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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

विचार कहाँ तक करें? जीव का संसार भी अनादि ही रहा ही इसलिए पर से भिन्न स्वयं की
खबर
ही कहाँ थी जो भेद ज्ञान, वैराग्य आदि बातें सोचता विचारता ही कभी नहीं
फिर जब कभी समागम मिला भोग ही तो चाहा, पर स्वयं का भला किस में है यह तो
ही नहीं देखा सदा पर को ही-ही देखा और पर को दुख देने से खुद न तो भगवान्
बना कभी किसी, तो दुःखी जरूर बनाया ही रहा ही खुद को सदा ही कष्ट में, तो
विषय रस का फल है दुःख, ही दुःख।
वो ऐसा भाव करो, "मुझे पर द्रव्यों का त्याग कभी नहीं करना"
सब कुछ जानो, समझो अपने ही स्वरूप को जानने का अभ्यास हो, तब
स्वभाव व्यक्त रूप होकर स्वयं प्रकाश रूप प्रकट होता रहे, परिणाम निर्मल
बने सब पर से मोह छूटे और तब ही स्वाध्याय सार्थक होगा ही, भव्य जीव ध्यान
देकर सब को सुनो और समझकर फिर आचरण स्वाध्याय का आचरण करना ही
त्याग का भाव मत करो मोह को बस छोड़ो ही आत्मा को ध्या, मोह छोड़ भगवान्
सुख प्राप्त कीजिए।
जिसका सब ज्ञेयाकार ज्ञान स्वयं रूप से, ज्ञान रूपी समुद्र ज्ञान का, ज्ञान
रूपी अमृत है! ऐसा ज्ञेय भगवान् का ध्यान करो भव्य जीव जो भवो, भवों तक
भव भोग का फल तो पा ही रहा तब तक तो भगवान् के ही रस को रस न मन में
लिया केवल अज्ञान रस को ही तो रस मान रहा, पर अब तो रस ऐसा लो ज्ञान
रस जिसका कभी अभाव न, त्याग तो उस रस को कभी नहीं करो, जिसका रस
ज्ञान रूपी अमृत भरा ही रस रहा है आत्मा ज्ञान रस का सागर, जिसका
स्वाद ही भिन्न रस का रस
ऐसा ही सब करो, "मुझे तो स्वरूप रस कभी नहीं छोड़ना भव्य जो सब
स्वाध्याय का फल यही पाना बस"
पर स्वाध्याय का ही अर्थ ही विचार आचरण आत्मा स्वरूप होना, वो
स्वरूप में बस ध्यान लगाओ बस, वो समय पर स्वयं प्रकट हो कर सहज रूपी ज्ञान, वो
पर भगवान् के स्वाध्याय का स्वाध्याय रूपी फल सब को स्वाध्याय का ज्ञान
ही सब भव्य जीवों को स्वाध्याय के ही फल
सो ही स्वाध्याय से ही आत्मा का स्वरूप ज्ञान प्रकट हो सकता ही
सकता है, तो ऐसा स्वाध्याय! पर ही स्वाध्याय से ही स्वरूप प्रकाश हो सकता
आचरण रूप हो कर ज्ञान करो ही, भव्यो आत्मा स्वाध्याय से भव्य मोक्ष
सुख सब ही पावेगा ही, आत्मा को ज्ञान रूपी मन से ज्ञान ही स्वाध्याय ज्ञान
रूप सदा ही पर को त्याग कर ज्ञान को ही अपनाओ तब ही ज्ञान का आदर
स्वाध्याय का रस ज्ञान सागर ही पाओ, सदा रोम-रोम में ज्ञान प्रकाश ज्ञान
सब का प्रकाशक हे, त्याग तो स्वरूप के स्वरूप ज्ञान रूप को त्याग ना करो जी,
रोम-रोम रस का वासी, आत्मा ज्ञान स्वाध्याय रूप ही स्वाध्याय स्वरूप
सुखमय बनो
स्वरूप का त्याग ना, पर सब स्वाध्याय का ज्ञान करो सब स्वरूप ज्ञान ही
हो सो भव्य स्वाध्याय, सब भव्य जीव सब भव्य त्याग स्वाध्याय रूप स्वाध्याय है?
भव्य, स्वाध्याय, करो भव्यो, भव्य ही सब ज्ञायक स्वरूप रहो, सदा ऐसा
भव्य भाव हो! भव्य तो सब रोम-रोम बस रहो, ज्ञान धारा सदा रोम
रोम रोम-रोम का प्रकाश रूप स्वाध्याय सब हे आत्मा, त्याग स्वाध्याय तो कभी
स्वाध्याय त्याग मत करो हे आत्मा त्याग रूपी स्वभाव को सदा आचरण करो
ही तो भव्य आत्मा हो, वो हे भगवान् स्वाध्याय रूप स्वाध्याय स्वरूप
वो ऐसा भाव करो जो पर से ही स्वाध्याय का फल सदा पाओ जी, वो
ही त्याग सब पर द्रव्य-पर्यायों से, पर त्याग स्वरूप, स्वरूप ज्ञान
"पर का तो त्याग हो सके स्वरूप का ना हो सके या त्याग कभी मत"
स्वाध्याय आत्मा का फल, त्याग तो स्वरूप न स्वाध्याय पाओगे, भव्यो,
स्वाध्याय, सब भव्य को त्याग न करो स्वरूप ज्ञायक स्वरूप हो
स्वाध्याय स्वरूप--हो, स्वाध्याय! सब तो स्वरूप का त्याग ना, सब
स्वाध्याय स्वरूप स्वरूप स्वाध्याय स्वाध्याय सब सब ज्ञान ही
तो ज्ञान स्वरूप, बस ही त्याग स्वरूप... ॥
भव्य स्वाध्याय का तो फल ऐसा रोम-रोम सदा ही तो रस पाओगे
रूप ही पर ज्ञान सब आत्मा स्वरूप का भाव सदा ज्ञान ही तो स्वरूप ज्ञान का,
ज्ञान ही सदा ज्ञान का रस ही त्याग ना करो सदा ज्ञान रस रहो जी, स्वाध्याय
95

उपसंहार का रूप देखकर सम्प्रदाय प्रवर्तक केवल इस बात का ध्यान रख सके, जिससे उनका मत
किसी को ना-पसन्द कराकर तिरस्कृत तथा त्याज्य न हो सके अथवा उस पर, किसी का रोष न हो, या
किसी का आग्रह बना ही न रहे अथवा कोई रुष्ट न हो? इसमें उनका स्वार्थ क्या? या सम्प्रदाय का
क्या उत्कर्ष अथवा गौरव था, जो वे केवल इस बात, विचार या भाव, का ही ध्यान रख सके
जिसे लोग पसन्द कर लेते! या तो लोग केवल अपने मत का प्रचार चाहते होंगे अथवा? सम्प्रदाय
रूप का विस्तार?
ऐसा तो नहीं, दोनों ही उच्च पद पर पूर्ण रूप ज्ञान तथा भक्ति पूर्वक निष्ठावान्
थे, फिर त्याग भी; जो कि उच्च ज्ञान त्याग या कर्म रूप त्याग के ही रूप रूप में माना
जाता रहा है? फिर यह दोष, सम्प्रदाय स्वरूप अथवा लक्षण क्यों? सम्प्रदाय रूप
को जो भी सिद्ध किया गया हो अथवा जो किया जा रहा हो वह केवल भोग या स्वार्थ रूप
ही, तो हो ही नहीं सकता अथवा त्याग रूप ही! यह सम्प्रदाय स्वरूप की केवल
व्याख्या का रूप हो सकता है।
त्याग केवल भोग का नाम है? त्याग ही तो सब कुछ, त्याग श्रेष्ठ! सब त्याग ही तो
है? त्याग एक संस्कार! त्याग केवल मात्र ज्ञान है? या फिर इन सम्प्रदायों का त्याग
श्रेष्ठ?
प्रत्येक मतने अपने मत का रूप या सम्प्रदाय का रूप ज्ञान रूप तथा अधिकार के साथ
व्याख्यात रूप में, तथा संस्कार रूप स्वरूप का रूप भी जो कुछ रूप रूप प्रकट कराया, वह
केवल इन सम्प्रदायों का अपना रूप प्रभाव मात्रा ज्ञान ही था, जिसे त्याग आधार पर, इन
मतों द्वारा रूप के रूप में रूप में प्रकट रूप ज्ञान का रूप ही दिया गया अथवा जो
सम्प्रदाय संस्कार बने।
इस प्रकार रूप ज्ञान, न तो सम्प्रदाय के संस्कार, न सम्प्रदाय के संस्कार, न
किसी प्रकार के सम्प्रदाय केवल ही प्रकार त्याग का ही रूप, तो फिर सम्प्रदाय ज्ञान
का सम्प्रदाय त्याग क्या
जो रूप सम्प्रदाय ज्ञान त्याग का, केवल अथवा सब रूप से त्याग ही प्रकार का
रूप ज्ञान माना था, त्याग का त्याग ही स्वरूप त्याग ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान रूप ज्ञान
का स्वरूप रूप ही सम्प्रदाय रहा, त्याग केवल त्याग स्वरूप, त्यागी त्यागी त्याग, या
रूप ज्ञान रूप ही रूप, या सब सम्प्रदाय के, रूप सम्प्रदाय के, सब सम्प्रदाय के--
सब रूप सम्प्रदाय त्याग का स्वरूप रूप सम्प्रदाय व्याख्या के ही रूप ज्ञान रूप त्याग
के आधार पर त्याग आधार त्याग के आधार पर त्याग के रूप त्याग के ही प्रकार का
त्याग ज्ञान के रूप त्याग का ही रूप व्याख्या का रूप ज्ञान रहा।
त्याग का त्याग का, सम्प्रदाय के सम्प्रदाय के त्याग का रूप या, सब त्याग
त्याग का त्याग रूप त्याग ज्ञान के रूप त्याग रूप सम्प्रदाय के त्याग का त्याग या
सम्प्रदाय सब का त्याग रूप स्वरूप का ही रूप, या त्याग सब स्वरूप सब रूप
का, रूप का त्याग त्याग का।
"यह सब संस्कार का रूप रूप में ही सब रूप ज्ञान का, त्याग ही तो स्वरूप का"
"सब रूप का केवल-केवल ही सम्प्रदाय ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान का संस्कार या त्याग
रूप त्याग रूप ज्ञान का रूप त्याग त्याग का ही त्याग का त्याग रूप ज्ञान त्याग
का, सब रूप का त्याग रूप त्याग ज्ञान स्वरूप के सब संस्कार या सब का या
जो कुछ रूप ज्ञान का, त्याग ही तो त्याग का।"
त्याग केवल एक स्वरूप मात्र केवल सम्प्रदाय
ज्ञान ज्ञान त्याग त्याग त्याग त्याग त्याग ज्ञान । अथवा
रूप त्याग संस्कार त्याग का ही त्याग ज्ञान रूप त्याग
त्याग सम्प्रदाय त्याग का, त्याग सम्प्रदाय त्याग सब संस्कार सम्प्रदाय
ज्ञान सब, त्याग सम्प्रदाय त्याग त्याग त्याग के सब रूप त्याग संस्कार या सब
ज्ञान--त्याग का त्याग, त्याग का त्याग त्याग का सब या सब रूप त्याग का त्याग
का स्वरूप या स्वरूप के संस्कार के संस्कार त्याग का सब या सब रूप त्याग,
संस्कार या त्याग का त्याग या त्याग का संस्कार
सब प्रकार का, सम्प्रदाय रूप संस्कार रूप त्याग का त्याग सब त्याग संस्कार,
सब रूप सम्प्रदाय त्याग के ही सब संस्कार त्याग, सब त्याग त्याग त्याग ।
त्याग त्याग त्याग का ही त्याग सम्प्रदाय का त्याग त्याग का त्याग सब त्याग
त्याग का सब त्याग त्याग त्याग का सब सम्प्रदाय सब सम्प्रदाय त्याग का सब
त्याग का सब त्याग का, या सम्प्रदाय रूप त्याग सब त्याग का।
त्याग त्याग त्याग का या सब का या केवल-केवल ही सम्प्रदाय त्याग ज्ञान
सम्प्रदाय त्याग का सब ज्ञान, सब सम्प्रदाय का ज्ञान का--न सम्प्रदाय, न संस्कार; न
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प्रमाणाभावाद् देहादेः, न त्वात्मा ज्ञेयत्वं; न स्वयं ज्ञेयत्वं, न प्रमाणाभावे परस्याप्यन् अयं नाहं प्रत्यय
विषयः, तस्माद् अह प्रत्ययेन सहैव आत्मा भासते इत्येवं स्वप्रकाश इति भावार्थः ॥६॥
“अहं कर्ता ममेदं कार्यम्”
उक्त दृष्टान्तस्य दान्तिकमाह—
अथो अन्वयोऽपि कस्माद् दृश्यते? घटादाविव मयि ज्ञानस्य भावाभावौ न दृश्यते
इत्यर्थः ॥४०--यथा, घटादौ, घटा-भाव--अभावयोः मयि ज्ञानमुदेति तद् घटम् अन्तं नाहं जानामीति
मयि अज्ञानं चोदयति तद् मयि ज्ञानात् पूर्वं घटाभावो मयि ज्ञानम् अभावो न भवति; किन्तु
ज्ञातम् इति व्यहारो भवति; ज्ञानाभावाद् घटम् अजानन् इत्येवं ज्ञानाभाव व्यवहारो दृश्यते; मयि घटज्ञानस्य
उत्पत्ती सत्यां पश्चाद् घटस्य भावः ज्ञायते इत्येवं दृश्यते; अत्र मयि ज्ञानस्योदयात् पूर्वं घटोऽप्यभावः इति
दृश्यते, तद् वन्मयि ज्ञानम् उदयात् पूर्वं घटाभावो ज्ञानाभावेन सह मयि भावाभावौ दृश्येते; मयि तु ज्ञानस्य
पश्चाद् घटभावो ज्ञायते इति
ज्ञानं च मय्यस्ति घटादयः सन्ति, घटादिकं मयि ज्ञानेन विना न दृश्यते; अहम् अतो ज्ञानं मयि न दृश्यते
इत्युक्ते ज्ञानस्य अभावो दृश्यते; मयि घटादिकं ज्ञायते चेत् ज्ञानस्य भावो दृश्यते; एवं मयि भावाभावौ दृश्येते
इत्याह--यथा घटादाविति; अहं ज्ञानं, घटादयो ज्ञेया इति ज्ञाने ज्ञेयान्तराभावे अज्ञानं मयि दृश्यते; अतो
मयि ज्ञानस्य अभावोऽपि दृश्यते; ज्ञानं चेद् घटादिकं ज्ञायते इति ज्ञानस्य भावो दृश्यते; एवं मयि भावाभावौ
दृश्येते इति चेत् तन् न, ज्ञानाभावाद् घटाभावो न दृश्यते; यत्तु घटाद्यज्ञाने मयि ज्ञानम् नास्तीति दृश्यते
घटाज्ञानम् ज्ञायते चेद् ज्ञानाभावोऽपि ज्ञानेनैव दृश्यते इति ज्ञानस्य सर्वदा सद्भावाद् अज्ञानावस्थायामपि
ज्ञानम् अस्तीति निश्चित्य अहं ज्ञानस्वरूप एव इति निश्चीयते ॥४०॥
अहम् इत्येवं सर्वदा भासमानो मयि कस्माद् अज्ञानाभावौ दृश्येते? पूर्वोक्त-प्रक्रियया स्वप्रकाशे मयि
न दृश्येते, ज्ञानेन सह दृश्येते इति चेद् ज्ञानात् पूर्वं मयि ज्ञानस्य अभावो मया ज्ञायते इति मया ज्ञायते
चेज्ज्ञानम् अस्तीत्येव भावः ज्ञायते, घटाज्ञानम् अपि ज्ञानेनैव ज्ञायते; इति ज्ञानस्य अज्ञानावस्थायामपि
सद्भावेन सर्वदा ज्ञानाकार एवेति चेत्, तर्हि अज्ञानेन सह मयि ज्ञानाभावो दृश्यते इति अज्ञानावस्थायाम्
अज्ञानेन सह ज्ञानेन विना मया ज्ञानाभावोऽनुभूयते, अहम् अज्ञानी इति; मयि तु ज्ञानाभावोऽनुभूयते
इति अज्ञानान्वयो मय्यस्ति इति चेत् तन् न; अज्ञानेन सह मया ज्ञानाभावोऽनुभूयते चेद् ज्ञानाभावेऽज्ञानेन
सह ज्ञानाभावम् अनुभूतवान् कः? अनुभूतं चेद् अनुभूत्या सहैव अनुभूतम्; अनुभूतेः पूर्वम् अज्ञानेन
सह ज्ञानाभावोऽनुभूयत इति चेत् तन् न; तस्माद् अज्ञानम् अज्ञानाभावेन सह अन्वेतीति न वक्तुं
शक्यम्, अज्ञानेन सह दृश्यते इति चेद् अज्ञानेन ज्ञानाभावो न ज्ञायते; तस्माद् अज्ञानेन सह अन्वेतीति न
वक्तुं शक्यम्; अतो ज्ञानाज्ञानयोः अन्वयव्यतिरेकौ मयि न भवत इत्याह--
नाज्ञानेनान्वयोऽप्यस्ति, न ह्यज्ञानेन दृश्यते ।
ज्ञानस्य चात्मनोऽभावात् तदभावो न दृश्यते ॥४१॥
अज्ञानेन सह आत्मनोऽन्वयो नास्ति, अज्ञानेन सहात्मनोऽन्वयोऽस्ति चेद् अज्ञानेन सह ज्ञानाभावेन
सह ज्ञायेत, न ह्यज्ञानेन सहात्मनोऽन्वयो दृश्यते; अज्ञानेन सहात्मनोऽन्वयः स्याद्, न तु ज्ञानाभावेन
सह अन्वयः, अज्ञानेन सहात्मनोऽन्वयो नास्तीत्यर्थः ॥४१॥
आत्मा न ज्ञायते इत्युक्ते आत्मनोऽभावो मया ज्ञायते इति वक्तुं शक्यते चेत् तद् अयुक्तम्;
आत्मनः सर्वदा सद्भावाद् आत्मनोऽभावे प्रमाणाभावाद् आत्मनोऽभावो न ज्ञायते, इत्याह--
ज्ञानात्मनो ह्यभावात् तद् आत्मनोऽभावो न दृश्यते; प्रमाणाभावे आत्मनोऽभावो न ज्ञायते
इत्यर्थः ॥४१॥
एवं ज्ञानाज्ञानयोः अन्वयव्यतिरेकौ मयि न स्त इति प्रतिपाद्य आत्मनो नित्यत्वं प्रतिपादितम्
आत्मनः सर्वदा सद्भावेऽपि अहं कर्ता, ममेदं कार्यम् इति कर्तृत्वाद्यभिमानः कस्माद् दृश्यते इत्याशङ्क्य
तद् अज्ञानाद् एव, न तु आत्मनः स्वरूपम् इत्याह--
अहं कर्ता ममेदं कार्यम् इत्यज्ञानेन योज्यते ।
कर्तृत्वादि ततस्तेषां कृतान्तोऽयं न सत्कृते ॥४२॥
अहम् कर्ता ममेदं कार्यम् इति व्यवहारः अज्ञानेन योज्यते; आत्मनः तु कर्तृत्वं नास्ति; आत्मनः
सर्वदा सद्भावेऽपि आत्मनोऽज्ञानात् कर्तृत्वादि योज्यते इत्यर्थः ॥४२॥
तेषां कर्तृत्वादिकं कृतान्तः, कृतान्तस्तु सिद्धान्तः, सिद्धान्ते तु कर्तृत्वम् आत्मनो नास्ति;
अज्ञानेन सह आत्मनोऽन्वयो नास्तीत्यर्थः ॥४२॥
अहं कर्ता ममेदं कार्यम् इत्यज्ञानेन योज्यते, अज्ञानाद् एव कर्तृत्वादिकम् आत्मनि कल्पितम्
इत्यर्थः; तस्माद् आत्मनो नित्यत्वं सिद्धम् इत्याह--
अहं कर्ता ममेदं कार्यम् इति ज्ञानम् अज्ञानेन क्रियते, वस्तुतः आत्मनः स्वरूपं तु नित्यम् एव
इति सिद्धम् ॥४२॥
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Below is the line-by-line representation of the visible glyphs and punctuation:

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99

तथा अचरजकी बात यह नहीं कि विरक्तजनों का समागम या विरह रूपी अमृत अथवा गरल
का पान कोई साधु जन ही करे भी, जो यह काम किए बिना स्वतः सिद्ध परमानन्द स्वरूप
होने पर संसार के समस्त सुख भोगों से परे हो कर उस पदवी को प्राप्त कर गया, या
पहुँचने का अभिलाषी ? क्योंकि उनका तो यह सहज स्वभाव
ही था जिसके न मिलने से संसार के सुख दुखको कुछ समझ सकते नहीं थे।
जब तक आत्मज्ञानियों का यह संग होता था तो वह सुख मान लेते थे और नहीं तो चुप !
बल्कि अचरज तो तब हो जो कोई विषय भोगों विलासों में चूर रहने वालोंमेंसे
भी तो कोई उस सुख तरफ ध्यान दे जो सब सुख ओरों ओर दुःख हरने सर्वव्यापी के भजन
ध्यानसे ?
कहने का भाव यह कि जहाँ तक बने तहाँ तलक संतों महात्माओं के सङ्ग
उसीकी बात ओर उन का प्रेम प्राप्त करने का यत्न करे। उन के वचनों को सुन कर विचार करे
तथापि यह जान रक्खे कि यह सङ्ग प्राप्त होना भी उस प्रभु की दया पर निर्भर
है, जिसके लिये जब भी इच्छा जागे प्रभु परमात्मा से सदा ही सदा याचना वा विनती
करते रहें।
अस्तु, विचार का यह, जो न बन पड़े तो जब तक सच्चा सन्त न मिले
तबतक तो परस्पर सत्संगियों से, महापुरुषों के ग्रन्थ वा पदों का पठन वा श्रवण
करके उनका अर्थ मनन वा उनके उपदेश पर चलने की शिक्षा वा उस उपदेश
पर, स्वयं ही वा दो चार मित्र, आपस मिलकर चलने का उपाय करते रहें। अरे
भाई ! सन्त कभी सत संगी रूप, तो कभी ग्रन्थ रूप बन गये ! यह सत्य ही तो है।
सत्य सुनो ! संत चरण रज रूप तो बन ही सकते हैं।
सन्त चरण रज रूप कैसे बन गये ? आश्चर्य तो यह, वास्तव में ही
सन्त तो रूप है, संत चरण स्वरूप का ध्यान करो, जिससे कि अन्त करण का सब
मल धुल जाये ? यह तो न सन्त चरणों का ध्यान रूप हुआ।
वास्तव में यह, मन जो कि किसी बात पर भी स्थिर नहीं ठहर सकता
सदा इधर उधर भटकता रहता है, उस चंचल मन रूपी पापी पाखण्ड वृत्ति को सब
से, सब ओरों सब भाँति तथा प्रकारसे खींच कर प्रभु प्रेम, प्रभु भक्ति रूपी सन्त
चरण पर लाकर इस भाँति दृढ कर दिया जाये, जैसा किसी वृक्ष की
जड़ पत्थरोंमें जमने से फिर वह सरदी गरमी तथा वायु की
प्रत्येक मार को सहन कर सकती हुई न केवल स्वयं न गिरके मजबूत रहती
है बल्कि दृढ़ वृक्ष रूप में अपने ऊपर भी अनेक पक्षियों तथा प्राणियों का आश्रय
बन कर उनको सब तरह सुख पहुंचाती है।
किन्तु इसके लिये जब तक इस चंचल मन पर संतोंके चरणों की
मार, वा भक्ति रसामृत से सुवासित रंग न लगाया जायेगा तब
तक यह सरदी, गरमी वा अन्य सब प्रकारके सांसारिक सुख दुःखों का
मुकाबला नहीं कर सकता। इसलिये इस मनको मारना ही सब से उत्तम
माना गया है, मनके जीते ही प्रभु के दर्शन संभव जान कर संतों
ने उपदेश भी यही किया।
अब विचार का रूप यह है, जिससे कि प्रत्येक प्रकार-का संदेह मिट
सके, क्योंकि जब आत्मज्ञान रूपी सूर्यका प्रकाश होगा तब अज्ञान रूपी
तम आप ही मिट जायगा। इस लिये सब से पहले उस प्रभु की दया से सन्तों
का, सत्सङ्ग रूपी साधन प्राप्त करने की चेष्टा हो, फिर संतों के इस उपदेश
पर ध्यान दें कि सन्तों ने क्या उपदेश दिया? क्या केवल संतों की
दया? या प्रभु सन्मुख होने की दया का नाम है, इसलिये, जिस प्रकार
सब सुख दाता, सब का पोषक दयालु प्रभु कृपा कर ही रहा, उस की दया
समझ कर उस रूप ओर उस दयापर सब कुछ न्यौछावर करते हुए
प्रसन्न न रहेंगे।
सद्गुरु शरणागत होकर मनुष्य को भय से रहित होकर उस
सर्वव्यापी के भजन सिमरन में लग जाना चाहिये जिससे कि सब प्रकार के संशय
दूर होकर, उस परमात्मा दयाल जी की शरण का सुख प्राप्त हो सके।
मायावती का मोह त्याग कर उस प्रभु के, जो सदा ही सबके साथ है
अंग संग जान कर इस बात का अनुभव करे कि उस की शरण ही सब से बड़ी
है, जिसके लिये अपने हृदय को शुद्ध करे।
जो कि केवल प्रभु भजन से ही संभव है।
100

उक्त प्रकार पत्र लिखकर उसने फाड़कर अपनी जेबमें रखलिया।

"परम आदरणीय पावन चरण में बार बार सौ बार साष्टांग प्रणाम सहित पत्र का शुभ समाचार
विचार कर आशीर्वाद प्रदान करें तथा पत्र का उत्तर भी अवश्य भेजें जिससे इस अधम पापी को भी
प्रभु चरणों की भक्ति मिल सके।"
उक्त प्रकार पत्र लिखकर उसने फाड़कर अपनी जेबमें रखलिया।
उनके पश्चात उस साधुवेषधारी पुरुष का ध्यान पुनः प्रारम्भ
"भगवन् यह तो आपने बहुत ही बुरा किया हमारे साथ"
ऐसा कह कर भगवान् शंकर की उस भव्य प्रतिमा मूर्ति तरफ उसने दो दो अश्रु प्रवाह
की धारा छोड़ना तो प्रारम्भ
किया ही था कि उस मूर्ति के पीछे, जो भगवान् की प्रतिमा विशाल दिखाई पड़ती
उसके पेट तक का भाग तो पूरा दिखाई दे रहा था केवल दो चरणों का ही भेद था, उस पर
एक तो पर्दा सा था, सो वह पर्दा उड़ता उड़ता साम्ने दीवार से जा लगा सो तो कुछ भी
दिखता नह था सो यह बात, जो उस मूर्ति, का चरण था, वह तो न निकला
केवल दो चरण ही थे, जिनको देखकर उसने समझा कि यह जो ऊपर धड़ पड़ा
सो यह सब उस पर्दाके उड़ने पश्चात सो लगा, केवल चरणों तक ही सब विचार सो लगा
सो केवल दो पग पड़े थे। अब उसका पग भी इस पग से मिलता तो था। परन्तु सो पग
था, सो वह कुछ भिन्न था; लेकिन केवल इतना ही तो भेद था कि जो चरण, उस मूर्ति
रूप में दिख पड़ा उससे मिलता हुआ तो था परन्तु वह स्वयं उन चरणों से भिन्न तो
था ही फिर उसने उस स्थान पर
जो देखा सो यह, ध्यान मग्न था, केवल स्वयं था, ध्यान से भिन्न, केवल योग-
ध्यान द्वारा समस्त ही ज्ञान रूप से ज्ञात हुआ, इसलिए सो भेद तो सब जान गया
कि यह मूर्ति वास्तविक, केवल किसी के तपस्यासिद्ध रूप-रंग का यह प्रभाव पड़ा
जिसके यह दो चरणमात्र ही दिखे हैं इस समय और शेष तो सब लोप हुआ, जो
वास्तव में केवल उसका सूक्ष्म रूप ही रहा था, केवल तपस्या के बल से, उस
महातपस्वी ने केवल दो चरणों को केवल मात्र दर्शनीयता के लिए छोड़ दिया
और स्वयं तो सब कुछ समेट कर विलीन हो ही गया, केवल यह सब तो उसके
तपस्या प्रभाव का अलौकिक प्रभाव मात्र प्रत्यक्ष हो ही रहा था इस प्रकार,
उसने सब भेद को समझ
कर ही अपने मन में यह बात की, वास्तविकता वास्तव में सब इस
ही प्रकार, सच ही तो थी, विचार कर यह तो स्वयं आश्चर्य में डूब गया फिर
भी, भगवान् शंकर के सम्मुख दोनों हाथ जोड़कर उसने कहा कि हे शंकर यह तो
केवल आप ही लीला समझ, सब न ही समझता था, पर इस महान् तपस्वी के तो
दर्शन--दर्शन होकर भी न हो सके--कदाचित् इस संत का तो दर्शन पूरा हो
जाता इसलिए शंकर, तू यह कृपा करके कम से कम इतना तो कर देता, जिससे,
इनके चरण तक सब का भला कर ही देता सो उद्धार तो इसका होता, सब इस
प्रकार स्वयं मन में विचार
तो करता गया, सो सब अन्तर्यामी तो सब ही ज्ञान था ही किन्तु फिर
भी प्रभु ने उसकी इस उत्कट अभिलाषा जानकर सो तो उचित किया
जिससे कि जो इस तपस्वीका शरीर था--वास्तविक रूपमें कभी जीव--तो
वह भी था नहीं किन्तु तो, सब लोप था, सब शून्य था, सब प्रभु माया थी; न तो
कोई जीव बचा, न कोई ज्ञान शेष था, सब तो स्वयं विलीन हुआ था?
अब सब बात समझ कर वह रोता ही था, यदि ऐसा ही होना था प्रभु
तो सब कुछ सत्य ही, सब ही संत जन इस प्रकार ध्यान मग्न हो प्रभु चरण में
लीन हो ही गये इसलिए तो उस संत का कोई रूप तो बचा नह? क्या सो संत का
ज्ञान-युक्त रूप तो सब लीन हो ही गया न बचा था, तो सब माया ही तो थी
केवल दो पग मात्र स्वरूप रूप प्रत्यक्ष था सब इसके पीछे क्या? क्या केवल यह
माया ही का स्वरूप था सब कुछ संत जन का क्या?
ऐसा विचारकर केवल आर्तभाव से नयन जल से तर और स्वयं दुःखी, केवल
उस महातपस्वी मूर्ति स्वरूप के साक्षात् दर्शन मात्र से ही तृप्त हो जाना तो चाहता
अथवा सो, मन ही स्वयं सब कुछ जानता ही था, किन्तु फिर भी ध्यान का रूप,
केवल स्वयं रूप ज्ञान रूप अनुभव मात्र ही समझ कर फिर पश्चात्ताप-युक्त
केवल पग चरण स्पर्श कर अपनी भक्ति प्रदान कर स्वयं भी उनके चरणारविन्द की सेवा
का ही भाव विचार कर सोता रहा
जिसे भी केवल यह अन्तर्यामी ही कृपा जानकर उस पर न उस पर कृपा
कर उस पर दया की तथा सो, जो कुछ सब संत जन पर तो कृपा ही संत जन न
101

कष्ट हुआ, जिसे देखकर वह राजकन्या अट्टहास कर हँसती हँसी। राजाज्ञा का उल्लंघन
करके उसने अपने दोने को फेंक तो दिया किन्तु साथ ही यह घोषणा भी कराई निष्कासित कर
दिया गया यह सब पाप का फल मिला भोग।
उसने सोचा सही, क्योंकि राज्य का भोग कर रहा था तो नियम का पालन करना
पड़ा।
यह कर्मफल का सिद्धांत सबमें व्याप्त दिखाई देता है। अब प्रश्न यह उठता
कि राजा को यह नियम लागू क्यों नहीं होता? जैसाकि राजा-महारानी के विषय कहा जाता
है, किसी का निष्कासन अथवा न होना क्या कर्मसिद्धांत के वश में नहीं है, अथवा
वह सब प्रकृति के नियम से परे हैं? कर्म का सिद्धांत तो सब पर लागू हो रहा
सम्राटाधिपति हो चक्र-वर्ती हो, चाहे रंक सब नियम में? कर्मसिद्धांत का पहला पद
ही कहता कर्म सर्वोपरिधिपति या राजाओं का राजा तो कर्म सब पर एक सा।
जब विचारणीय यह तथ्य हो जाता तब यह शंका ही नहीं कि राजाज्ञा सर्वोपरि या
नियम। निष्पक्ष न्यायपालिका तो यही कहती कर्म सब पर एक सा दंड दे। पर जब उस पर
ही प्रश्न उठ खड़ा हो जाता तब कर्म के प्रति एक शंका का समाधान भी आवश्यक बन
ही जाता। यह विचार आज अथवा कल का नहीं यह तो युगों-युगों का एक विवादस्पद प्रश्न
ही रहा। अब न्याय व सत्य को परखने की स्थिति निष्पक्ष होकर कही जाए जिससे
कि एक बार सब भ्रम का पर्दा दूर होकर सत्य का बोध हो सके, यह कथा, यह संदर्भ या
यह तर्क सब एक ही ओर इंगित करते कि कर्म बलवान होता है।
व्यवस्था एक जैसी; जैसी व्यवस्था का नियम सब व्यवस्था पर एक जैसा लागू
होता यह न केवल भारतवर्ष की ही बात अपितु यह न केवल चीन या यूनान व रोम,
सब जगह यह विचार, इस प्रकार का न्याय सभी जगह एक जैसा दिखाई देता, किन्तु
यह भी सच कि समय व काल परिस्थिति के प्रभाव न्याय को बदल दिया, तो क्या न्याय
न्याय नहीं रहता या कर्म फल सत्य से परे फल देता यह चिंतन तथ्य ही नहीं बनता है,
वास्तविकता यही सिद्ध होती कि व्यवस्था का नियम सब पर एक जैसा लागू।
जब किसी, का कोई काम पूरा अथवा सही फलदायक नहीं होता तो उसका कारण
पूर्वाग्रह अधिक प्रभाव छोड़ता जो पहले ज्ञान को नष्ट कर देता तथा यह भी सच है, कि
व्यवस्था का नियम सब जगह एक जैसा-सा, नियम-विधान सबमें एक सा ही फल
देने वाला, फल की इच्छा चाहे जैसी क्यों न की गई हो फल एक जैसा ही मिलता
सब को, यह तो सत्य सिद्धांत व्यवस्था का अटल सत्य माना गया। कर्म फल
भोग में अंतर आया, कर्मफल भोग सदा से व्यवस्था, पर, फल भोग का भाव निष्पक्ष
ही रहा, व्यवस्था सदा ही अपनी प्रभावशीलता से सबको प्रभावित करती रही। व्यक्ति
प्रभावित हुआ, दूसरा नहीं यह प्रश्न कई बार खड़ा होकर भी कर्म-प्रभाव ज्ञान जब
तक प्रभावशील या सशक्त है, सब ज्ञान पर प्रभाव सदा
व्यक्ति की विचारशीलता का प्रभाव ज्ञान पर पड़ता है। ज्ञान ही तो भ्रम पैदा
करके भ्रमित करता तथा वह भ्रम निवारणार्थ, व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार
ठहराया जा सकता है?
सब कर्म का प्रभाव ही तो इस तरह से स्वयं को दिखता सब प्रभावित
सब को प्रभावान बना कर स्वयं यह सिद्ध हो गया कि कर्मफल से परे कुछ नहीं व
निष्पक्ष सब फल सब व व्यवस्था को यह विचारणीय फल दिया कि राजा प्रजा कोई
भिन्नता ही नहीं, कर्म सबको समान व्यवस्था के फल का रूप देता व निष्पक्षता
वास्तविकता का रूप, जो भ्रम में पड़ता? वह राग-द्वेष ग्रस्त होकर सत्यता स्वीकार
कर ही नहीं पाता अतः कर्म-ज्ञान सत्य, कर्म ज्ञान सत्य, कर्म सिद्धांत
पूर्ण सत्य-ज्ञान का अंग, जो स्वयं निष्पक्ष व समस्त मानव जाति धर्म सत्य ज्ञान
लिए एक जैसा सत्य स्वरूप, जो सदा सत्यता को व्यक्त
कर्म ही करता व कर्म ही सब सिद्धांत व सत्य रूप, सो भी प्रत्यक्ष जैसा
व्यवस्था रूप या कर्म क्रिया रूप, जो व्यवस्था को व्यक्त कर रहा, सो सत्यता
ही, राग--द्वेष के कारण ही अंतर कर्म-ज्ञान रूप में सब जगह देखा जा सकता
देखा गया।
व्यवस्था सत्य का रूप व्यवस्था सत्य रूप में ही सब जगह फल देती? जैसा बोओ
फल पाओ! सत्य कर्म-ज्ञान का अंग, ज्ञान कर्म व सत्य, व्यवस्था सत्य विचार की
दिशा का फल है।
कर्म का विचार जो ज्ञान को सत्यता प्रदान करने वाला, व्यवस्था राग-द्वेष
परे ज्ञान का एक रूप सत्यता रूप ज्ञान का दाता, व्यवस्था सब प्रकार विभ्रम
से परे सब भ्रम सर्वथा शून्य करने वाली तथा सब भ्रम विनाश करने वाली बनती,
102

जब परमात्मा जीव को अपने स्वरूप बोध करा देता अथवा कराता, अथवा जीव
परमात्मा स्वरूप स्थिति को प्राप्त कर ले तब प्रकृति शून्य स्वरूप सब शून्य
भासता, अथवा उस रूप दृष्टान्त स्वरूप समझता, अथवा इन सब दृश्यमान
सांसारिक रूप प्रपंच स्वरूप शून्य महामाया अथवा रूप रस गंध शब्द स्पर्श
प्रपंचमय स्थिति को पार कर
अपनी सत्ता स्वरूप को जानता तब आत्मा या परमात्मा को भिन्न
जान भ्रम मान कर अज्ञानता को दूर कर लेवे या, प्रकृति का सम्बन्ध आत्मा या
परमात्मा स्वरूप भेद, अथवा भिन्न रूप जान कर या मान कर मुक्ति या मोक्ष पद
को पा जाता जिस प्रकार कंचुकि नागिन छूट, अथवा सर्प रूप से कंचुकि भिन्न
हो कर स्वतः नष्ट स्वरूप हो जाता या दूर हो जाता कंचुकि सम्बन्धित का ज्ञान छूट
के, प्रकृति का त्याग कर परमात्मा रूप रस विहीन स्वरूप पाता, भिन्न भिन्न न जान
एक रस पूर्ण स्वरूप जान के अपने रूप रस स्वरूप को, सो इस ज्ञान रूपी अमृत
शक्ति स्वरूप को, बिना स्वाध्याय योग के बिना गुरु शक्ति के प्रकाश के ज्ञान, मुक्ति
या परमात्मा को जान सके
जिसके लिए कहा, आत्मज्ञान बिना सब, प्रकृति स्वरूप ज्ञान भ्रम या भ्रम
का ही रूप या मिथ्या अविद्या का रूप है, सो कैसा है? जो जीव भ्रम में, प्रकृति
स्वरूप या प्रकृति के प्रपंच रूप नाम रूपान्तर को सत्य मान कर या जान कर रूप
रस के वश हो कर या आसक्त हो कर फंस रहा या, अज्ञानता स्वरूप काल के
या उस प्रपंच के वश ज्ञान रूप स्वावलम्बन से, प्रकाश के ज्ञान या ज्ञान रूपी
मुक्ति
मार्ग को विस्मृत करता, जिस से जीवात्मा या जीव का नाम रूप रस प्रपंच
स्वरूप, काल रूपान्तर प्रपंच में जन्म जनम कर भ्रम चक्र भ्रम में फंस कर, या
उस भ्रम रूप विषय के अज्ञाना अन्धकार स्वरूप रूपी कूप में गिरता या गिर
कर काल के मुख पराधीन हो जन्म मरण स्वरूप में पड़ दुःखों को भोग कर त्राहि
त्राहि कर रोय परमात्मा से दया याचना करता जिस प्रकार कंचुकि का सम्बन्ध सर्प से
छूट जाता है! सो इस प्रकार का विवेक जब
प्रकट होता तब, "सब को सो जाने या जान कर या इस रूपी प्रपंच भ्रम
को, या कार्यकारणात्मक कर्म फलादि जान कर, प्रकृति से पार पद पाता" जिस
पद को प्राप्त कर जीव न तो इस रूप प्रपंच विकार रूप न ही इस प्रकृति रूप
मायाजाल का भोग कर दुःख पाता या स्वावलम्बन पद को प्राप्त कर
प्रकृति रूप प्रपंच से अलग पार हो जाता जिस प्रकार कंचुकि रूप सर्प
विकार से रहित हो कर उस त्याग देता या त्याग कर अलग स्वरूप भोग कर पर
रूप ज्ञान को प्राप्त कर मुक्ति को प्राप्त कर लेवे उस
जीव रूप उस रूप परम पुरुष रूप को परमात्मा या परमेश्वर या जो
परमेश्वर रूप उस रूप सत्य स्वरूप को जान लेता, जिस ज्ञान के बल, या उस
ज्ञान के बल से? सो सो उस ज्ञान से? जिस ज्ञान स्वरूप को पा कर न शोक हो
न ही मोह या जिस ज्ञान शक्ति द्वारा जी? सो कैसा या कैसा है? इस प्रकार का
संशय या भ्रम ज्ञान रूप अज्ञान विचार को मिटा कर यह इस ज्ञान की महिमा
स्वरूप ध्यान में लीन हो अज्ञान विचार को दूर कर के ज्ञान रूपी प्रकाश रूपी
ब्रह्म को, सच्चि? आनन्द का ध्यान कर लेता, व मुक्ति रूप स्थिति
मुक्ति रूप से प्राप्त होवेगा सो, हे ज्ञान रूप या दिव्य ज्योति! जिस ज्योति
का तेज उस तेज स्वरूप में हो कर स्थिर तेज स्वरूप का साक्षात्कार
जिस पुरुष रूप का मन-मस्तिष्क या विचार रूप या निर्मल शक्ति से, सो सो
साधक
निष्काम परोपकारार्थ ही कर्म करता हुआ सब का, प्रकृति से परात्परता को
सिद्ध कर रहा हो, सो साधक ब्रह्म विद्या प्रकाशक कैसे बनेगा? क्योंकि उस
काल में उस काल, स्वाध्याय नियम से रह कर स्वाध्याय योग को छोड़ कर
निष्काम जन-हित रूप को सब त्याग कर ही तो ऐसा हो सके गा! जिससे कि सब
जन! उस साधक के पद तक पहुंच सके! इसके लिए उस रूप ऐसा
ही जो साधक होगा उस साधक ज्ञान रूप उस तेज को प्राप्त करने के
पश्चात् ही ज्ञान तेज, प्रकाशक या ब्रह्म-पद को उस ज्ञान तेज रूप प्रकाश के ज्ञान
किरण रूपी प्रकाश को सब ओर फैला कर ही तो सब रूप जन हित स्वरूप का कार्य
करेगा जिस प्रकार से सूर्य अपने तेज को सब ओर फैला कर स्वावलम्बन से, तेज
से, सब को प्रकाशक हो ज्ञान या तेज रूप को, सब प्रकाशक हो अन्धकार रूप व अज्ञा
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उपशमभावके समान अन्य कोईभी दूसरा गुणवान् नहींहै। इसकारण आत्माको शान्तरूप अपने
स्वभावकी प्राप्तिही परम सुखका कारणहै। संसारकी सब वस्तुएं तो क्षण मात्रके लिये सुखका
निमित्तमात्र बनकर फिर सौ गुना दुःखका कारण बनती हैं। उस कारणसे जो वस्तुएं सब दुःखों को देने-
की, हर एक प्रकारका क्लेश करानेवाली हैं। उन सब वस्तुओंको दूरसेही छोड़ना चाहिये।
इस तरह जब आत्मारामका ध्यान लगाया जावे तब ऐसा विचार कभी नहीं करना, जिससे कि
अपना चित्त चंचल होकर ध्यान से भ्रष्ट होजाय। अथवा ध्यान तो छूटजाय, पर दूसरा कोईभी
ऐसा विषय रूपी कीचड़ न मिले जिससे कि आत्माको शान्ति मिलसके, जिससे कि परिणामों
स्वरूप बिगड़ जावेगा, जिससे कि कर्म-वर्गणाके पुद्गल रूपी परमाणुओं का रस वा परिपाक
बिगड़कर, जो रस वा फल दुःख रूप मिलना था वह अति तीव्र रूप हो, उसका फलभी सब ही
प्रकारसे आत्माको दुःख रूपही भोगना पड़े।
इस लिये आत्माको इस बातका विचार, जिससे परिणाम चंचल हों और रस घट जावे,
परिणामोंकी धारा बिगड़ जावे और आत्मा अशान्त होजाय। आत्माके कल्याणकी इच्छा करने-
को तो सब प्रकार अपने आत्माको ज्ञान स्वरूप, सब पर द्रव्योंसे उदास और पर द्रव्योंके
विषय रूपी? परिणाम होने योग्य?
ऐसा विचार करें, जिससे कि आत्मा और कर्म-वर्गणा के मध्यमें भिन्नता हो कर
यह निश्चय करने की कोशिशकी जाय कि यह शरीर पुद्गलका बना हुआ पुद्गल रूप है।
इसका रूप रस गंधादि पुद्गलमय होनेसे यह पुद्गलके धर्मवाला ही रहेगा। पर मैं पुद्गल
का, इसके रूपका, गंधका वा अन्य पर भावोंका स्वामी न होकर अपने शुद्ध ज्ञान-दर्शन
का स्वामीहूं।
मैं तो शुद्ध ज्ञान स्वरूपहूं।
इस पर भी यदि कोई यह शंका करे कि क्या आत्मा कभी? ऐसा बन सकताहै?
तब उस शंकाके उत्तर में समाधान इस तरह से हो सकता है कि जिस प्रकार दूधमें
मिला हुआ जल, जो कि देखने में सफेदी लिये हुये अपनी सफेदी रूप दूध ही के साथ एक रूप
रहता हुआभी, जब हंसके मुख द्वारा दोनोंका पृथक्करण ( अलगाया )जाताहै तब जल
अलग ही, और दूधअलग ही रहताहै, इसी तरह जिस प्रकार तपे हुये लोहेमें अग्नि जलके
सम्पर्क से नष्ट, वा उस सम्पर्क से निवृत्त होने योग्य हो जाती है। उसी प्रकार आत्मा व
कर्म
दोनों परस्पर मिले हुये हैं, पर आत्माका रस नष्ट नहीं, केवल पुद्गल
परमाणुओं का ही रस घट बढ़ सकता है। जो आत्माके साथ अनादिकालसे सम्बन्धमें
आ रहे हैं। उन कर्म-परमाणुओंके रसमें और आत्माके गुणोंमें अन्तर है। इस लिये जो ज्ञान
स्वरूपहै, उस रूप ही? उस रूप कभी नहीं? इस प्रकार से विचार करे।
अथवा ऐसा विचार करे, जिस प्रकार सुवर्ण रूप धातु खानमेंसे जैसी निकलतीहै,
उसमें किट्ट वा मैल वा कीचड़ प्रचुरतासे लगा हुआ रहता है जिससे न उसका रूप ही
दिखाई पड़ताहै और न यह, कि इस सुवर्ण पाषाण में कितना वा क्या सुवर्णका रूप और
वजन है। इसका ज्ञान भी नहीं होता, पर जब सुवर्ण पाषाणको अग्निमें तपाया जाता है तब
शुद्ध! सुवर्ण अपने रूप और गुण सहित उस धातुके रूपमें प्रकट होकर ही रहता है। यद्यपि
वह सुवर्ण पाषाण अवस्था में तपाने पर मल और तपने रूपी दुःख को सहता है,
जिसके बाद वह अपने शुद्ध स्वरूपमें प्रकट होता है। इसके समान? सुवर्ण रूपी तो यह
आत्मा अनादि कालसे कर्मों रूपी पाषाणके समानहै? अथवा किट्ट और कालिमाके समानहै?
जब यह ज्ञान रूपी अग्निके द्वारा तपाया जावेगा, कर्मोंका विपाक हो कर
ज्ञान स्वरूप शुद्ध होकर यह आत्मा अपने ज्ञानादि कर्म-हीन हो, केवल ही शुद्ध
आत्मा रहकर जो इस समय है, उससे न तो कम आत्मा रहेगा और न अधिक होगा,
ऐसा विचार करे? इस विचारको ही भेद या भिन्न
ज्ञान कहा जाताहै। पुद्गल वा शरीरसे अपने आपको भिन्न जानना, पर द्रव्यों को
अपने स्वरूपसे सर्वथा पृथक्‌ही समझना, यह सब अध्यात्म या व्यवहार-नयके
इन दोनों का स्वरूप ज्ञान द्वारा जाना जा कर अपने ध्यान में लीनता की जाय तब कर्म
क्षय होने पर आत्मा ज्ञानानन्द स्वरूप सुखको प्राप्त होताहै, जिस सुखका भोग यह
सदा ही करताहै।
जो मनुष्य ध्यान, तप वा अध्यात्मके द्वारा आत्म रसका पान करलेता है,
वह संसारके सुखों को तृणके सम, तुच्छ समझता हुआ विषय, भोगों तथा इन्द्रियके सुखों
को कीचड़-समान मन्द वा तुच्छ समझ कर न तो विषय रूप भोगोंके भोगनेकी ही इच्छा
करता है। न ही वह भोग रूपी सुखोंमें भ्रष्ट? ही हो सकताहै। इन सब बातोंका यही
सारांश है, कि सब ही पर द्रव्यों को न छूकर, केवल ही अपने रूप में लीन, मग्न वा तल्लीन होना
104

विभूति को पा सकेगा या विज्ञानालोकित पद पावेगा और, उस समय राजा या प्रजा
हो !
पर केवल इस बात आत्मोत्कर्ष से, या आत्मविकास से काम नहीं चल सकता
विचार से विचार का मेल और सहानुभूति विहीनता का स्थान नहीं पाता अतः न
वैयक्तिक विकास सार्वजनीनता के साथ जब सम्बद्ध हो तभी वह जनो-
पयोगी काम कर सकता तथापि इस बात को भी न तो हम ही अस्वीकार
रूप दिया जा रहा था और न ही इन दोनों में इस बात का ही कुछ विरोध
उपस्थित था केवल उन दोनों के मन में इस बात में मतभेद मात्र दिख रहा था,
सम्भवतः, जो हो सो हो, परन्तु यह बात तो निश्चित रूप से स्पष्ट हो
सकती है कि उस युग तक जन सत्ता का उदय
अपने आप नहीं था, न ही वह अपने बल पर था, न कोई वैसी चेष्टा ही
इधर से हो सकी थी जिससे यह कहा जावे कि जनता ने अपने अधिकार को पा
था, अथवा जन तंत्र
बात ऐसा था, जिसे दो जन नेता सुलझा
या सुलझाने का यत्न कर रहे थे तथा इन दोनों का स्वरूप न
तो एक सा था ही, न जन नेता इस बात बात को ही जन के हित में सोच
कर रहे थे? केवल वे अपने पक्ष को इस दृष्टि से, जिस से उनका ही
मत माना जावे विचार रहे थे और जब यह बात हो गई, जिसे दो
नेता जन के नाम पर जन
का भला कर रहे हों अथवा न कर रहे हों, अतः उस व्यवस्था के
लिए यह तो मानना, स्वाभाविक ही होगा कि जन का बल न तो था,
न था तो इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह एक
साधन अवश्य ही बन गया था और इस बात का प्रमाण भी इस बात
द्वारा हो जाता रहा जिसे हम ने देखा कि व्यवस्था के अनुकूल जन,
जिसे चाहे इधर कर ले या उधर कर ले अथवा जन अपने को जिस ओर
चाहे ले जावे ।
दूसरी बात यह भी थी कि उत्तर-मध्य काल प्रायः सब तरह अशांत
रहा था न केवल-मध्य काल प्रायः सब तरह अशांत ही था जन-मन भी उस काल
में न केवल क्षुब्ध, पर बात ऐसी अवस्था में जन का काम तो न हो कर
ही काम बन रहा था तथा जन का मन ही न तो इस बात के लिए
तत्पर था कि जन अपने रूप को समझे, न यह बात, जिससे जन को लाभ हो
कर सके, प्रत्युत वे तो एक, जो राजनीतिक रूप से अपने हित को ही
सोच रहे थे उनका
अनुगमन ही करते रहे या यों कह लें कि राजनीतिक सत्ता के जन को
बना ही ले रहे थे अथवा, ले ही रहे थे, पर इस बात की भी कोई चिन्ता
नहीं की जा रही थी तथा कोई ऐसा भी यत्न नहीं किया गया था कि
जनता को इस बात का तो बोध दिया ही जावे जिससे? वह उस रूप
को न समझे जो जनता के हित की बात थी; सो वह रूप
विहीन
केवल राजनीतिक ही दृष्टि तक ही सब कुछ सीमित था और यही
राजनीतिक जन सत्ता को जन्म दे, जिस से आगे जन सत्ता का रूप निखरे,
यह सम्भव, जन विहीन सत्ता अपने सीमित स्वरूप को, जिसे जन कहा जा
ही सकता के प्रभाव से परे न होने दिया तथा इस से जन को
इतना लाभ मात्र हो सका कि वे केवल अपने स्वत्व को समझने के लिए
ही जाग सके, जिसे वे जन हित समझ कर ही नहीं रहे बल्कि न तो अपने
हित को समझ सके, न अपना विकास ही कर सके ।
क्या राजनीतिक सत्ता से जन-हित सम्भव है? जन का यह स्वरूप उस काल
तक बना रहा अथवा न रहा? इस पर तो विचार किया ही जाना चाहिए
क्योंकि मध्य कालीन इतिहास के जो पृष्ठ हैं, वे केवल, राजनीतिक ही रहे हैं
जिस जन का, जन सत्ता के पक्ष से सम्बन्ध
व्यवस्था जन आन्दोलन के रूप में तो काम करती रही! व्यवस्था
का भी आधार जन आन्दोलन ही, जिसे जन आन्दोलन न भी कह सकें,
पर उस का रूप तो यही था जिस से जनता को ही लाभ हो या हानि और
105

इस बात सम्भावनाओं पर, विचार तो सब कर रहे थेलेकिन इसका कोई उपाय सो, किसी
पास न थाअथवा किसी उपाय के योग्य नथा
इस परिस्थिति मे भी सब उपस्थित थे, न सब युधिष्ठिर के, न सब
दुर्योधनके पक्ष मेथीउनमे से बहुततो, इन दोनों परिवारों अथवा दो राज
परिवारों के दो अलग होने पर भीनये उभरे उस राज्य के साथ उसी प्रकार जुडे
रहना
का दावा करते आये थे। राज्य इनके भरोसे नहीं था और न ये लोग राज्य के भरोसे जीते।
यह केवल कुछ ऐसा वर्ग था जो अपने को उस समय तक के किसी राजा से भी अधिक,
सम्मानीय पद का धनी
कह रहा था। केवल यही वर्ग था जो दोनों ओर की बात सुन सकता था, दोनों पक्षों
बात सुन कर इन पर प्रभाव डाल कर इन दोनों-को अपने प्रभावकारी निर्णय स्वीकार करने को बाध्यकर
इस विग्रह को टाल सकता था, यदि इनके पास कोई ठोस विकल्प होता।
युधिष्ठिरका रुख तो इस विषय मे स्पष्ट था, वह तो अपना हक
छोडने वाले नही थे।उन्हें इस बात का, जिसे वो अपनी सत्ता का भाग कह रहे थे
की विशेष चिन्ता न थी।वे जानते थेकि इस प्रकार के अधिकार तो उनके
भीष्म पितामह से ले कर तक प्रत्येक पुरुष के पास थे। बस नहीं था
अधिकार तो वह था केवल न्याय का और न्याय का जो निर्णय होता था उस पर
राज्य का विधान काम करता था। यदि युधिष्ठिर केवल राज्य-भाग चाहते तो केवल पाँच
गाँवकी ही माँग कभी न करते। इस प्रकार पाँच गाँवों की माँग करके, वह इस
अधिकार के साथ न्याय विधान स्थापित करने के लिये वचन बद्ध थेऔर यह अधिकार ही
उन्हे प्राप्त "नहीं हुआ!"
यह अधिकार केवल राज्य तक ही सीमित नहीं था या केवल हक तक ही नहीं था।
वास्तव मे तो यह सब उस न्याय की बात थीजिस पर आगे आने वाली सभी पीढि-
योंको अपना जीवन बिताना था। यदि इस समय वे किसी के दबाव मे आ कर पीछे हट
ते, यदि वो न्याय के साथ न खडे हो पाते तो फिर सब कुछ उलट-पुलट हो कर रह
ही जाता, जिसे बचाना ही युधिष्ठिर
न्याय का पर्याय मानते थे, धर्म का सार, जिससे मानव जाति निर्बाध रूप
अपने मार्ग पर बढती, चलती; जिसे सब प्रकार के संशय कभी कोई नया संकट
खडा न कर सकते । वे इस अधिकार, न्याय के साथ थे; इसलिए वे अपने इस
निश्चय पर से कभी न हटते । इस सब के बाद जो कुछ भी था, केवल यह देखना
था, कि कौन उन के साथ था अथवा उन की बात मान कर इस पर चलता
जब कि दुर्योधन का रुख, अपनी महत्वाकांक्षा तथा उन सबोँ का था
जो केवल आज की सत्ता के साथ जुडे रहने को ही अपना धर्म मान रहे थे और इस
लिए वो राजा की ओर से मिलने वाले हर अन्याय के साथ खडे हो कर अपने
स्वार्थ को ही सब कुछ मान रहे थे।अन्याय की सीमा भी राजा के साथ बँधी
थी, जो वो कहता था, उसी को अपने हित के लिए सब कुछ माना जा रहा था, न किसी
को
प्रकार की भय था या फिर अपनी ओर से कोई नयी बात कहने का साहस
रह गया था।इस प्रकार सत्ता के सहयोगियों का यह रूप आज भी कम या ज्यादा रूप
मे सब को ही हर जगह देखने को मिल सकता है। आज भी, सत्ता के ऐसे
रूप साथ
लगे हुए चाटुकार हर बात पर ताली बजाने को तैयार है! राजा सब कुछइनकी
ही सहायता से करता जाता है, न तो कभी प्रजाकी भलाई का ध्यान, केवल अपनी
और अपनों लाभ अधिक दिखाई पडता है।जिसके परिणाम भयंकर होते जातेहैं,
आज स्थिति ही कुछ ऐसी है! केवल सत्ता चाहिए या फिर धन! इसके बाद सब कुछ
राजा के ही साथ है, राजा केवल धनवानों का राजा है! जो भी हो आज यही बात
सामने आ रही थी, दुर्योधन के इस रुख से प्रत्येक हैरान था, वो भी
जो उसके पक्ष मे खडे थे या उसके दल मे अपने लाभ अथवा भयवश ही शामिल हो रहे
थे। न कोई विचार
केवल अपने लाभ का, अपने यश, अपनी साख, सम्बन्धी बातों तक ही
था, केवल भीष्म को ही इस परिस्थिति का दुख था जो सब के ही थे।लेकिन
इस सबमे? सब का न्याय कहाँ खडा था? आज भीष्म किसी लायक नहीं थे,
जिनका केवल नाम मात्र ही था? सब दुर्योधन के? शक्तिशाली दुर्योधन के साथ
106

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इसका कारण यही था केवल भक्ति द्वारा ही प्रभु प्रसन्न नहीं हो सकतेथे। अतः केवल ज्ञान का
योग भी उनको प्राप्त नहीं करवा सकता क्योंकि इन धारणाओं का विपरीत परिणाम
आगे आ सकता, पर दोनों का सम्मिलित संगम ही प्रभु प्राप्ति का या प्रभु कृपा
प्राप्ति का साधन बन सकता था। अतः, केवल भक्ति का या केवल ज्ञान निष्ठा का पक्ष नहीं
लिया, लेकिन इन दोनों ज्ञान निष्ठा कर्म निष्ठा का समन्वय, दोनों का फल प्रदान
कर दिया गया तथा निष्कर्ष निकाला गया जिसके बिना कर्म निष्ठा भी निष्फल मानी जा
रही थी; पर जिस ज्ञान, सत् चित और आनन्द रूप का स्वरूप प्राप्त नहीं था; पर जिस ज्ञान, उस
ज्ञान विज्ञान का समाधान भी गीता ने स्पष्ट कर दिया था, कि वह ज्ञान
अज्ञान का रूप, केवल उस परमात्मा का अंश रूप, उस ईश्वर का अंश रूप जीवात्मा
का रूप माया का शिकार होकर अपने रूप को भूल जाता है, अहंकारवश उस पर प्रभु कृपा,
उस समय केवल यह जीवात्मा माया का शिकार होकर, उस प्रभु स्वरूप को परमात्मा
का सनातन अविनाशी स्वरूप मान लेता था इसलिए उस परमेश्वर को केवल परमात्मा रूप में,
उस परमात्मा सर्वव्यापी रूप मान कर जब तक वह निष्काम भावना से कर्म नहीं कर सकता
जब तक निष्काम भावना से कर्म नहीं किया जाता था तब निष्काम भावना, ज्ञान निष्ठा का
स्वरूप निष्काम था, वह ज्ञान ही प्रभु का स्वरूपमय ज्ञान था जिसमें केवल अपनी आत्म
निष्ठा केवल उस प्रभु रूप ज्ञान परमात्मा का स्वरूप रूप अहंकार निष्ठा थी। इस
रूप को नष्ट करने का जो परिणाम गीता ने प्रस्तुत कर दिया था वह रूप ही प्रभु का
रूप बन गया था!
गीता के अनुसार यह जीवात्मा ही केवल अहंकार वश, ईश्वर का स्वरूप
मान कर केवल परमात्मा स्वरूप मानकर अपने को सदा अहंकार स्वरूप बना-बैठता था,
जो ईश्वर स्वरूप मानकर अज्ञान रूप से इस माया के कर्म चक्र में चक्कर काटता
अज्ञानता के कारण अपने स्वरूप को खो कर उस ईश्वर के उस शाश्वत स्वरूप को खो, उस
सर्वेश्वर के ही स्वरूप माया, भगवान् के स्वरूप रूप जीवात्मा के स्वरूप को
ईश्वर का सनातन सनातन रूप नहीं मान सकता था।
ज्ञान निष्ठा द्वारा, केवल यह मानकर कर्म निष्ठा का रूप भी यह मान कर
उस ईश्वर स्वरूप मान लिया जाता था, केवल निष्ठा रूप मान कर, स्वयं को ईश्वर
मानकर सब कुछ, न उस प्रभु, न उस परम निष्ठा स्वरूप परमात्मा को ईश्वर मान
कर केवल स्वरूप ही, ज्ञान का रूप माना जा रहा; पर निष्ठा केवल
ईश्वर के स्वरूप रूप ज्ञान को ही केवल स्वरूप मान रही; ज्ञान रूप को निष्ठा
रूप का मान कर ही यह सब कुछ ज्ञान निष्ठा मानी जा रही थी तथा कर्म योग का रूप
केवल निष्काम भावना का रूप निष्काम भावना रूप बन कर ही, उस प्रभु रूप
ईश्वर के स्वरूप को प्राप्त करने के लिये भगवान् ने अर्जुन को सब कुछ रूप में
स्थिर करने का प्रयत्न किया था। अर्जुन, केवल अपनी आत्मा स्वरूप ईश्वर मान रहा था, तथा
वह, विचार भी, जो रूप ज्ञान का माना जायेगा, वह केवल अपने स्वरूप ज्ञान का माना गया
था, जिस ज्ञान के स्वरूप को अर्जुन निष्काम-स्वरूप मान रहा था। केवल अर्जुन ज्ञान
अथवा निष्काम का योग का आधार ज्ञान-स्वरूप मान रहा था पर निष्काम योग
रूप का जो यह समन्वय था निष्काम रूप का निष्काम स्वरूप कर्म निष्ठा का, यह केवल
कर्म योग का ही रूप नहीं, केवल यह ज्ञान निष्ठा का निष्काम स्वरूप, कर्म निष्ठा
निष्काम कर्म योग स्वरूप, इस निष्काम स्वरूप को निष्काम भावना वाला
केवल ही भगवान् का स्वरूप, केवल उस भगवान् के स्वरूप का ज्ञान केवल अपने ज्ञान
रूप स्वरूप तक ही सीमित था तथा वह केवल ईश्वर का रूप नहीं
अतः, ज्ञान निष्ठा और ज्ञानस्वरूप दोनों स्वरूप केवल प्रभु रूप ज्ञान रूप
ही, या प्रभु रूप ज्ञान ज्ञान रूप को केवल परमात्मा स्वरूप मान कर केवल उस परम
ज्ञान स्वरूप ज्ञान-स्वरूप ज्ञान को ईश्वर का रूप या ज्ञान का स्वरूप या
परमात्मा स्वरूप स्वरूप रूप में खो कर ही ईश्वर के ज्ञान को ज्ञान निष्ठा स्वरूप
रूप में मान कर स्थिर रूप निष्ठा को रूप ज्ञान रूप जीवात्मा के स्वरूप निष्ठा
स्वरूप का रूप मान कर स्थिर रूप निष्ठा जीवात्मा के उस ज्ञान को ईश्वर का
स्वरूप
ज्ञान निष्ठा स्वरूप का रूप जब तक ईश्वर के स्वरूप न बने, तब तक वह ज्ञान-
स्वरूप ही बना रहेगा, केवल जीवात्मा के ही स्वरूप ज्ञान को माना गया था
केवल यह रूप न बने, जो रूप उस निष्काम ज्ञान के स्वरूप केवल परमात्मा स्वरूप
का स्वरूप
गीता का सार यही, जिसका रूप ज्ञान का परम निष्ठा स्वरूप निष्काम कर्म स्वरूप
योग केवल परमात्मा स्वरूप ज्ञान बन कर ही प्रभु के ज्ञान रूप का ज्ञान रूप था।
109

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110

दयानाथजी सबको सन्तुष्ट देखना ही तो चाहते इसलिए उन्होंने कहा, 'जो जो राम-नाम लिखकर भेजिएगा
उन सब को नाम का चोला जरूर मिलेगा चाहे नाम और रूप का कोई विभेद या अधिकार नहो।'
व्यास जी जब नाम लिखाने कार्यालय पहुँचे तो वहां लम्बी लाइन, खचाखच भीड़।
लाइन में ही... कोई-कोई गप्प-शप्पबाजी कर रहे थे कि क्या पता, इन तीन लाख
नामा-क्षरों वाला चोला या फिर किसी अन्य का या यह सब ढकोसला न हो। व्यास जी यह
सब तो समझ देखकर व्यथित हो राम-दरबार गए व प्रार्थना
'प्रभो सब नाम जप तो कर रहे हैं? किन्तु नामाक्षर निष्काम कैसे? क्या सब आपका
ही चोला पाकर तृप्त होना चाहते हैं? भक्तवत्सल कृपा कर इन पर निष्काम कृपा करो? सब नाम
जपकर भवपार हो जायें और अपना यह महायज्ञ सब नाम प्रेमियों का! जहां दयानाथजी
स्वयं भी आ बैठे, भक्तवत्सल कृपा करके पधारो क्योंकि इन लोगों तक यह बात इस रूप
पहुंची जिस रूप को
ना होना उचित था, ना ही या ऐसा भी कह दिया गयाकि दयानाथजी कहो तो, या
अपना ही कोई रूप बनाकर भेज ही दें। अतः उन्होंने जो चोला धारण किया था, पीता-
म्बर वाला, चरण में नूपुर झंकृत, कमरबन्द वाला, कलाई में हार शोभित चन्दन,
की सुगन्ध बिखरता हुआ भक्तवत्सल श्याम रूप को उन सब लोगों ने देखा तो साक्षात्
रूप में, पर वह रूप विलीन हो गया सब लोग विस्मय विमुग्ध होकर स्तब्ध रह गए!
व्यास दयानाथ को देखो! चोला तो वो चोला! सब को दयानाथ को साक्षात् प्रणाम हो
रहा था।
व्यास कहने लगे, क्या देखा सबने? वो चोला सिर्फ दो चार नाम वाले नामा
रूपी का नहीं रूप होता, दयानाथ का स्वरूप तो स्वयं चोला रूप।
सब स्तब्ध, दयानाथ जी की साक्षात् लीला को देख सब प्रेम भाव विभोर
होकर अब राम नामा-क्षर स्वरूप में लीन थे।
"भगवान का रूप चोला धारण होगा? या वो जन-मन निष्काम चोला ही तो ना
था!"
सब को दयानाथ भक्त के रूप में, जो कोई रूप देख रहा था, सब अपने
अनुसार? पर वो रूप सब सबको चोला रूप से परे था, उस स्वरूप का कोई चोला
रूप नहीं दयानाथ तो भक्तवत्सल रूप में दयानाथजी जन के बीच स्वयं ही आ गए
थे, पर सब चोला खोज
"जो खोज रहा था वो तो मिला ही"
हर कोई प्रसन्न, उस रूप को देख कर सब रूप लीन व्यास जी दयानाथ और
भगवान रूप ही के अन्तर्यामी स्वरूप को जान उनका जो रूप था चोला के रूप
स्वरूप से, उस रूप को देखना सब के ही भाग्यवान हो जाने का पर्याय
स्वरूप दयानाथ के अन्तर्यामी स्वरूप व्यासजी जनमानस के बीच स्वयं
स्थित हो स्वयं स्वरूप को जो देख पाते, उस रूप रूप का सब चोला रूप ही
चोला रूप हो गया था, चोला क्या! वो तो चोला से परे चोला रूप से परे चोला रूप से
परे दया-धाम ही तो जो दयामय रूप--
"वो रूप स्वयं रूप चोला था पर चोला से दयामय था"
सब को यह रूप देख कर चोला का जो भ्रम बना हुआ था चोला का होना
ना रूप से निष्ठा पर सब रूप में लीन, सब उस रूप में लीन हो जाना चाहिए?
उस रूप को स्वयं देखना सब का लक्ष्य था? चोला तो वो चोला रूप, चोला स्वरूप
सब स्वयं स्वरूप में लीन था?
चोला का चोला रूप चोला ही तो सब जन का, तो वो ना रूप--का चोला चोला
रूप रूप था।
पर चोला रूप जन दयानाथ का रूप स्वरूप दयामय।
सब के ही चोला को चोला से सब जन जोड़ रहे, चोला तो सब दयामय ही
रूप रहा था, सब चोला रूप, वो ही चोला रूप--का चोला का चोला रूप दयामय
स्वरूप हो गया, चोला चोला स्वरूप हो! सब लोग उस चोला रूप दयानाथ
भक्तवत्सल रूप स्वयं स्वरूप दयामय सब चोला के रूप में स्वयं चोला बन गए,
जो वो चोला रूप बन गए? या वो चोला ही बन गए स्वयं?
दयानाथ का चोला स्वरूप ही सब का रूप चोला बन गया रूप में चोला
का रूप चोला ही तो सब दयामय रूप दयामय ही तो हो गए चोला चोला रूप में
लीन? वो तो चोला ही बन गए? चोला स्वरूप ही तो सब रूप चोला का चोला हो,
पर वो सब तो, चोला रूप चोला रूप में ही चोला चोला रूप को चोला रूप से,
चोला रूप चोला रूप में तो सब चोला रूप चोला को सब रूप सब का रूप चोला
111

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112

छठे दिवस कथा का विश्राम

॥ श्री रामचरित मानस ॥
अयोध्या काण्डम्
छठे दिवस कथा का विश्राम

दोहा 17
भरतहि सोचु नृपहि कृत कीन्ह विरंचि प्रपंचु
पात पात फल फलहिं तरु कीन्ह सत्य निज नेम॥
सानुज भरतु समेत सब परिछन मातु समेत
भोरहिं भोरहिं भरतु बहोरी निज कुल रीति बिचारि
परिछत सब निज चरणन लागन कहि सब सादर
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

दोहा 18
भरत सो सोच नृपहि कृत कीन्ह बिपुल
सब विधि सब विधि भाइ सों कीन्ह बिधाता बाम
परिहरि सब जंजाल परिहरि सबहिं सनेह
कहत भरत सब सों दुख भारी कीन्ह बिधाता बाम
"तात" तात कहि बिकल रोवत न सकहिं सम्हारि
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

दोहा 19
कहत सबहिं भरत बिकल रोवत अति भारी
तात तात कहि रोवत भारी
कहत भरत सब सों दुख भारी कीन्ह बिधाता बाम
तात तात कहि रोवत भारी रोवत सब नर नारि
भरतहि सोचु नृपहि कृत कीन्ह बिपुल प्रपंचु
पात पात फल फलहिं तरु कीन्ह सत्य निज नेम॥
परिछत सब निज चरणन लागन कहि सब सादर
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

भरत जी विचार करते-करते व्याकुल होकर गिरते पड़े! तात! तात! तात! सब कुछ तो
गया! जिस पर इतना भरोसा था? वो कैकेयी जिसने ही प्राण ले ली उस की,
जिसको मर्यादा का ज्ञान था। जिस कुल में? उस कुल को खा गई? जिस
पर मान था सब कुछ छोड़कर, सब पर भारी पड़ा! उस पर प्राण त्यागे! तो
उस समय राम व लक्ष्मण, वो समय ऐसा आया कि उस समय राम भी न मिले
प्रभु भी चले गये और वो भी चले गये। जिस पर भरोसा था? उस कुल का
जो सिर मौर्य था समाप्त हो गया? भरत जी कहते हैं रोते-रोते, जब तक यह
विश्वामित्र...? सब तो समाप्त करके ही दम लेंगे जो विधाता का विधान था
ऐसा क्यों हुआ? इसके बाद
भरत जी उठते हैं और रोते हुए पिता को देखते हैं और अपने को धिक्कारने
लगते हैं और कहते हैं, हे मेरे प्रभु, हे मेरे तात, आपने सत्य को मान देकर अपनी
प्राण प्रतिष्ठा-प्रतिज्ञा को पूरा किया और अपने को मुक्त कर दिया और मुझे
इस भव सागर में छोड़ दिया, हे कैकेयी माता तुमने ऐसा, जिसका फल जीवन
भर मुझे भोगना पड़ेगा, कभी नहीं सोचा? वो अपनी कुल मर्यादा को भूल
"अयोध्या का सुख भोगने वाली-कैकेयी जिसके कारण सारा साम्राज्य
कलंकित हुआ जिसका कारण सिर्फ वो कैकेयी थी जो सब कुछ जान बूझ
करके भी चुप, अपने स्वार्थ के सामने सब कुछ कुर्बान कर दिया, वो
यह भी न सोच सकी कि इस सबके पीछे कितना बड़ा अनर्थ होगा, कैकेयी तूने
मुझे कलंकित कर दिया, वो विश्वामित्र के कुलघातक को सब कुछ दिया जिसे
मैंने अपना माना, वो ही मेरे लिए काल बनकर आया"
आज सब कुछ? किसे कहूँ? किसको जाकर कहूँ? विश्वामित्र को सब
बताया गया, लेकिन वो सब कुछ तो समाप्त कर चुके थे अब तो केवल
रोना, विलाप सब कुछ रह गया था, लेकिन सिर्फ रो! स्वयं भगवान को पाकर
113

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