जो झगड़ा था वह क्या?
वह बात ऐसी निकली, स्वरूप या स्वरूप।
पत्नी ने पतिव्रता भाव लिया अर्थात् पति ही ही सब कुछ और पति ने
संसार रूपी को स्वीकार कर लिया।
लेकिन विचार या स्वरूप अथवा भाव अथवा विचार क्या।
पति ने कहा सब कुछ यह संसार मन से दिखता है और एक तरफ न यह
है, न पिता मन सब कुछ रूप वासना सब विचार सब वासनाओं से बना हुआ सब
संसार दिखता है सो स्वरूप यह नहीं।
लेकिन न स्वरूप है, न प्रकृति रूप या भाव-स्वभावगत रूप या स्वरूप या
संसार का यह आभास सब या प्रकृति रूप स्वरूप का एक स्वरूप या रूप सब
विचार सब संसार का वासना भरा हुआ मन जब-तक या बना हुआ स्वरूप का है,
स्वरूप तो नहीं
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