क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस लिए जब तक जीव इस बात को, कि भगवान् सब जगह व्याप्त हैं ऐसा
जाने?
संसार के सम्मुख आकर कोई भी ऐसा काम न करे जो बुरा, पाप
कहलाता हो तब
पहिले ऐसा करने से, सब सम्बन्धी अपने ही हो कर धोखा देने लगें ऐसा
रूप विचार कर, पर जीव ऐसा अभ्यास बनाये तब मन से भगवान् के दर्शन सदा
सर्वव्यापक स्वरूप आ- कार से जाने पर सर्वथा संशय जाता रहे।
जब ऐसा ही सब संशय मिट- कर ज्ञान हो जाय तब उस से भी बढ़ कर
ज्ञान रूप हो ‘गो पाल’- नाम उच्चारण रूप से मन को परमात्मा को
सर्वव्यापक समझकर जो ‘गो पाल’ का ध्यान करता है, भगवान् तो उस रूप आ-
कारवान् रहता है, शरीर में चेष्टा से, शरीर के भीतर सब ही में एक रूप से, सबमें
ही सब का एक रूप ही रहता न हो, पर उस रूप में भगवान् जाने बिना प्राणी
को शान्ति, सुख शान्ति न हो सके, सुख शान्ति ही सब चाहै, भगवान्
कृपा से कृपा रूप दर्शन से सब शान्ति ही हो भगवान् से जाने बिना सुख न मिल
कर सब सन्देह ही सन्देह रूप रहता है, सन्देह ही का नाश सब ओर से, भगवान्
की, शरण बिना ही, संसार सब जन्म भर में ही संशय से, सन्देह युक्त रहकर
ही काल वश हुआ।
ऐसा न जान कर ही अभ्यास ही करना था।
105/ ज्ञान दशा का
ज्ञान स्वरूप सब परमात्मा के ज्ञान रूप सब लीला लीला भाव से ऊपर
उठ कर सब से ऊपर मन को ले जाकर वैकुण्ठ मण्डल में उस रूप से देख कर ऊपर
सब सुख
ही पाता जाय, उस के अभ्यास से जब सब परमात्मा के आनन्द रूप ही
स्वरूप आनन्दरूप शान्ति भाव देख- ता हुआ मन को सब काम बिना सब ही
बात को विस्मृत समझता हुआ उस ज्ञान दशा- भाव दशा को पाता हुआ सब
संसार के सम्बन्ध मात्र भाव से छूट कर आत्म-समर्पणरूप से शांत, शांत स्वरूप
सब ओर से ध्यान रूप मन को कर दिया तब उस भाव दशा में स्थित हो, जो संसार
भाव-सम्बन्ध सब जन्म-मरण का दाता है, पर उस को ज्ञान में ‘गो गौ’- ही ही
समझता हुआ ही उस ज्ञान को समझता हुआ ही सब ओर ही ज्ञान ही ज्ञान
रूप में संसार का रूप सब एक रूप ही जान कर भगवान् सब ओर ही सब ओर
जान कर, जो परमात्मा सब ओर सब ही में ‘गो’ के स्वरूप से, ही परमात्मा
रूप जान
ऐसा जान लेता है, पर ‘गो’ वा ‘इ न्द्री’ सब परमात्मा ज्ञान रूप से व्याप
‘गो’ का सब रूप जान कर, ‘गो’ वा ‘इ न्द्री’ का ज्ञान हो, सो आत्म-समर्पण रूप
वैकुण्ठ में ऐसा ही, न ‘आत्म-समर्पण’ कर सब को सब ओर जान कर उस रूप
दर्शन ही सब सब भगवान् को ‘गो’ ही ही समझ कर सब रूप से ‘गो’ ही ही
स्वरूप सब ओर ही ही हो जाता है, पर भगवान् उस परमात्मा के चरण में
सदा ही आत्म-समर्पण ही रहता है।
परमात्मा का ध्यान हो जाय तो, ‘सकल जगतमय हो पावै प्रभु को
रूप’तो सब जान कर, ‘परमात्मा सब ही रूप, का भगवान् का रूप समझता’।
106/ सब का साक्षात्कार
जो संसार सब रूप आ-कार युक्त
ही सब जगत् में ही सब आ-कार युक्त
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