एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंयमके सब प्रकार रूप देखकर राजा सब को संभ्रमितचित्त हो गये कोई कुछ न बोले;
विद्याधर ने तब कहा महाराज राजा का एक नाम यम भी है और कोई यम नहीं यम तो
धर्मात्मा पुरुषों का सखा, और पापी लोगों लोग चोर जार कपट पाखंडी, सब को
प्राण लेकर यम यातना नरक भोगवे हैं, राजा सो बात छोड़ के सब
लोगों को यथा न्याय विचार से पालन करो अपराध विचारके सब प्रकार का
दण्ड करो, राजनीति के धर्म सब ही हैं सोई राजा का धर्म और पाखण्ड मत
सुनो और विद्यावान् का वचन सुनके अप्रसन्न विमुख न होय यह उपदेश सुन सब न
तो विद्याधर को जाना वा माना वा विद्यावान् जाना लेकिन सब ही ने समझा कि
पाखण्ड ही का व्याख्या
किया गया सब, सो तो जैसा कहा सब किसी बिना ही समझे वा जाने पर
मान ही गये थे, सो किसी तरह मान
ही गये सो क्यों? सो तो पाखण्ड मत रूप ही संसार विद्या--हीन है,
विद्याहीन को, पंडित भी, अप्रसन्न ही, समझें गे, राजा जी--का काम तो सब
विद्यावान् ही करें
सो यम तो का प्रमाण हो गया था, और यथा न्याय
दण्ड भी पाखण्ड प्रपंच--
रूप सब ही को ज्ञान हुआ था तब पाखण्ड न चला।
सो, राजा विचारता न था, सो बात सांची थी, यथा न्याय सब, दया धर्म रूप
यमराज समझा कर दया की थी सोई पाखंड विद्या न समझाई राजा के न्याय की
निन्दा हो चुकी; न विद्याधर न्याय बात ही बताई सो विद्यावान् का धर्म
प्रकाशमान्, ना पाखण्डियों ने मन समझा और कहा साचा बात, किन्तु ज्ञान
बिना सब को भ्रांति ही रही पाखण्ड बात प्रभाव सब जगह ही फैला वा सब
पर व्याप ही गया, यह तो न जान पड़े
केवल इतना समझें, जो जो विद्या युक्त सब प्रकार विद्या
का नाम सुने
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