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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 322 में से

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कष्ट हुआ, जिसे देखकर वह राजकन्या अट्टहास कर हँसती हँसी। राजाज्ञा का उल्लंघन
करके उसने अपने दोने को फेंक तो दिया किन्तु साथ ही यह घोषणा भी कराई निष्कासित कर
दिया गया यह सब पाप का फल मिला भोग।
उसने सोचा सही, क्योंकि राज्य का भोग कर रहा था तो नियम का पालन करना
पड़ा।
यह कर्मफल का सिद्धांत सबमें व्याप्त दिखाई देता है। अब प्रश्न यह उठता
कि राजा को यह नियम लागू क्यों नहीं होता? जैसाकि राजा-महारानी के विषय कहा जाता
है, किसी का निष्कासन अथवा न होना क्या कर्मसिद्धांत के वश में नहीं है, अथवा
वह सब प्रकृति के नियम से परे हैं? कर्म का सिद्धांत तो सब पर लागू हो रहा
सम्राटाधिपति हो चक्र-वर्ती हो, चाहे रंक सब नियम में? कर्मसिद्धांत का पहला पद
ही कहता कर्म सर्वोपरिधिपति या राजाओं का राजा तो कर्म सब पर एक सा।
जब विचारणीय यह तथ्य हो जाता तब यह शंका ही नहीं कि राजाज्ञा सर्वोपरि या
नियम। निष्पक्ष न्यायपालिका तो यही कहती कर्म सब पर एक सा दंड दे। पर जब उस पर
ही प्रश्न उठ खड़ा हो जाता तब कर्म के प्रति एक शंका का समाधान भी आवश्यक बन
ही जाता। यह विचार आज अथवा कल का नहीं यह तो युगों-युगों का एक विवादस्पद प्रश्न
ही रहा। अब न्याय व सत्य को परखने की स्थिति निष्पक्ष होकर कही जाए जिससे
कि एक बार सब भ्रम का पर्दा दूर होकर सत्य का बोध हो सके, यह कथा, यह संदर्भ या
यह तर्क सब एक ही ओर इंगित करते कि कर्म बलवान होता है।
व्यवस्था एक जैसी; जैसी व्यवस्था का नियम सब व्यवस्था पर एक जैसा लागू
होता यह न केवल भारतवर्ष की ही बात अपितु यह न केवल चीन या यूनान व रोम,
सब जगह यह विचार, इस प्रकार का न्याय सभी जगह एक जैसा दिखाई देता, किन्तु
यह भी सच कि समय व काल परिस्थिति के प्रभाव न्याय को बदल दिया, तो क्या न्याय
न्याय नहीं रहता या कर्म फल सत्य से परे फल देता यह चिंतन तथ्य ही नहीं बनता है,
वास्तविकता यही सिद्ध होती कि व्यवस्था का नियम सब पर एक जैसा लागू।
जब किसी, का कोई काम पूरा अथवा सही फलदायक नहीं होता तो उसका कारण
पूर्वाग्रह अधिक प्रभाव छोड़ता जो पहले ज्ञान को नष्ट कर देता तथा यह भी सच है, कि
व्यवस्था का नियम सब जगह एक जैसा-सा, नियम-विधान सबमें एक सा ही फल
देने वाला, फल की इच्छा चाहे जैसी क्यों न की गई हो फल एक जैसा ही मिलता
सब को, यह तो सत्य सिद्धांत व्यवस्था का अटल सत्य माना गया। कर्म फल
भोग में अंतर आया, कर्मफल भोग सदा से व्यवस्था, पर, फल भोग का भाव निष्पक्ष
ही रहा, व्यवस्था सदा ही अपनी प्रभावशीलता से सबको प्रभावित करती रही। व्यक्ति
प्रभावित हुआ, दूसरा नहीं यह प्रश्न कई बार खड़ा होकर भी कर्म-प्रभाव ज्ञान जब
तक प्रभावशील या सशक्त है, सब ज्ञान पर प्रभाव सदा
व्यक्ति की विचारशीलता का प्रभाव ज्ञान पर पड़ता है। ज्ञान ही तो भ्रम पैदा
करके भ्रमित करता तथा वह भ्रम निवारणार्थ, व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार
ठहराया जा सकता है?
सब कर्म का प्रभाव ही तो इस तरह से स्वयं को दिखता सब प्रभावित
सब को प्रभावान बना कर स्वयं यह सिद्ध हो गया कि कर्मफल से परे कुछ नहीं व
निष्पक्ष सब फल सब व व्यवस्था को यह विचारणीय फल दिया कि राजा प्रजा कोई
भिन्नता ही नहीं, कर्म सबको समान व्यवस्था के फल का रूप देता व निष्पक्षता
वास्तविकता का रूप, जो भ्रम में पड़ता? वह राग-द्वेष ग्रस्त होकर सत्यता स्वीकार
कर ही नहीं पाता अतः कर्म-ज्ञान सत्य, कर्म ज्ञान सत्य, कर्म सिद्धांत
पूर्ण सत्य-ज्ञान का अंग, जो स्वयं निष्पक्ष व समस्त मानव जाति धर्म सत्य ज्ञान
लिए एक जैसा सत्य स्वरूप, जो सदा सत्यता को व्यक्त
कर्म ही करता व कर्म ही सब सिद्धांत व सत्य रूप, सो भी प्रत्यक्ष जैसा
व्यवस्था रूप या कर्म क्रिया रूप, जो व्यवस्था को व्यक्त कर रहा, सो सत्यता
ही, राग--द्वेष के कारण ही अंतर कर्म-ज्ञान रूप में सब जगह देखा जा सकता
देखा गया।
व्यवस्था सत्य का रूप व्यवस्था सत्य रूप में ही सब जगह फल देती? जैसा बोओ
फल पाओ! सत्य कर्म-ज्ञान का अंग, ज्ञान कर्म व सत्य, व्यवस्था सत्य विचार की
दिशा का फल है।
कर्म का विचार जो ज्ञान को सत्यता प्रदान करने वाला, व्यवस्था राग-द्वेष
परे ज्ञान का एक रूप सत्यता रूप ज्ञान का दाता, व्यवस्था सब प्रकार विभ्रम
से परे सब भ्रम सर्वथा शून्य करने वाली तथा सब भ्रम विनाश करने वाली बनती,
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