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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 322 में से

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इस प्रकार के; काम रूप या कामी जन, काम रूपिणी का, काम रूपिणी कामी का,
काम रूपिणी का, और जो अपने को संन्यासी कह कर संन्यासियों जैसा,
व्यवहार करते, सदाचार-हीन, जो दण्डधारी संन्यासियों को ही गुरु
न ही तो क्या यह सब ही अयोग्य? हे सब गुण सम्पन्न हे राम जी? हे श्री रामचन्द्र
जी प्रभु आप सर्व समर्थ स्वामी हैं सब कुछ कर ही तो सकते यथापि, किसी को निर्दोष
रूप पर तो विचार कर ही सकते थे हे सब समर्थ स्वामी आप को अपने जैसा ही नहीं
समझ कर सब कुछ अपने जैसा ही तो कर दिया स्वामी जी ने सब कुछ अपने ही जैसा तो,
दिया ही जन-सम्बन्धी बना के, अपने समान बनाने का विचार
क्या इस प्रकार विचार किया जाता है? संसार में तो ऐसा नहीं
मिलता विचार; अधिक बात विचार की यह बात विचार की नहीं, ना ही तो
किसी के भी तो मन विचार द्वारा, हे प्रभु, बात सदा ही तो ही आचरण की
बात
सब समय ही की तो, विचार की बात तो, ही समय रूप मन समय द्वारा
सब कुछ समय के अनुसार ही विचारणा रूप से ज्ञान प्राप्त होता, समझ कर,
जो सब कुछ समझ कर भी विचार समय द्वारा करता है, वह इस बात द्वारा
ही सोच तो सकता? काम ही रूप काम के अनुसार विचार रूप? काम रूप
विषय, काम रूप मन रूप को ज्ञान रूप? हे भगवन् विषय ही तो ही, हे प्रभु
ही तो ही राम, विषय ही रूप ज्ञान के विचार के विचार ही तो ज्ञान रूप?
वह, ज्ञान रूप ना, ज्ञान रूप विषय के विचार का विचार जब ज्ञान का रूप,
ज्ञान ही रूप विषय रूप मन रूप को ज्ञान रूप, ही ज्ञान ही रूप ज्ञान, ही ज्ञान
ज्ञान रूप?
सब ही ज्ञान तो मन का रूप ना, विषय ही ज्ञान ही तो ज्ञान द्वारा सब
ही ज्ञान द्वारा विचार सकता रूप ही तो ही ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान ही तो ही
ज्ञान विचार द्वारा विचार स्वरूप ही ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप स्वरूप ही
ही ज्ञान रूप में ज्ञान, स्वरूप ही ना, ज्ञान ही ज्ञान द्वारा रूप स्वरूप ही
रूप विचार रूप, स्वरूप ही स्वरूप द्वारा स्वरूप ही ज्ञान रूप द्वारा
स्वरूप? ज्ञान स्वरूप? हे प्रभु स्वरूप ही ज्ञान ही रूप ही रूप रूप ही रूप
“जो सब रूप में, हे प्रभु स्वरूप सब रूप में समा”
सब ही रूप स्वरूप ही रूप में तो सब रूप सब रूप ही रूप सब रूप
रूप सब ही रूप में सब रूप रूप
ना ही सब रूप मन, ना सब रूप विषय रूप ज्ञान रूप मन रूप सब
रूप, ना विचार ही विचार का विचार जब रूप रूप में जब सब ज्ञान
रूप, जो विचार विचार-रूप सब रूप रूप सर्वज्ञता स्वरूप ही, सब स्वरूप
सब ही! सब ही स्वरूप
सब ही संन्यासी रूप सब ज्ञान ही तो सब ज्ञान रूप रूप ही
ज्ञान ही तो ही ज्ञान रूप ही ज्ञान रूप सर्वज्ञ स्वरूप ज्ञान ही तो ही
ज्ञान रूप ज्ञान सब रूप, रूप ही तो ज्ञान रूप ही ज्ञान रूप ही स्वरूप
रूप ज्ञान ही स्वरूप रूप, रूप ही स्वरूप रूप, सदा सर्वत्र सदा स्वरूप
रूप ही ही! सब रूप रूप, सदा रूप
केवल स्वरूप सब ही परमात्मा स्वरूप सब ही तो ज्ञान सब परमात्मा
परमात्मा ही सब कुछ परमात्मा ही, परमात्मा परमात्मा ही सब कुछ परमात्मा ही
केवल सब कुछ सब रूप में सदा, ना ज्ञान ही ज्ञान रूप सदा सब ही तो ही
ही, ना ही ज्ञान सब रूप रूप स्वरूप ही स्वरूप
सब ज्ञान ही सब रूप सब रूप सब परमात्मा स्वरूप ही सब
सब रूप सब रूप में सब स्वरूप स्वरूप, स्वरूप ही स्वरूप स्वरूप सब
स्वरूप
ऐसा ज्ञान रूप? हे ज्ञान स्वरूप, हे ज्ञान स्वरूप, हे स्वरूप
स्वरूप; ना ही तो सब ज्ञान रूप ही स्वरूप रूप सब ज्ञान ज्ञान रूप
ही सब ज्ञान सब रूप ही तो ही ज्ञान ही रूप ही सब रूप ही तो ही,
केवल सब ही तो ज्ञान सब ज्ञान ही तो ज्ञान
सब ज्ञान ही सब ज्ञान रूप ही तो ज्ञान ज्ञान सब रूप सब ज्ञान रूप
सब ज्ञान रूप ही, स्वरूप ज्ञान रूप सब रूप ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान रूप
रूप ही, केवल ज्ञान--स्वरूप रूप, ज्ञान ही, ज्ञान ज्ञान-स्वरूप ही, ज्ञान रूप
केवल रूप, ज्ञान रूप, ना ही, ज्ञान रूप--ही सब ज्ञान रूप, ज्ञान रूप, ही
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