एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
तब राजा शूरसेन चकित होकर उस बालक को गोद में उठाकर बोले, यह आश्चर्यदायक वीर
बालक तो अपने समान किसी को भी नहीं गिन रहा है, अर्थात् यह निडर वीर ...
निदान उस दिन राजा शूरसेन अपने घर को जाकर सब ही बालकों को बुला कर
भोजन का प्रबन्ध करवाकर उन सब को खिला कर सत्कार कर सब को विदा किया परन्तु उस
बालक ने यह भोजन भी स्वीकार नहीं किया अर्थात् खाया, न सत्कार-सत्कार को ग्रहण
कर प्रसन्न हुआ। राजा शूरसेन विचारता ही रहा सोच में पड़ाता रहा कि उसका पिता, या उस
बालक का क्या नाम बताया जाय
जब वह बालक बारह वर्ष वयवाला सब प्रकार से सबल निरोग स्वरूप वान व्यायाम
करता था, तब जिस स्थान, ग्राम, नगर पाठशाला अथवा जहां कहीं जाता अथवा, कोई
बलवान् मिलता था, उस समय उसके साथ बल आजमाने लगजाता था। और सब ही
लोग यह कहते थे। कि इस जैसा कोई भी वीर इस पृथ्वी मण्डल मध्य है--इसलिए ही
इसका नाम! पृथिवीचन्द्र रख कर सम्बोधन किया जाय। इसके पिता का नाम तो किसी
पता लगाया ही नहीं था-और सम्बोधन बिना काम भी नहीं हो सकता था। इस ही लिए
उसका सम्बोधन नाम ही हो गया। इसके पश्चात् किसी भी नाम से, उस बालक का पृथिवी
नाम ही हो गया था।
इसलिए यह विचार निश्चित है, प्रत्येक विचार प्रत्येक बात किसी कारण विशेष
पर तथा किसी आवश्यकता के बल पर ही नाम रखे जाते हैं। अन्यथा व्यर्थका नाम कौन सा? और
क्या नाम किसका हो? आज का विषय यह नहीं चल रहा विचार इसका नामकरण का
उस दिन चला था सो इस निमित्त से कथा रूप में प्रसंग उठाया गया। अब आगे का
आचरण जो पृथिवी का विवरण सुना जा रहा है। इसलिए जो जो नाम प्रख्यात हैं, वे सब
किसी विशेषता के ही कारण से होते हैं। इस तथ्य को सत्य ही मान लो।
अब इस कथा से यह सिद्ध हो जानेपर कि उस बालक का नाम पृथिवी रख ही
लिया तो उस समय उसका आचरण जो था वह बड़ा सरल निष्कपट, दयालु तथा अपने
आप-आप मग्न रहने वाला था। इसलिए जो उस समय का राजा था। अर्थात् उस समय का
शूरसेन नाम सम्भ्रम राजा, या जो कोई राजा होता था, या उस देश का राजा था।
उसने ही अपने मन्त्रियों से कह कर या तो वह काम करने वाले भृत्यों से कह
कर उस बालक का लालन पालन करवाया था। उस का पालन तथा उस स्वरूप-रचना व
शक्ति को देख कर ही; सत्कार था।
सो अब तो प्रत्येक को समझना यह आवश्यक हो जाता है। जो राजा चम्पावती
पति, या कोई उत्तराधिकारी था जिस समय उस बालक का लालन हो रहा था। उस देश
प्रजा सुखी अवश्य थी, उस ही कारण प्रजा के भोजन की कमी अथवा दुर्भिक्ष कभी भी
उत्पन्न नहीं हुआ। क्योंकि जिस राजा के मण्डल में राज्य में प्रजा सुखी नहीं होती
क्या? निश्चय ही यह, राजा अपनी प्रजा के विचार को जानने वाला नहीं रहता वा
प्रजाजनों क्या कुछ विचार स्वातन्त्र्य का और उनका ध्यान न रख कर केवल अपने भोग
को भोगने का ध्यान ही जो राजा रखता है। वह राजा कभी भी उत्तम राजा नहीं कहा
उस समय पृथिवी का नाम प्रख्यात होने का कारण यह भी हुआ कि वह बालक सबपर
बड़ा दयालु था, उसने दयालुता का काम यह किया कि जो जो प्रजा में निर्बल दीन
बालक थे। उन सब बालकों को इकट्ठा न करके ही अपने भोजन को या अपने लिए जो
राजा मण्डल व्यवस्था से आता, उस प्राप्त सत्कार, का पृथिवी वितरण
बालक-बालक बालकों को कर देता था। बालकों को वितरण करने पर सब लोग बड़े प्रसन्न
और उसके यश का गान करने में प्रवृत्त हो गये।
जब बालकों को दान वा सहायता देने लगा तो सबने यह निश्चय ही
सम्भावना की, कि जो जो दीन बालक तथा बालिकाओं की अवस्था थी उसमें तो उन
बालकों के वस्त्र भोजन का, प्रबन्ध यह राजा करता था, और राजा सब करता था,
इसलिए इसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि, सब लोग इस बात से, विशेष प्रसन्न थे,
केवल राजा चिन्ता में पड़ गया, चिन्ता यह हुई पृथिवी का प्रभाव तो बढ़
जायगा यह तो निश्चित है, परन्तु सम्भवतः यह महाप्रतापी इस राज्य का स्वामी
न बन जाय यह राजा के मन में भय उत्पन्न हो गया था। जब उस भय को उसने अपने
मन्त्रियोंके सम्मुख प्रकट किया तब सब ही मन्त्रियोंने परामर्श दिया
चिन्ताग्रस्त मत हो इस का कोई प्रबन्ध कर दिया जायगा जिससे चिन्ता मिटे।
राजन्, इस पृथिवीचन्द्र बालक को तो हम मारेंगे नहीं, तो क्या करेंगे? सो आप ही
सब को और पृथिवी को भी तो मार नहीं सकता अतः ऐसा उपाय हो जो पृथिवी
पराजय को न पाकर के, शान्त बना रहे। इसका कारण यह भी जान लेना ही होगा
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तब राजा सुबाहु अपने मन्त्री महोदर नामक योग्य मन्त्रिवरको साथ ले चक्रवर्तियोंके समान ठाठबाट बनाकर उस
मनोरञ्जनाके विशाल महलमें गया सुदामनके, पास पहुँचा नृपतिराज।
नृपको आते देख न मनोरञ्जनाके हृदयमें हर्ष हुआ नउमंग केवल शिष्टाचारके वशीभूत होकर वह
नृपके साथ बैठ गई उस सिंहासन पर। महोदर मन्त्री तो अपनी कुटिलतानुसार ही यह चेष्टा करता ही रहा कि
यह बात किसी प्रकार सुदामनके कानोंमें पहुँच जाय, जिससे उसका हृदय विदीर्ण होकर वह प्राणों को त्याग
कर यमके दर्शन करे। परन्तु सुदामन तो नृपके आगमन पर भयभीत हुआ न हर्षित प्रत्युत उदासीन ही बना रहा।
पर उस समय मनोरञ्जना सुदामन पर ही अपनी दृष्टि लगाये हुए थी। उस समय
महोदरने राजा सुबाहु मन्त्री होकर भी चापलूसों जैसी बातें करते हुए सुदामनको लक्ष्यकर कहा
कि महाराज यह तो बड़ा अनर्थ हुआ। इस साधारण पुरुषका क्या विचार चक्रवर्ती राजाके सदृश बैठना! सो इस समय
ही, उचित दण्ड दिलाकर महोदय, इस धृष्ट मनुष्यको इस महलसे बाहर निकाल दिया जाय। यह सुन राजा
सुबाहु मुस्कराते व बोले
राजा सुबाहु बोले, "इस साधारण मनुष्यमें ऐसा कौन सा पराक्रम भरा हुआ है मन्त्री जी, जो इस
समय बाहर न जाकर बैठा हुआ नितान्त प्रसन्न"
राजा सुबाहु इतना कहकर सुदामन मणिकारकी ओर सम्बोधित
कर तो यह बात कह गये किन्तु मन्त्री महोदर अपने कपटी विचारोंमें चूर होता हुआ कहने लगा कि
राजन इस पुरुष का यह बड़ा भारी अपराध है। इस दुर्जनको तो मार ही डाला जाय। राजन् यह
कैसा? क्या यह कोई कामी पुरुष? अथवा इसपर कोई भूत लगा हुआ जिससे भयभीत होकर
बैठा है, या फिर यह कोई पागल पुरुष मनोरञ्जनाके इस विशाल महलमें बैठा हुआ है। राजा सुबाहु
अपने मन्त्री महोदरके इस प्रकारके, कथनोंको सुन बोले? महोदरका यह वचन? सुनकर
मनोरञ्जना तो जल भुनकर राख हो गई, फिर भी वह क्या कह सकती?
अब तक सुदामन जो कुछ मौन होकर अवलोकन करता रहा उस समय राजाके सामने आकर वह बोल
उठा। नृप सुबाहुके इस न्यायकी प्रशंसा करने लगा। मन्त्री महोदरकी कुटिल बातोंका उत्तर देते हुए
कहा कि हे मन्त्रिवर तुम मुझे जैसा निर्बल मानकर अपमानित करते हुए कह रहे हो वैसा नहीं हूँ। मैं
पापों के भयसे ही डरता हूँ। यदि मुझे पापका डर नहो तो तुम जैसे नीच मन्त्रीका मर्दन कर दूँ।
बात ठीक ही कही है, कि जब तक पाप का उदय, रहता तभी तक हर कोई हर किसी
पर भारी पड़ता है? इस संसारमें जो दुर्बलको दुःख देता रहता--है, वह मूर्ख, यह
न--हीं सोचता कि इस दुर्बलका भी कोई रक्षक है। अरे भाई जब कोई भी रक्षक न हो तो धर्म ही
उस समय उस दुर्बल का रक्षक, काम करता रहता है। राजा सुबाहुको तो कुछ दया आई पर
मनोरञ्जना का सुदामन पर केवल भाव बढ़ा।
अब यह सुदामन कुछ समय पर्यन्त ठहर कर उस स्थान से चल दिया। मनोरञ्जना अपने भवनमें
पश्चात्ताप की आग में जलने लगी। उसके हृदयमें सुदामनके प्रति निष्कपट प्रेम उमड़ पड़ा। वह सोचने
लगी कि, हाय मैंने निष्कपट सुदामन को कष्ट पहुँचा कर भारी पाप किया। अब मैं क्या करूँ?
जिससे, इस पापसे मेरा उद्धार हो सके, सो इस समय केवल! ही यह बात रह गई कि
जिससे सुदामनके साथ विवाह रचाकर मैं, इस कलंक को धोकर अपने जीवन को धन्य करूँ।
केवल यही इसका एक उपाय हो सकता है।
इधर राजा सुबाहु, भी अपने घर, गया ओर सुदामन भी चिन्ता का समुद्र सा होकर घर गया तो
माता और पिताने उसका उदास मुख देखकर पूछा कि बेटा! तुम इस प्रकार भयभीत क्यों दिख
रहे हो। तुम्हारे चेहरेका तेज क्यों नष्ट हो गया; सो बताओ, किस पापी दुर्जनने
तुझे, किस बात के लिए दुःख दिया है? जो बात तुम्हारे हृदयमें भरी हुई, सो शीघ्र
बताओ, जिस बात का हम उपाय, कर के तुम्हारा भय दूर किया जाय।
माता पिताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सुदामन कुछ नहीं बोला, शान्त ही बना
रहा किन्तु माता? पिता बारम्बार, यही पूछते रहे! तब वह केवल इतना ही कह सका कि
चिन्ता छोड़ो माँ, अब क्या हो सकता इस संसारमें किसी का कोई नहीं है न कोई किसीका
सहारा न ही सहायक हो सकता, बस इतना ही कह कर, वह शान्त होकर बैठ गया। सुदामनके
मनमें इस समय जो बात लगन लगी सुदामन के मन रूपी घर में वास कर गयी वह बात तो केवल
यही सोच रहा था कि किस समय इस शरीररूपी मटकी को फोड़ दूँ? क्या मणिकार सुदामन को
वैराग्य प्राप्त हो गया या संसारमें सब कुछ स्वार्थ भरा
जब रात का समय हुआ, सब लोग सुख चैन से सोये, उस समय यह वैरागी पुरुष,
चुप चाप उठकर श्मशान भूमिकी ओर चल पड़ा, सो केवल वैराग्यके वशीभूत होकर। सोचने
लगा, जिन बातोंके निमित्त सब झगड़ा है, उनका त्याग ही क्यों नकर दिया जाय? इस प्रकार
वह घर, बार सब को छोड़कर वन की ओर प्रस्थान कर दिया तथा वह, एक वन में पहुँचकर,
किसी वृक्षके नीचे बैठ कर, श्री जिनभगवान की तीन प्रदक्षिणा देकर स्तुति पाठ किया।
संसारके सब नश्वर मोह माया, ममता आदि बन्धनों को तोड़कर वह, श्री जिनेन्द्र
देवका स्मरण कर कायोत्सर्ग ध्यान करने
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तब उसने, या तो उस समय उसके मुखमण्डल तथा वाणी द्वारा व्यक्त होने वाले गहरे
दुःख से द्रवीभूत होकर, अथवा जो स्वाभाविक ही था, यह भय पाकर कि कहीं ऐसा
न होवे संकट बढ़े, उसने कहा कि मुझे मारते हो क्यों? क्या मेरी
हत्या करोगे? या कोई अमानुषिक हो? या कोई चोर या डाकू होवे? मुझे छोड़
दिया जावेगा ना?
एक क्षणमात्र के लिए उस न जाने क्या सोचा, तब तो उसने उस कठोर व
भारी छड़ी जिसको वह ले रहा था उस समय हाथ से फेंक ही दिया तथा अर्ध-
रुष्ट होकर तब वह उसे गाली निकालने के ही रूप में कुछ कहने लगा कि ? पागल-कुत्ते
क्या तेरी जान लेने और तुझे मार ही देने के लिये तुझे इस तरह पकड़ ले आवे कोई?
पागलपन तुझे सूझ रहा है क्या जो इस प्रकार के व्यर्थ बकवास करने लगता है? तुझे मारना
और इस तरह से मार कर फेंक ही देना होता, तो इतना कष्ट उठा कर
इतनी दूर क्यों लाते, ऐसा कहते? तू जानता भी है, कैसा मूर्ख?
"मुझको जो रूप में खड़ा किया गया है तो वह केवल इसके लिये?"
मुझे कैसा मूर्ख? क्या तू वास्तव में इतना मूर्ख? ऐसा प्रश्न किया? मूर्ख
कह दिया गया? मुझको इस बात का कोई प्रत्युत्तर मिलेगा?
इसके उत्तर रूप उसने कुछ नहीं कहा प्रत्युत केवल मुख से जो रोष तथा घृणा
का भाव इस प्रकार प्रकट हो रहा था वह सब तो यथावत ही रहा, फिर भी जो कुछ
अब तक उसने न कहा था सो कुछ प्रकट करना चाहा कि ? उसने जो कुछ कहा
सो सब तो व्यर्थ था? या उसने समझना ही नहीं चाहा जिससे कि कुछ बात का
प्रभाव ही पड़ सके न हो, प्रत्युत उस ओर से और भी अधिक घृणा ही प्रकट करने का
जो रूप तथा स्वभाव दिखलाया न जा सकता, प्रत्युत उसे केवल इसी बात का
भय मन तथा सिर पर उस दम सवार था जिससे कि वास्तविकता को समझना सब ही व्यर्थ
समझा जाने लगा?
उसने फिर कहा, "मुझे यहाँ तक लाये सब तो केवल दो बातों के लिये होगा"
उस बात के भाव को वह समझ सकता होगा क्या?
"मुझे मार कर फेंक देने या केवल दो बातों के लिये होगा"
इन दोनों बातों द्वारा उसने क्या कुछ प्रकट करना चाहा था, यह बात तो
स्पष्ट होकर सब कुछ प्रकट न हो सका क्योंकि उसने बहुत चाहा कि केवल दो बातों
पर ही ध्यान दिया जावे--एक तो यह कि मार, दूसरा यह कि, न मारा-जावे;
या केवल दो बातें स्पष्ट थीं कि जिससे जो कुछ स्पष्ट होता, सो सब कुछ है;
पर ऐसा समझना सब न हो कर उस व्यक्ति रूप से जो उपस्थित था सब कुछ
मार-पीट--सत्कार्य जैसा समझ लिया गया--सो उसके लिये सब ही परिणाम भया-
वह।
सब ही इस ओर लगा दिया था कि केवल दो बातों के रूप को छोड़ कर न तो
वह कुछ कह सका था, न स्पष्ट किया गया था कि जिस प्रकार दोनों बातों
अथवा एक बात का भाव प्रकट हो ही सकता था सो न होने देकर या समझने
दिया उस बात अथवा भाव रूप को नित्य-ही के लिये अप्रशस्त करने का निश्चय
कर ही लिया था केवल इसी रूप द्वारा सब बातों के रूप में देखा गया जाना सब
व्यर्थ समझा।
क्रोध ही केवल न दिखलाया गया; स्वभाव भी, कैसा था, इसका रूप यदि
उस दम देखा जाता तो उससे भी अधिक जो रूप उस समय प्रकट हुआ था, सो
यह कि, उस दम, प्रत्येक ने; केवल सिर को हिलाते हुए तथा मुंह को फेरते हुए
दोनों हाथ से एक संकेत रूपी चेष्टा प्रकट करके जो बात कही गई थी! उस
विषयक समस्त प्रभाव जिस रूप से उस स्थान में दिखलाई पड़ा था, उससे स्पष्ट
ही उस व्यक्ति न तो कुछ लाभ उठाया या देखा या उस समय उसका कोई रूप ही
ज्ञात व्यवहार के रूप में वह कर ही क्या सकता था ही क्या? फिर, सो सब
व्यर्थ गया था, केवल इस बात को छोड़ कर कि जो कुछ रूप या भाव उस
दम देखने में आया था, सो ऐसा बुरा प्रभाव उस पर छोड़ रहा था कि जो
कभी मिट नहीं सका, न उस प्रकार के रूप को कभी वह भूल ही सकता था
और सब कुछ था, सो सब कुछ व्यर्थ रहा या वह सब कुछ व्यर्थ था, इस बात का रूप
केवल दो बातों द्वारा देखना सब प्रकार व्यर्थ रूप प्रकट करने का रूप था? सब
प्रकार उस स्थान विशेष से सब ही मुख को फेर कर उस व्यक्ति विशेष,
जिसको भय से प्रत्येक अंग कांप रहा था उसके पास से हटना चाहा सो तो अवश्य
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चित्र में उपस्थित मूल पाठ (फ़ॉन्ट/ग्लिफ़ अनुपलब्ध होने के कारण) विकृत होकर केवल चौकोर बॉक्स (Tofu / □) के रूप में दिख रहा है।
अक्षरों की आकृतियाँ लुप्त होने के कारण इस पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यंतरण (transcription) संभव नहीं है। कृपया स्पष्ट एवं सही फ़ॉन्ट वाला पृष्ठ या मूल पीडीएफ/स्रोत उपलब्ध कराएं।
The image provided contains corrupted text where all the characters are rendered as unrendered font glyphs / empty boxes (tofu symbols ▯), with only punctuation marks, quotes, and the page number (42) intact.
Because the underlying font/text was not embedded or rendered properly in the source document before generating this image, the text cannot be transcribed into Devanagari.
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The text in the provided image consists entirely of unrendered placeholder boxes (tofu characters / □) caused by a missing font or encoding issue in the source document. Because the actual Devanagari glyphs are not visible, it is not possible to read or transcribe the underlying text.
If you have a version of this document with the proper font embedded or rendered correctly, please share it, and I will be glad to transcribe it for you.
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46
जब जीव का यह या वह नाम पाया जाता तथा जब तक वह नाम बना रहताथा, तबतक
जीवके उस नाम द्वारा ही उस पदार्थ ग्रहण होता; पर वास्तवमे जितने परमाणु का स्कन्ध
बना; वह समय-समय विनष्ट पर्याय स्वभाव, सो उसका नाम... ।
अब देखना यह है कि यह शरीर मेरा स्वरूप, अथवा मैं पृथक्भूत हूँ?
इस शरीर से मेरा स्वरूप पृथक् नहीं, जैसा कि देखा गया, अथवा मैं पृथक्भूत ही
बना रहता हूँ? यद्यपि इस शरीरमें मेरा, जैसा कि देखा गया नाम पड़ा था तथा इस
देह संयोगके निमित्त से मैं नाना देह रूप बना था तथा शरीर में कर्मों का सम्बन्ध
रहा, जिससे कि देहसे सम्बद्ध प्रत्येक परमाणु मुझ जीव सम्बद्ध था, जिस कारण इस
देहके साथ ही मेरा सम्बन्ध बना सो वास्तवमे तो नहीं; पर इस शरीर के साथ
मेरा जो सम्बन्ध, सो केवल उपाधि मात्र था। यद्यपि देह संयोग के रूप में जो कुछ
देह बना दिखता आत्मामें कर्मोका सम्बन्ध बना था, जिस कारण आत्मा देह रूप, देह
आत्मा स्वरूप प्रतीत हुआ करता था? पर अब ऐसा सम्बन्ध सम्भव नहीं रह गया
जिससे कि मैं इसे देह रूप कह सकूँ अथवा देहको आत्मा? देह पृथक् अथवा आत्मा? देह
पृथक् आत्मा? सो, यह सब बात केवल उपचार से थी, जो अब मात्र कल्पना प्रतीत
होने लगी। वास्तवमे आत्मा देह रूप कभी भी उपचारमात्र से भी नहीं बन सकता
इसका कारण आत्मा चेतन रूप है। इस कारण न तो मैं इस देहका सम्बन्ध
मात्र रहा और न यह देह ही किसी प्रकार से मेरा सम्बन्धी बन सकी, वास्तवमें देह
विनाशी पदार्थ है, जो नष्ट होने पर भी जीव का कुछ न हुआ सो, यह जीव इस
देह का कुछ रूप नहीं बना।
जो कुछ मेरा कहा जाता रहा तथा जो कुछ भी अन्य पर्यायें या तो देह रूप
हों, या देह से भिन्न हों, वे केवल नाममात्र थीं, सो केवल नाम, जो किसी का
कोई पदार्थ बन सकेगा? नाम इस रूप कभी किसी वस्तु को रूप नहीं दे सकता या जो
केवल नाम ही नाम मात्र कहा जाता हो सो जो कुछ ऐसा कहा जाता, यह केवल शब्दों
की ही चेष्टा है। इस जीवका स्वरूप केवल नाम मात्र-रूपी नहीं
हो सकता है, जिस कारण से नाम मात्र जीव रूप नहीं? नाम तो न कभी जीवका
स्वरूप बन ही सकता जिससे नाम मात्रको जीव समझा जा सके-नाम केवल उच्चारण
करने मात्रके लिये है? या किसी वस्तु को संज्ञा मात्रके देनेके लिये है।
वस्तु नहीं! सच तो यह, कि यह कल्पना रूप जीव तो केवल न समझने का ही रूप
हो रहा था, इस कारण नाम केवल सम्बोधन मात्रके लिये प्रयोग किया
जाता है। इस लिये जीवका स्वरूप तो वास्तवमे न तो नाम रूप ही हो सकता है।
जिस रूप में नाम रूप चेष्टा मात्र रही सो उस प्रकार की चेष्टा का जीव सम्बन्धी
कोई भी सम्बन्ध वास्तवमे कर्मोका नहीं देखा गया, जिस से देहके साथ कोई
सम्बन्ध हो सके।
सो अब देह या देहके नाम रूप जो भी रूप बन गये थे, वे सब नष्ट रूप
हो गये जिनका सम्बन्ध वास्तवमे कभी भी मुझ जीव से न था। वे सब देह सम्बन्धी
नाम रूप ही रहे सो देह तक सीमित रहे सो वास्तवमे कभी, न तो मैं उस
देह का रूप बना, न कभी मेरा ही उस देह सम्बन्धी नाम-रूप से कोई सम्बन्ध ही रहा।
इस प्रकार यह देह, सम्बन्धित बातें सब ही मुझ आत्मा से सर्वथा
भिन्न रहीं, नाम सम्बन्धी रूप तो केवल नाम रूप शब्दों का रहा। जो देह
रूपमें रहा सो केवल नाम रूप रहा सो वह भी देह तक ही सीमित रहा।
"व्यवहार से जो कुछ भी उपचार रूप सम्बोधन या कथन किया
गया सो केवल देह मात्र रूप रहा, जिसे उपचार, मात्र ही समझना चाहिये सो जो
कुछ कहा गया, वह सब मात्र नाम के रूप में ही कहा गया। इससे जीव का
कोई सम्बन्ध न था और आत्मा का भी कोई सम्बन्ध इससे न था। इस कारण
सो तो सब नाम रूप ही था जो नाम व्यवहार का ही मात्र रूप माना गया है
और रहेगा"
इसका स्पष्ट तात्पर्य यह समझ आया कि देह का जो नाम पड़ा सो तो
इस देह तक ही सीमित रहा जो देहके विनाशी होने पर उसी समय नष्ट
हुआ जिस समय यह देह नष्ट हुई, सो जीवका कोई नाम देह सम्बन्धी
नहीं हो सकता तथा जीव का देह-सम्बन्धी नाम, जो कभी जीवका? वास्तवमें
तो यह सब उपचार मात्र पर्याय सम्बन्धी रूप मात्र था। इसका जीवसे कोई
लेना देना न देखा गया।
इस प्रकार यह सारा कथन केवल देह, जीव के सम्बन्ध का रूप मात्र
दिखलाता तो कहा पर देहके साथ जीव का न तो कोई सम्बन्ध ही रहा और न नाम
47
यद्यपि वह मनुष्य मात्र सांसारिक सुखभोग भोगते समय केवल अपने सांसारिक सुख भोगनेमें
लगे हुए अपने पराक्रम मात्र का ही यश तो गानेंगे नहीं, तथा भी उनका यश तो हो जायगा।
फिर उनकी यश बात यदि मात्र सांसारिक ही तक रह जाय तब तो कोई विशेष बात नहीं हुई; किंतु
यहां बात तो यह नहीं मिलेगी, यहां बात मिलेगी ऐसी कि जिसको सुनकर संसारके सब छोटे
बड़ों का मन पिघल जाय, जो परमात्मा का भजन करें, या न करें, किसी का बुरा,
भलाईका काम जिसमें यश मात्र ही न मिले, पर भलाईका बदला, भलाईका
बदला, भलाईका यश तो मिलेगा यश तो मिलेगा
उस विभीषण यश के तो सब पात्र नहीं, जब तक उस पर कृपा सब प्रभु की न हो
जाय या प्रभु, उनके परिवारके ऊपर या उन पर जो उस वक्त उनके साथ थे।
भक्तिका यश सब को इस रूप में मिले ही, ऐसा सब भक्तोंके साथ न हुआ हो
इसका तो हम यश सब नहीं कह रहे हैं। सब को ऐसा यश मिलना कठिन होता
कि भक्त, जो अपने पराक्रम के बल पर संसारके सब बड़े पुरुषों को हरा देवे
और उस को इस प्रकार न भगवान् के बलपर यह सब यश का यश रूपमें प्राप्त हुआ हो।
इस रूप में जो यह सब हुआ वह संसार के किसी भी मनुष्य के भाग्य में नहीं
लिखा था-जो प्रभु की कृपा से विभीषण को मिला। विभीषण को भगवान् ने
आज्ञा देकर यह सब कुछ कराया जो कि प्रभु की कृपा-मात्र समझो, केवल विभीषणके
इस पराक्रम समझो कोई बात नहीं और न ऐसा यश, केवल एक विभीषणके
भाग्यमें यह लिखा, केवल राम कृपा से हुआ
उस वक्त सब वानर विभीषणके साथ विभीषणके आगे खड़े होकर प्रभु श्रीराम-
लखनके यश का यश गाते हुए हर्षित होते हुए कह रहे, मानो प्रभु का यश गाते गाते
आज वे सब उस रूपमें प्रभुके यशको देख रहे थे।
सब तो कह रहे थे जो कुछ हुआ सो सब प्रभुकी कृपा, पर यह भी तो सोच
रहेथे विभीषणके भाग्य क्या समझिये? वह तो समझे, प्रभु का ऐसा विभीषणपर
प्यार था जो इस प्रकार विभीषणके भाग्यमें सब कुछ हो रहा था।
सब लोग तो प्रभुके चरणों में साष्टांग दंडवत् प्रणाम
कर विभीषणके सम्मुख खड़े होकर बोले, प्रभु की कृपा का तो कहना क्या
विभीषण का भाग्य ऐसा है, प्रभु जिसका साथ देते उसका संसारके सब
संकट कष्ट दूर होकर ऐश्वर्य सब प्रकारके मिलते हैं। प्रभु, प्रभु हैं।
सब कुछ करने वाले प्रभु और प्रभु सब के विधाता; सो प्रभु, जब विभीषणपर प्रसन्न
होकर कृपा कर रहे हैं तो क्यों न विभीषणका सब यश होवे। संसार के सब
सुख यश विभीषण को मिले, जो प्रभुके चरणों में नित्य रहता हो उस
को संसारके सब सुख मिलने का क्या संशय हो सकता है? विभीषण सब
बातों को प्रभु कृपा समझ हाथ जोड़े विभीषण खड़े थे, जो सब कुछ प्रभुका
ही रूप तो संसार में सब रूपके साथ देखा गया। इसलिए यह कहना कि विभीषण का भाग्य,
विभीषणका यश यह सब प्रभु कृपा ही थी। विभीषण तो सब रूप से प्रभु
का ही भक्त विभीषणके रूप में ही प्रभु--लीला रूपमें लीला कर रहे थे। विभीषण
को जो यश, विभीषण को प्रभु-कृपा रूपमें मिला सो संसार को दिखाने केलिए कि प्रभु
अपने भक्तपर जो भी कृपा करते हैं उसका फल ऐसा ही होता, जो संसार के सब लोगों
को भी इस भक्त लीला विभीषण का यश देख प्रभुके चरणोंमें भक्ति का
साधन मिल सके और प्रभुका यश गा सकें, जिससे सब का इस रूपमें
कल्याण-साधन हो सके और सब भक्तिकर सकें, सो विभीषण के भाग्य
का यश-गान केवल प्रभुकी भक्ति के स्वरूप में इस प्रकार प्रभुने
संसार के सब जीवों के कल्याणके अर्थ कराया।
लंका, लंका, लंका सब के मुखसे--विभीषणका लंका यश और प्रभु-कृपा
आज लंकाके घरघरमें फैल रहा था। सो इस--रूप से सब के मन में भक्ति का
जो संचार हुआ सो सब प्रभु कृपा थी। सब लोग लंका-निवासी सब के
मुखपर प्रभु की ही महिमाका यश था, प्रभुके ही यश का
"विभीषण के यश को विभीषण के रूप में संसारके सामने रख
संसारका प्रभुने भला किया, ऐसा विधाता, प्रभु को छोड़कर, कौन विधाता होगा"
विभीषणके यशको प्रभुने अपना यश बनाया
प्रभुने अपना यश विभीषणके चरणोंमें समर्पण किया
सो इस यशको केवल प्रभुके रूपमें न देखना
विभीषणके रूप में तो संसार के विभीषण के, सब को प्रभु रूप में प्रभु
का स्वरूप समझ केवल प्रभु की भक्ति का यह विभीषण का रूप सब लोग क्यों न कहें?
48
दयाल, कृपालु, भक्तवत्सल--सब सम्बोधन तो ईश्वर के रूप और नाम हैं! केवल वाणी
का रस घोल घोल कर ही उनका नाम लेने मात्र पचास वर्ष तक पाठ कर ले तो भी कोई
लाभ न--सक-सकेगा मिलेगा--या तो भला ईश्वर पचास वर्ष के केवल नाम उच्चारण
का फल प्रदान किए बिना ही दे दिया करे।
यह सब प्रत्यक्ष बात सुन कर पंडित, राव और सेठ आश्चर्य चक में पड़ गए! जो
जन प्रत्यक्ष बात सुन कर भी समझ, राव और सेठ आश्चर्य से मुँह बाए रह गए!
कहा, सत्य बात को मान लेने में ही तुम्हारा भी और सब का भला है। ईश्वर
का तो भजन सब कीजिए, इसमें कोई शक या दोष नहीं पर धर्मानुकूल कर्म भी
कीजिए। केवल मुख से राम राम कहने मात्र से पाप, ताप, संताप
अशान्ति मिट नहीं सकती। ईश्वर तो न्याय का रूप और सत्य रूप है। जैसा जो
जो करेगा सो वैसा फल पा ही तो लेगा। मन से जो पाप करता रहा और मुख से राम
का नाम लेता रहा सो फल तो उसे पाप का मिलेगा या मुख के राम नाम का? न
केवल मुख से राम राम कह कर ही ईश्वर से छूट, छल अथवा कपट से फल मिलना
मान ले।
"तो यह दान पुण्य का, या दया धर्म मात्र रूप ईश्वर के किए हुए संकल्प का फल
भी मनुष्य मात्र को ही दिया करे?"
यह भी एक जन बोल उठा। दया का फल तो मिला
"कर्म तो दया का किया था सो दया का ही फल मिला"
तब तो वह जन मौन पड़ गया था। फिर भी महात्मा, सब को शान्त सा देख,
उस ही बात का प्रभाव सब के मन में डालते हुए बोले, उस ईश्वर का गुण तो सत्य और धर्म
का रूप है, दया, धर्म का फल तो ही दिया करे पर दान, पुण्य मात्र नाम, या यश
चाहने का फल अथवा--
कभी मन को शान्ति स्वरूप न मिला।
ईश्वर कर्म का फल दिया करता है न कि अभिमान का। धर्म का जो अनुष्ठान
मन रूप भाव मात्र में समाया हो ईश्वर तो उस निष्ठा का फल ही दिया करे। दया
भाव का निष्ठा या दान आदि का निष्ठा ही तो फल रूप मिला करता, इस रूप मात्र
का नाम यश न होकर आत्मीय भाव का फल ही मिला।
सो जन, या सज्जन सब जन को उस परम-पिता ईश्वर का ध्यान तो ही लो,
ध्यान ही सत्य का स्वरूप है, सत्य रूप निष्ठा सब काल कल्याणकारी होती है।
ज्ञान या अज्ञानजन्य कर्म का फल कर्म ही देता है, न किसी का पाप, न
अज्ञान जन के नाम संकल्प से बढ़ के, निष्ठा से सब सब निष्ठा मात्र, नर-
कल्पित जन, संकल्प-ज्ञान सब का फल उस काल का मन ईश्वर समान रूप
स्वरूप का होकर सब काल में ही फल दे तो न ऐसा तो हो नहीं सकता कि न
किया हो तो अकारण फल ही फल ही मिलेगा।
कैसा विचार? दया का फल या निष्ठा? दया मात्र कल्याण कर उस
प्रकार अपना स्वरूप बना ही लेता दया स्वरूप न बना सका, तो दया मात्र का
स्वरूप तो सब विकार मात्र को ही तो फल दे सकेगा अज्ञान स्वरूप नाम मात्र
का तो सब स्वरूप मन मात्र विकार मात्र का स्वरूप ही बना देगा, मन
मात्र सब स्वरूप अज्ञानता का रूप बन जाएगा, जन तो मन स्वाध्याय निष्ठा
स्वरूप तो पावे ही, पर उस निष्ठा से न भगवान का रूप प्राप्त मात्र हो
सके जब तक कि वह मन ईश्वर में मिल
गया हो तब ही ईश्वर का हो सकता है। ईश्वर सब प्रकार शक्ति रूप सर्व
स्वरूप सब का नियन्त्रण या संचालन ही सब काल करता रहेगा? क्या अज्ञान का
स्वरूप सब काल बना रहेगा या तो अज्ञान निवारण का उपाय ही सब काल
कल्याणकारी रूप फल तो देगा? क्या अज्ञान सब काल रहेगा? क्या ज्ञान रूप
भी अज्ञान ही रहेगा? क्या ज्ञान से भिन्न, सब काल अज्ञान रहेगा? क्या
निष्ठा रहेगी? क्या अज्ञान रहेगा? क्या अज्ञान रहेगा?
जब सब ही, या सब ज्ञान स्वरूप सब प्रकार अज्ञान रूप में कल्पित
रूप-मात्र ही रहकर केवल स्वरूप का ज्ञान स्वरूप हो, तो ज्ञान स्वरूप सब
प्रकार बना कर ही ज्ञान स्वरूप सब रूप सब प्रकार का नियंत्रण ही कर
ही लिया कर सकेगा।
अतः, सब जीव केवल ही ही ईश्वर कृपा रूप मात्र स्वरूप ज्ञान को
विचार कर केवल ही बात का ध्यान रखकर ही आगे बढ़ो, कल्याण ही सब
होगा, जो सब रूप ही ही रूप मन गए; सब जीव के सुख रूप स्वरूप परमात्मा
49
यमके सब प्रकार रूप देखकर राजा सब को संभ्रमितचित्त हो गये कोई कुछ न बोले;
विद्याधर ने तब कहा महाराज राजा का एक नाम यम भी है और कोई यम नहीं यम तो
धर्मात्मा पुरुषों का सखा, और पापी लोगों लोग चोर जार कपट पाखंडी, सब को
प्राण लेकर यम यातना नरक भोगवे हैं, राजा सो बात छोड़ के सब
लोगों को यथा न्याय विचार से पालन करो अपराध विचारके सब प्रकार का
दण्ड करो, राजनीति के धर्म सब ही हैं सोई राजा का धर्म और पाखण्ड मत
सुनो और विद्यावान् का वचन सुनके अप्रसन्न विमुख न होय यह उपदेश सुन सब न
तो विद्याधर को जाना वा माना वा विद्यावान् जाना लेकिन सब ही ने समझा कि
पाखण्ड ही का व्याख्या
किया गया सब, सो तो जैसा कहा सब किसी बिना ही समझे वा जाने पर
मान ही गये थे, सो किसी तरह मान
ही गये सो क्यों? सो तो पाखण्ड मत रूप ही संसार विद्या--हीन है,
विद्याहीन को, पंडित भी, अप्रसन्न ही, समझें गे, राजा जी--का काम तो सब
विद्यावान् ही करें
सो यम तो का प्रमाण हो गया था, और यथा न्याय
दण्ड भी पाखण्ड प्रपंच--
रूप सब ही को ज्ञान हुआ था तब पाखण्ड न चला।
सो, राजा विचारता न था, सो बात सांची थी, यथा न्याय सब, दया धर्म रूप
यमराज समझा कर दया की थी सोई पाखंड विद्या न समझाई राजा के न्याय की
निन्दा हो चुकी; न विद्याधर न्याय बात ही बताई सो विद्यावान् का धर्म
प्रकाशमान्, ना पाखण्डियों ने मन समझा और कहा साचा बात, किन्तु ज्ञान
बिना सब को भ्रांति ही रही पाखण्ड बात प्रभाव सब जगह ही फैला वा सब
पर व्याप ही गया, यह तो न जान पड़े
केवल इतना समझें, जो जो विद्या युक्त सब प्रकार विद्या
का नाम सुने
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इस प्रकार के; काम रूप या कामी जन, काम रूपिणी का, काम रूपिणी कामी का,
काम रूपिणी का, और जो अपने को संन्यासी कह कर संन्यासियों जैसा,
व्यवहार करते, सदाचार-हीन, जो दण्डधारी संन्यासियों को ही गुरु
न ही तो क्या यह सब ही अयोग्य? हे सब गुण सम्पन्न हे राम जी? हे श्री रामचन्द्र
जी प्रभु आप सर्व समर्थ स्वामी हैं सब कुछ कर ही तो सकते यथापि, किसी को निर्दोष
रूप पर तो विचार कर ही सकते थे हे सब समर्थ स्वामी आप को अपने जैसा ही नहीं
समझ कर सब कुछ अपने जैसा ही तो कर दिया स्वामी जी ने सब कुछ अपने ही जैसा तो,
दिया ही जन-सम्बन्धी बना के, अपने समान बनाने का विचार
क्या इस प्रकार विचार किया जाता है? संसार में तो ऐसा नहीं
मिलता विचार; अधिक बात विचार की यह बात विचार की नहीं, ना ही तो
किसी के भी तो मन विचार द्वारा, हे प्रभु, बात सदा ही तो ही आचरण की
बात
सब समय ही की तो, विचार की बात तो, ही समय रूप मन समय द्वारा
सब कुछ समय के अनुसार ही विचारणा रूप से ज्ञान प्राप्त होता, समझ कर,
जो सब कुछ समझ कर भी विचार समय द्वारा करता है, वह इस बात द्वारा
ही सोच तो सकता? काम ही रूप काम के अनुसार विचार रूप? काम रूप
विषय, काम रूप मन रूप को ज्ञान रूप? हे भगवन् विषय ही तो ही, हे प्रभु
ही तो ही राम, विषय ही रूप ज्ञान के विचार के विचार ही तो ज्ञान रूप?
वह, ज्ञान रूप ना, ज्ञान रूप विषय के विचार का विचार जब ज्ञान का रूप,
ज्ञान ही रूप विषय रूप मन रूप को ज्ञान रूप, ही ज्ञान ही रूप ज्ञान, ही ज्ञान
ज्ञान रूप?
सब ही ज्ञान तो मन का रूप ना, विषय ही ज्ञान ही तो ज्ञान द्वारा सब
ही ज्ञान द्वारा विचार सकता रूप ही तो ही ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान ही तो ही
ज्ञान विचार द्वारा विचार स्वरूप ही ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप स्वरूप ही
ही ज्ञान रूप में ज्ञान, स्वरूप ही ना, ज्ञान ही ज्ञान द्वारा रूप स्वरूप ही
रूप विचार रूप, स्वरूप ही स्वरूप द्वारा स्वरूप ही ज्ञान रूप द्वारा
स्वरूप? ज्ञान स्वरूप? हे प्रभु स्वरूप ही ज्ञान ही रूप ही रूप रूप ही रूप
“जो सब रूप में, हे प्रभु स्वरूप सब रूप में समा”
सब ही रूप स्वरूप ही रूप में तो सब रूप सब रूप ही रूप सब रूप
रूप सब ही रूप में सब रूप रूप
ना ही सब रूप मन, ना सब रूप विषय रूप ज्ञान रूप मन रूप सब
रूप, ना विचार ही विचार का विचार जब रूप रूप में जब सब ज्ञान
रूप, जो विचार विचार-रूप सब रूप रूप सर्वज्ञता स्वरूप ही, सब स्वरूप
सब ही! सब ही स्वरूप
सब ही संन्यासी रूप सब ज्ञान ही तो सब ज्ञान रूप रूप ही
ज्ञान ही तो ही ज्ञान रूप ही ज्ञान रूप सर्वज्ञ स्वरूप ज्ञान ही तो ही
ज्ञान रूप ज्ञान सब रूप, रूप ही तो ज्ञान रूप ही ज्ञान रूप ही स्वरूप
रूप ज्ञान ही स्वरूप रूप, रूप ही स्वरूप रूप, सदा सर्वत्र सदा स्वरूप
रूप ही ही! सब रूप रूप, सदा रूप
केवल स्वरूप सब ही परमात्मा स्वरूप सब ही तो ज्ञान सब परमात्मा
परमात्मा ही सब कुछ परमात्मा ही, परमात्मा परमात्मा ही सब कुछ परमात्मा ही
केवल सब कुछ सब रूप में सदा, ना ज्ञान ही ज्ञान रूप सदा सब ही तो ही
ही, ना ही ज्ञान सब रूप रूप स्वरूप ही स्वरूप
सब ज्ञान ही सब रूप सब रूप सब परमात्मा स्वरूप ही सब
सब रूप सब रूप में सब स्वरूप स्वरूप, स्वरूप ही स्वरूप स्वरूप सब
स्वरूप
ऐसा ज्ञान रूप? हे ज्ञान स्वरूप, हे ज्ञान स्वरूप, हे स्वरूप
स्वरूप; ना ही तो सब ज्ञान रूप ही स्वरूप रूप सब ज्ञान ज्ञान रूप
ही सब ज्ञान सब रूप ही तो ही ज्ञान ही रूप ही सब रूप ही तो ही,
केवल सब ही तो ज्ञान सब ज्ञान ही तो ज्ञान
सब ज्ञान ही सब ज्ञान रूप ही तो ज्ञान ज्ञान सब रूप सब ज्ञान रूप
सब ज्ञान रूप ही, स्वरूप ज्ञान रूप सब रूप ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान रूप
रूप ही, केवल ज्ञान--स्वरूप रूप, ज्ञान ही, ज्ञान ज्ञान-स्वरूप ही, ज्ञान रूप
केवल रूप, ज्ञान रूप, ना ही, ज्ञान रूप--ही सब ज्ञान रूप, ज्ञान रूप, ही
52
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ब्राह्मण को दान देना चाहिये, यथा योग्य सत्कार भी करें, पर उनका पथ--प्रद कभी नहिं बनना
चाहिये, शूरवीरता उनका धर्म अथवा कर्म कदापि नहिं कहला
इस पर क्षत्रिय को चाहिये अपने धर्म की रक्षा करता हुआ क्षत्रिय धर्म की रक्षा में अपनी
सर्वस्व आहुति देवे और अपनी मर्यादाओं तथा अपने धर्म तथा अपने राष्ट्र की मर्यादाओं, मान मर्यादा
किसी भी न प्रकार का भी धक्का न लगने देवे जिससे क्षत्रिय धर्म का नाम लज्जित हो सके तथा जो
क्षत्रिय हो कर अन्य वर्णवालों वर्ण को अथवा अपने ही कुल-धर्मवालों अर्थात् वैश्यों, वा शूद्रोंको वा
ब्राह्मण अथवा क्षत्रियोंके आधीन क्षत्रिय धर्म को रखे, अथवा जो क्षत्रिय कुल के होकर भी क्षत्रियों
द्वारा रक्षा न पा कर अन्य वर्णवालों की ही आधीन होकर क्षत्रियत्व को कलङ्कित करता हो अथवा जो ऐसो क्षत्रिय,
ब्राह्मण अथवा वैश्य, शूद्रोंके आधीन हो उनपर राज्य करनेकी चेष्टा करे तो क्या वह अपने को
क्षत्रियत्व धर्म पालने वाला वा क्षत्रिय कहलाने योग्य है? कभी नहीं, वरन् वह तो पापी तथा नीच है?
इस प्रकार क्षत्रिय को, क्षत्रिय धर्म की रक्षा का उद्योग करना चाहिये, तथा क्षत्रियों न को
कभी भी अन्य वर्ण पर राज्य करने की चेष्टा कदापि भी नहिं करनी चाहिये, वा अन्य किसी प्रकार अपने
विचार रखने चाहियें, न कि अन्य किसी प्रकार अपने को राज्यके भूखे साबित करके मर्यादाओं को नष्ट
कराकर राजनैतिक वा क्षत्रिय धर्म का विनाश ही कर बैठें॥
इस बात को तो सब सांसारिक मनुष्य भली प्रकार जानते ही हैं कि क्षत्रियों द्वारा
ब्राह्मणों को सदाचरण सम्बन्धी उपदेश ब्राह्मणों को ही तो क्षत्रियोंके आधीन रह कर ही
देना चाहिये जिससे क्षत्रियों द्वारा राष्ट्र की रक्षा तथा वैदिक मर्यादाओं भली प्रकार हो सके न कि,
ब्राह्मण क्षत्रिय धर्मपर आघात कर बैठें और स्वयं राष्ट्र पर राज्य करने लगें अथवा क्षत्रियों को राष्ट्र
की रक्षा का उद्योग नहिं करने देवे जिससे राष्ट्र में, वा संसारमें अशान्ति फैल जावे और
अन्य किसी पर अन्य का राज्य स्थापित होवे? तथापि वैश्यों शूद्र-वर्ग को तो क्षत्रिय धर्म की
मर्यादाओं नष्ट करनेका कभी स्वप्नमें भी विचार मन में भी न लाना चाहिये।
इसलिये क्षत्रियधर्मको ही सबने सदा मान्य तथा श्रेष्ठ धर्म माना है जिसको क्षत्रिय ही
धारण कर के रक्षा, वा राज्य शासन करते हैं, न कि अन्य ब्राह्मण वैश्यादि क्षत्रिय धर्म को
अपना कर, क्षत्रिय कहलाने का अधिकार, क्षत्रिय धर्मके आधीन रहकर ही तो पा सकते हैं?
अर्थात् क्षत्रियत्व की रक्षा ही, हर प्रकार से क्षत्रिय और क्षत्रिय धर्म द्वारा सब
मनुष्यों की हो सकती है, जो कि सब का रक्षक, सब का पोषण कर्ता एवं सबल क्षत्रिय अथवा
राजा कहलाता है? इस हेतु सब वर्णों, का कर्त्तव्य क्षत्रिय धर्मकी हर प्रकार से रक्षा करना तथा
क्षत्रियत्वको सब सदा अक्षुण्ण बनाये रखना, क्षत्रियों को किसी बात और किसी प्रकार का भी कष्ट,
चिन्ता वा शोक कभी नहिं होने देना, क्षत्रियों का मुख्य धर्म है॥
क्षत्रिय धर्म से ही सब वर्ण और धर्म की रक्षा हो सकती है। फिर जो वर्ण वा मनुष्य
किसी न प्रकार क्षत्रिय धर्म को धक्का पहुँचाने की कुचेष्टा करते अथवा करवाते हैं, क्या वे न
क्षत्रिय धर्मके प्रति द्रोह तो नहिं करते? क्या क्षत्रियत्व नष्ट करना न चाहते हैं? क्या धर्म
की हत्या करने वाले अथवा न करने वाले कहे जानेके वे पात्र नहिं बनते? जिस पर
सांसारिक प्रत्येक नर वा नारीका कर्त्तव्य बनता ही कि वे ऐसे लोगों को सख्त शिक्षा प्रदान
करें॥
सो इस प्रकार, क्षत्रियों द्वारा सदा संसारके सर्व मनुष्यों, विद्याभ्यासियों
को, धर्मोपदेशकों, तथा प्रजा-पालकवर्गों, वा सम्पूर्ण देश वासियों की ही
सुखपूर्वक रक्षा की चेष्टा की जाती रही, सो इस क्षत्रिय धर्म की रक्षाकी ही खातिर तो
इन सब को भी चेष्टा करनी चाहिये कि जिस से किसी प्रकार भी क्षत्रिय धर्मके विरुद्ध
कोई भी व्यक्ति न हो सके, वा क्षत्रियों द्वारा किये न जाने वाले किसी धर्म प्रचार
रूप कार्यमें इन सबको कभी नहिं प्रवृत्त होना चाहिये जिसका प्रभाव क्षत्रियत्वकी
मर्यादा गिराने वा क्षत्रिय धर्मके आधीन क्षत्रिय धर्मके विपरीत अन्य क्षत्रियत्व
का निर्माण कराने में सहायक होने का कारण बनता होवे जिससे क्षत्रियत्व तथा क्षत्रियत्व धर्म
लज्जित हो सके तथा ब्राह्मण आदि वर्णों को, अपनी मर्यादा तथा अपने कर्त्तव्य में
स्थिर रहना ही, अपने क्षत्रिय धर्मके प्रति कर्त्तव्य की मुख्यता है; जिससे कि सब ही
वर्णों की मर्यादा सुरक्षित, व स्थिर रह कर संसार परस्पर में सुखका उपभोग करने
समर्थवान् होवे
जिस का मुख्य ध्येय क्षत्रिय धर्म ही को ही सब प्रकार रक्षा का साधन रूप जान
कर, हर प्रकार क्षत्रिय धर्म की रक्षा की जावे जिससे कि सांसारिक सर्व वर्णों को ही इस
प्रकार, क्षत्रिय धर्मका सहारा हो, जो सांसारिक सर्व प्रजा तथा धर्म की ही रक्षा
कर सके वा अन्य वर्ण अपने धर्म का ही पालन कर सकेंगे, पर कभी क्षत्रिय धर्मकी मर्यादाओं
तथा अपने धर्म की सीमाओं का उल्लंघन
करने का पाप, हर एक वर्ण अपने अपने कर्त्तव्य पालन का ही तो नाम होवेगा वा क्षत्रिय
धर्मकी रक्षा ही का नाम होगा जो केवल ही सब सांसारिक सुख प्रदान करने वाली सिद्ध
54
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