क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसमाज का हर नर नारी धर्म का नाम लेत हैं और धर्म ही मनुष्य रूप को सार्थक कर
मुक्तिलाभ तक लेजा सक्ता है! पर जिसे मनुष्य आज धर्म समझ रहा होगा वह यथार्थ
का रूप बना रक्खा होगा क्या नहिं? उस धर्म जिसे धर्म या तो माना जाताहै या ही
है, उसका फल मुक्ति कैसे होगा! जो धर्म बिना किसी के रोके सब देश, समस्त काल में
एक सा ही फल देता रहता वही यथार्थ धर्म हो सक्ता?
उत्तर- हा, यथार्थ धर्म, या उत्तम क्षमादि लक्षण धर्म!
सम्पूर्ण जीवात्मा का स्वभाव किसी भी काल में बदल तो नहीं सक्ता भला जो
विकारी भावों का रूप है, उसको ही यथार्थ धर्म मानकर संतुष्ट होने का क्या
प्रयोजन रहता है? विकारी वा विभाविक ही तो संसार चक्र का रूप बन रहा है, सो
इन विभावों से रहित शुद्ध रूप को ही अपना मान कर उपादान ही यथार्थ धर्म समझना
होगा
103/ निश्चल धर्म
‘जो जीव सदा सम्यग्दर्शन आदि रूप धर्म तथा सदा निर्दोष धर्ममय अपने आत्म रूप को
ध्यावे है, वह जीव सम्यग्ज्ञान को ही प्राप्त हो रहा’
इस लोक में तो सब पदार्थ या द्रव्य सदा अपने स्वभाव रूप होकर परिणम रहेहैं,
केवल इस जीव रूप द्रव्य को छोड़कर सो ऐसा क्यों हो, इस विषय का विचार कभी
किया है! सब द्रव्यों का जो रूप, गुण पर्याय से तो सदा ही काल में जैसा था वैसा ही
परिणामन स्वरूप ही दिखाई दे सक्ता है किन्तु कभी इस जीव रूप द्रव्य को भी देखा
कि इस जीव रूप द्रव्य के स्वभाव को छोड़कर कभी नहीं देखा, सदा केवल मात्र ‘द’
या ‘प’ रूपी कर्मों द्वारा उपाधि रूप जो सब कर्म रूप परिणमन होता है, उस समय
कभी जीव का स्वभाव या रूप तो नहीं बदल गया
अब देखना यह, 'कि जो भी, जिस रूप से धर्म या धर्मात्मा कहा है,
सो भी ‘पर से’ भिन्न स्वरूप का रूप है'या कि 'पर से'- भिन्न स्वरूप रूप ‘स्व से’-युक्त
स्वरूप निश्चय से कहा जा सक्ता सो समझ लो तब कहीं धर्म या धर्मात्मापना का
यथार्थ स्वरूप-पहचान रूप से प्रगट रूप से स्वीकार उपादान स्वांगपने से नहीं
यथार्थ जैसा जैसा रूप स्वरूप का होगा, सो सब ही रूप ‘स्वयं’ ही देखना ही
यथार्थ निश्चय रूप से समझ कर स्वांगपने का व्यवहार स्वरूप त्यागना समझना
यह यथार्थ धर्म
कैसा यथार्थ धर्म? सब ही प्रकार के भाव, मन रूप व वचन अथवा काय रूप रूप
सब क्रिया ही, आत्मा रूप स्व द्रव्य रूप स्वयं ही स्वरूप का कारण मान लिया जा रहा
व्यवहार ही मान कर सब पर भाव, सो सब क्रिया ही, सो अज्ञान ही रूप फल को
फल को ‘न धर्म’ रूप, सो अज्ञान रूप ही परिणाम ही, यह अ-धर्म रूप
104/ ‘हम विनाशी अथवा अविनाशी हैं?’
यह जानना सब जन का प्रथम ही कार्य होना ही योग्य है, ‘हमारा तो नाश
होता है?’ वा ऐसा ही रूप, ‘हमारा कभी विनाश होगा? सो ऐसा ही विचार योग्य
रूप होगा, ‘हमारा विनाश तो हो सकता ही!’
सो ही विचार हो जाना, ‘हम विनाशी अथवा अविनाशी हैं?’ तब ही योग्य ही हो
उपादान का रूप सब जन व्यवहारिक से भिन्न ही देखना होगा
कैसा सो विचार? सो ही विचार ऐसा होगा कि, सब संसारी ही मनुष्य पर्याय
प्रमाण से नाश ही स्वरूप का दिखाई देता है, सो विचार; सो व्यवहार से, सब जन
रूप से व्यवहार सब जन ऐसा कहते सुना जाताकि यह पर्याय संबंधी ही सारा
नाश होना देखा जाता
व्यवहार- रूप विचार तो हो रहा देखा जा व्यवहार ही रूप सब व्यवहारिक
जन स्वरूप कह रहे, व्यवहार मात्र से ही; सब पिता का, सब माता का, सब पुत्र
का, सब संबंध सब ही व्यवहार ही पर्याय के अनुसार देखा गया माना जाता
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