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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

उनका जीवन-मरण परमात्मा का ध्यान और ईश्वर भजनपर ही तो था जिससे उनका
आत्मा तो सदा पवित्र ही रहा और शरीर भी पवित्र पावन हो गया! इन पवित्र तथा
महात्मा के चरण जिस स्थानपर पड़े उस पवित्र स्थानपर उन तीन पवित्र महात्माओं का एक पवित्र
स्थान बन गया है, जो कालान्तरमें परमेश्वरके एक मन्दिरके रूपमें बदल गया तथा आज
भी यह तीर्थस्थानके रूपमें आबालवृद्ध सब लोगों का श्रद्धा व भक्ति
का केन्द्र बना हुआ है? पाठक इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है? संसार का एक मात्र सत्य
ईश्वर भजन और सत्य के मार्ग पर चलना तथा पवित्र आचरण ही तो है! धन हो, दौलत
सब यहीं रहकर धूल में मिल जाता है, पर जो भी एक क्षण प्रभु का नाम स्मरण कर लिया जाता
है, वही जीवन को सार्थक करता है; अन्तमें प्रभु का स्मरणही सदा काम आता है,
अन्य सब बातें व्यर्थ सिद्ध
सांसारिक व्यवहारबुद्धिसे यह भी यह स्पष्टतः सिद्ध हो जाता हैकि सांसारिक ऐश्वर्य और वैभवकी
तुलनामें आन्तरिक शान्ति और ईश्वरभक्ति बहुत बढ़कर है। एक राजा या बादशाह चाहे अपनी
धन सम्पदा तथा अपनी विषयवासना तृप्त करनेके लिये सांसारिक सुखोंको जुटा सकता है पर मनकी
शान्ति ईश्वरके चरणोंमें ही प्राप्त होती है। जबतक मनुष्यके हृदयमें परमात्माकी भक्ति जाग्रत्
नहीं होती तब तक मनुष्य संसारमें चाहे कितने भी ऊँचे पदपर आरूढ़ हो जाय उसे
कभी शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती? इसलिए मनुष्यको परमात्माके चरणोंमें नित्य-प्रति प्रार्थना करनी
व प्रार्थना से, वह ईश्वर की कृपा
प्राप्त करसकता है। जो मनुष्य सच्चे दिल से ईश्वर की आराधना करता हुआ सब काम
निष्कामभावसे प्रभु को अर्पण कर देता हैउसका कल्याण निश्चित है; वह मनुष्यसंसारमें परम सुखी हो
जाता है। जो मनुष्य परमात्माके चरणोंमें नित्य-प्रति प्रार्थना करता है और कहता है कि, हे प्रभु!
मैं तो सर्वथा ही अकिञ्चन हूँ। मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है जिससे मैं आपकी सेवा कर सकूं, हे
नाथ! मुझपर दया का हाथ रखिए। तो परमात्मा उस पर प्रसन्न होकर, उसके सब दुःखों को दूर कर देते
हैं। यह परम सत्य बात है, कि परमात्माकी कृपा सबपर समान भाव से बरसती है। कोई अपनी अज्ञानताके
कारण उस अमृत-वर्षाका लाभ नहीं उठा पाता तो इसमें मेघका क्या दोष, अमृत वर्षा तो सबके लिये
एक-सी ही होती है।
क्या किसीका कोई ऐसा उपकारी हो सकता है? संसारमें सब काम स्वार्थ के वशीभूत होकर
ही किये जाते हैं। कोई किसीका निःस्वार्थ उपकारी नहीं हो सकता, एक ईश्वर ही ऐसा उपकारी
है जो सदा सबका भला चाहता, सबका भला करता है, चाहे कोई उसपर विश्वास करे, या न करे।
सबपर उसकी असीम दया बरसती रहती है। मनुष्यको चाहिये कि वह उस सर्वशक्तिमान् दयामय
परमेश्वरकी आराधना करे और अपने जीवनको पवित्र और सफल बनावे। ईश्वरकी आराधनाके लिये
आन्तरिक पवित्रता और ईश्वरके प्रति अनन्य अनुराग ही अपेक्षित है। न तो जप-तप, न ही
तीर्थयात्रा और न ही केवल पूजा-पाठसे ईश्वर प्रसन्न होते हैं।
जो मनुष्य सांसारिक माया-मोहमें पड़कर उस सर्वशक्तिमान् ईश्वर को भूल कर बैठता है
और केवल भौतिक सुख-साधनोंमें ही अपने जीवनको व्यतीत कर देता है, वह अन्तमें पछताता है।
सांसारिक सम्पत्ति कभी किसीके साथ नहीं जाती, केवल मनुष्यके शुभ-कर्म ही उसके साथ जाते हैं।
अतः मनुष्यको परमात्माके चरणोंमें ध्यान लगाना चाहिये, जिससे उसका उद्धार हो सके।
जो मनुष्य सब कुछ प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर देता है और केवल ईश्वरका होकर
रहता है, वह सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है। अतः हमें चाहिये कि हम परमात्माकी
शरण ग्रहण करें और अपने जीवनको सार्थक बनावें।
इस प्रकार हमें अपने जीवनमें ईश्वर-भक्ति, सत्य और सदाचारको अपनाना चाहिये।
जो मनुष्य इस मार्गपर चलता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।
प्रस्तुत कथासे हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें ईश्वरकी भक्तिमें लीन रहना चाहिये।

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यद्यपि इसका उपाय, इस विकत्थनशील युग सब ओर ढूँढ करके भी नहीं पा रहा शक्तिशाली
भी, पर आत्मज्ञानके विस्मृतिजन्य अज्ञानकी स्थिति सबको ही प्राप्त हो परमात्माके इस महान्
साम्राज्य को ऐन्द्रजालिकता का रूपक बना रही, सो आश्चर्यजनक बात केवल यही नहीं,
आश्चर्य यहाँ यह, किस तरह यहाँ परमात्मा स्थित है? उसका स्वभाव केवल ज्ञान रूपी
रहकर सब सांसारिकोंको देख कर केवल सब का साक्षी ही, पर हो रहा अपने उस स्वरूप को विस्मृत,
जड़-चेतनमय सब जग अपनी सत्ता समझ करके।
अज्ञानकी निद्रावस्थाको तो देखा जाता ही सदा ही जगत् रूपी सब ही इन जीवों
द्वारा ही तो जग यह परमात्मा का स्वरूप समझा जाता ही सब ओर। केवल साक्षी? केवल निर्लिप्त
केवल सब दृष्टा? केवल सब ही को सब ओर से सब को आत्मज्ञानका असीमित प्रकाश देकर
सब को ही आत्मभाव से सब को प्रेरित कर सब के हृदय में जग ही रहा! सो केवल जड़-
चेतनमय ही, केवल यह अपने ज्ञान को केवल प्रगट करके ही ही! यह सब बात ही तो सब ही
द्वारा विस्मृत, सो केवल ज्ञान रूप साक्षी, सब ओर आत्मिक प्रकाश केवल सब ही ओर
देकर इस चेतन स्वरूप जग को सदा ही चेतन, सब ओर प्रकाश रूप करता जग ही रहा।
सब ओर परमात्मा को तो केवल जगत् ही जाना सब ओर। सब ओर आत्मा ही तो परमात्मा
सो केवल केवल ही, केवल आत्मा केवल ही! सब का चेतन, जगत् का रूप सब ही चेतन
ही अज्ञानवश ही सब ही जगत् में, केवल साक्षी ही सब ओर जगत् को केवल एक
परमात्मा ही, केवल ही तो प्रकाश ही केवल रूप जगत् में ही, सब ओर फैला रूप
व्यापक स्वरूप? केवल केवल ही? आत्मा ही केवल रूप जगत् स्वरूप ही? आत्मा परमात्मा
ही, केवल केवल परमात्ममय ही सब ओर रूप ही, सो केवल जगत् रूप ही, सब
ओरका परमात्मा सब ओर जगत् स्वरूप ही तो है।
सो केवल यह केवल आत्मा ही अज्ञानमय रूप जगत्, केवल सब ओर समझा गया,
अविद्यावशात् जड़--रूप ही! केवल ज्ञान सब ओर आत्मिक रूप ही, केवल सब
प्रकाश ही, केवल चेतन ही? केवल सब दृष्टा ही, सब ओर सब ओर प्रकाश ही सब
ओर तो यह ज्ञान ही प्रगट है? परमात्मा सब ओर जगत् के रूप में ज्ञान रूपी
सब को सब ओर ज्ञान प्रकाश देकर ही केवल सदा साक्षी रूप से केवल अज्ञानवश
को केवल सब ओर प्रगट ज्ञान परमात्मा सब ओर ज्ञान रूप सब सांसारिकों को ज्ञान
रूप ही प्रगट है।
सो केवल परमात्माका यह केवल रूप ही सब जगत् में तो केवल ज्ञान रूप,
केवल चेतन रूप सब ही जगत्को परमात्मा सब अपने स्वरूप प्रकाश ही से सब ओर
ही सदा ही ज्ञान रूप सब ओर से, सो केवल सब ओर चेतन स्वरूप जगत् ही, केवल
सब ज्ञान रूप सब ओर से केवल ही, केवल सब ही केवल सब ओर से परमात्मा
रूप ही तो, केवल सब ही परमात्मा रूप ही केवल सब ओर जगत् में केवल ही ज्ञान
ही? केवल ज्ञान रूप सब ओर से केवल ही? केवल केवल ज्ञान, केवल केवल
सब ओर ही तो सांसारिकों द्वारा ही ज्ञान रूप ही तो ज्ञान रूप विस्मृत समझा
जा रहा ही तो केवल सब ओर ज्ञान ही सब ओर रूप ही तो केवल ज्ञान रूप सब ओर
सब जग ही ज्ञान रूप केवल सब ओर ज्ञान रूप सब ओर परमात्मा स्वरूप ही केवल ही
परमात्मा सब ओर प्रकाश परमात्मा स्वरूप ही सब ओर परमात्मा रूप सब ओर केवल
केवल ज्ञान ही? परमात्मा सब ओर प्रकाश ही तो है, केवल ही ज्ञान ही केवल
परमात्मा का तो केवल जगत् ही तो ज्ञान-स्वरूप जगत् ही तो सब ओर केवल
सब ओर व केवल ज्ञान ही, व सब ओर सब चेतन ज्ञान-स्वरूप जड़-चेत जगत्
सब ओर सब ही भगवान् ही सब ओर तो केवल ही तो केवल ही ज्ञान रूप स्वरूप
सब ओर है।
केवल ज्ञान रूप जगत् ही तो सब का स्वरूप ही सब ओर चेतन रूप सब
ओर ही? सब ओर जगत् स्वरूप ही सब ओरका परमात्मा ही स्वरूप? ज्ञान रूपी,
सब ओर ज्ञान रूपी चेतन सब ही स्वरूप ही, केवल सब केवल सब केवल
केवल जगत् ही! सब ही केवल केवल सब ओर ही केवल है।
सब ओर केवल ज्ञान रूप परमात्मा सब ही जगत् सब ओर केवल ही चेतन
व सब ही तो केवल स्वरूप सब ही ज्ञान ही सब संसारमय सब संसार स्वरूप
ही सब ओर केवल व सब ही ज्ञान व सब ओर ज्ञान केवल ही सब ओर ही, केवल
ही सब ज्ञान ही, केवल ज्ञान ही, सो तो यह केवल ही तो ज्ञान रूप केवल ही
जगत् सब स्वरूप जगत् ई-श ही सब ओर ही तो सदा ही केवल ही ज्ञान ही सदा
सब ओर ही केवल चेतन सब ओर परमात्मा ईश-रूप सब ओर सब ओर ही
जड़-चेत जगत्, परमात्मा केवल जगत् ही सब ओर रूप सब ओर केवल चेतन,
परमात्मा स्वरूप ज्ञान केवल सदा परमात्मा सब परमात्मा ही है,
258

कुण्डलीयाँ बनाओगे तो इस जगत का काम ही खतम हो जायगा अर्थात् तुम! जो कुछ
सब कुछ करने वाले समस्त ही अपने को ही सर्वो-परि मान लोगे तो जगत उत्पत्तिकर्ता का
तो काम बन्द ही हो जाना पड़ा।
विचार के देखो, सृष्टि को पैदा करने वाले सब की ही कद्र को जानतेहुये
काम करते चले गये वा हैं, सो सब को ही संसार में अपने मन से ही सब को
सुख देने वाले साधन देकर नियत किया वा जन्म-मरण के फेरे सब पदार्थों
अपने बनाये स्वरूप नियत किये वा सब शक्तियां दी शक्ति रूप साधन बना संसार
की पालना की व्यवस्था।
भला जिस ने कुण्डलीयाँ बना संसार को पैदा न किया होता, किसी ने
परमात्मा किसी को संसार में भेजा, किसी ने संसारी जीवन ही न तो सब को
दिया संसार बन न सका बिना परमात्मा शक्ति के सब ही को सब को ही अपनी
ही शक्ति बना, सो तो बना परमात्मा का बनाया ही सब कुछ बना तो कुण्डली
के द्वारा भला कब कुण्डली बनाने वाले का सम्बन्ध सब से बना सकता है।
जरा सोच समझ कर तो ही देखो तो, भला कुण्डली बनाने वाले ने क्या
सब को बनाया वा बना सकता है संसार को, जो सब का सम्बन्ध सब से इस
रूप बना सकता है जिस का सब से सब सम्बन्ध बने, न कुण्डली ही के द्वारा कोई
बन सका संसार न ही बन सकता कभी संसार, न कुण्डली के साधन द्वारा कोई
संसार में सब काम चला सका, न बना सकता ही है सब काम सब का बना
कुण्डली द्वारा संस्कार का काम तो, सो तो सब काम सर्वशक्तिमान के बनाये ही
से चला संसार व्यवस्था का संसार स्वरूप व्यवस्था के साथ चलता ही रहा
या चल रहा या चले ही तो संसार का सब काम बन सके या बन सका, सब
ही का सब कुछ सब से बना हुआ, सब का मिला हुआ।
जरा तो ही तो सब ही सोच कर देखो कुण्डली बनाकर भला सब काम का
ठिकाना क्या बन सकता था। क्या कभी शक्ति के बिना जन्म-मरण काम सब या
जन्म-मरण सब सब को कुण्डलियों के द्वारा हो सका था क्या या हो रहा या होगा ही
जिस काम को संसारी जीव द्वारा सब ही को सब कुछ दिया गया, जिस ने सब को
बनाया उसी द्वारा सब कुछ चला वा दिया हुआ सब को सब कुछ संसार द्वारा सब को
सब कुछ सब को दिया गया वा मिल रहा, सो सब साधन तो सब को परमात्मा
ही, कुण्डलियों द्वारा नहीं-सब कुछ मिल सका।
भला जब सब कुछ सब का चलाने वाले को ही आधार बना माना गया,
किसी ने आज तक सब सब काम संसार द्वारा सब ही का तो किया वा, सब कुछ
दिया? सो तो सब कुछ सब ही का काम था, जो सब का आधार बना चला आ
रहा, सो संसार सब को ही सब काम सब ही का सब कुछ द्वारा संसार को ही आधार
बना, सब संसार सब को ही सब कुछ बना ही दिया! तो जिस को, जो कुछ
बना मिलना था सब मिला! जन्म-मरण का सब साधन सब मिला! सो सब
मिला सब मिला, सब कुण्डली द्वारा मिला? किसी तरह भी सब कुछ तो
परमात्मा का बनाया जन्म-मरण का सब काम बना, सो सब अपना दिया सब को
दिया सब काम जो कुण्डली द्वारा न सब का हो सका न सब कुण्डली से सब का
काम चला ही सब संसार का, न किसी तरह भी परमात्मा शक्ति भिन्न-भिन्न या
सब प्रकार की थी, जो बिना शक्ति साधन परमात्मा के अपना काम कर या हो
सकती या हो, किसी का सब काम सब प्रकार का सब ही रूप से आधार
सब कुछ ही का बना रूप स्वरूप सब शक्ति परमात्मा के सर्वव्यापी व्यवस्था
सब प्रकार से बना ही सब जन्म-मरण काम का।
बिना सब को परमात्मा की व्यवस्था सब काम को किये न, तो काम
चलता न कभी! ना न काम हो सब काम सकता? सो तो सब सब काम चला ही
शक्ति के द्वारा बना, ना काम सब रूप में सब का सब काम बनाता या बनता
सो परमात्मा का, संसार का रूप सब शक्ति के द्वारा ही सब जन्म-मरण बना
सब प्रकार से जगत में सब का साधन बना बना जगत रूप में सब को साधन सब
तरह से ही मिला रहा वा रहा, जिस का साधन आधार संसार बना हुआ।
सो शक्ति ज्ञान सब सब सब काम सब आधार रूप में सब सब को ही दिया
जिस द्वारा सब ही को संसार का सब ही तो सब काम बन कर सब का साधन
बनके ही चला सब काम बना, सो बना सब का सब काम सब ही काम से सदा
हुआ चला, सो ही सदा चला चला सब व्यवस्था नियम सब ही को सब सब सब
259

इस प्रकार जो पुरुष केवल भोग की ओर दौड़ लगा रहा है और सब कुछ भोगने का मद जिसके
भीतर जम जाताहै वह पाप-धर्म के भय तथा लोक-लाज से डर कर, जिसे लोक में पाप-
कर्म कह कर पुकारा गया है और जिसे सब बुरा मानते हैं और जो पाप के मार्ग हैं उन
पर सब कुछ त्याग कर दौड़ेगा ही दौड़ेगा। ऐसा क्यों? क्योंकि उस पापी मनुष्य के
विवेक शक्ति पर परदा पड़ गया है और इस परदे के कारण उसका विवेक मारा जा चुकाहै।
विवेक नष्ट न हो इसके लिए यह ही उपाय है जिस से मनुष्य सचेत हो सके कि
वह मन को सर्वथा वश में करे। पर जो वश में न करके मन के वश में होकर चलेगा
वह तो पाप का मार्ग कभी नहीं छोड़ सकता क्योंकि पाप तो मन ही कराता है? जिसे मन कहेगा!
वह तो वो सब कुछ करेगा चाहे वो पाप कर्म हों और फिर उस मन को यह भी ज्ञान
नहीं रहता कि, जिसे लोग पाप कहते हैं वह मन ही सब कुछ करा रहा है। तब
तो वो पाप कर्मों में ही सुख का अनुभव करने लगता है और जब पाप में आनन्द आने लगे, तो
वो कभी निष्पाप बन नहीं सकता है... ऐ मन तू तो उस परम-पिता परमेश्वर का केवल
चिन्तन कर, जो कि सब का रचने वाला आधार व प्रभु, सब को जन्म देकर सब का पालन करने
वाला स्वामी।
सो वो प्रभु सब का उपकार तथा कल्याण ही करता है, अतः तू ही अपने
कल्याण की इच्छा कर और इस पाप के दल-दल रूपी पंक से निकल कर विवेक रूपी
जल घट से उस पाप रूपी मैल को धो कर पवित्र हो, इस ही कार्य रूप में अपनी
सारी शक्ति को तू नियोजित कर दे, तेरा कभी अनिष्ट नहीं होगा।
भोगों की लोलुपता मनुष्य केवल मात्र सुख के ही लिए करता है, जिसे भोगों
का सुखसमझा जाताहै यह सुख भ्रम मात्र होता, केवल न होने का आभास ही होता
इस प्रकार के झूठे सुख में जो मनुष्य सब कुछ भूल कर बैठता है और सब कुछ गंवा
कर बैठ कर रोता पश्चाताप ही करता, पर पश्चाताप से तो बिगड़ा हुआ समय तो
वापिस लौटाया नहीं जाता, न ही सुख मिलता, जो पश्चाताप मन करा रहा था
इसलिए पश्चाताप की ओर न जाकर मन को वश करके जन्म-मरण से मुक्ति
पाकर आनन्द प्राप्त किया जावे जिस से आवा गमन के संकट से छूट मुक्ति
रूपी परम शान्ति मिले, जो मुक्ति पाकरसदा सब सुखों का ही भोग करे,
सब प्रकार के दुःखों से छूटे।
जब तक मन में मोह है, तब तक माया मनुष्य को सब तरह रूप दिखा कर
भुलावे में डाल कर भरमाती ही रहेगी, जो भरम गया उसे शान्ति का मार्ग कभी
प्राप्त हो ही नहीं सकता। भरम से जो बच गया, सो सब कुछ शान्ति का प्राप्त कर लेगा।
जब तकयह मनुष्य मोह रूपी जाल में फंसा, तब तक किसी तरह भी यह बच ही नहीं
सकता। मोह का जाल ऐसा दृढ़ होता है कि ज्ञानी-विज्ञानी भी इस में फंस कर
गिरते हैं, जिन्हें भी मोह का जाल अपने में जकड़ ले; सांसारिक वासना और मोह से
ही तो सब कुछ है, जो कुछ भी इस संसार में।
जो कुछ किया गया अथवा जो हो सकता है सब माया के प्रभाव काम-क्रोध के
कारण व लोभ लालच तथा वासना रूपी लहरों तथा तृष्णाओं के कारण ही मनुष्य करता
ही रहता जिसपर वासना का जोर न चले, वह ही इन सबपे विजय प्राप्त कर सकताहै।
पर वासना मनुष्य को सब ओर से घेरकर सदा अपने वश में रखती, जिस से छूट पाना
ही मुश्कील।
जिसे ज्ञान हुआ, विद्या पढ़ी, पर वासना से मन को न हटाया तोसब कुछ
का व्यर्थ ही हुआ... ऐ मन तूउस सब माया रूपी सांसारिक बन्धन से छूट, मन जिस
रूप बना उस परमात्मा को पा सकता है उस परमात्मा के ज्ञान को मन रूपी जल
से धो कर साफ कर ले जिससे, तू मुक्त हो कर उस परम पद को पा सके जो तेरा पद,
ज्ञान का रूप है, जब तू उस ज्ञान स्वरूप प्रभु को जाने, तभी मुक्ति का मार्ग पा
सकता है मेरे मन!
जिसे मुक्ति मार्ग चाहिए वो सब से पहले अपनी वासनाओं का त्याग करे
जो वासना सब तरह की इच्छाओं का घर तथा वासना ही मुख्य कारण है; न तो वो ज्ञान
प्राप्त करसकता है, न ज्ञान रूपी सत्य परमात्मा को ही पा सकता क्योंकि वासना व
सांसारिक वासना रूपी वासनाएं ही तो ज्ञान रूपी दीप को बुझाती हैं। ज्ञान का
परमात्मा रूपी दीपक यदि जलता रहे तथा बुझने न पावे, तोमुक्ति का ज्ञान
प्राप्त हुवाजिससे यह जीवात्मा उस प्रभु व ज्ञान के प्रकाश द्वारा सत्य को
जान कर सत्य में ही लय पावे। सत्य परमात्मा समस्त सृष्टि रूपी माया का रचयिता है,
पल-भर समस्त संसार को, पलक के झपकने में समाप्त कर सकता अथवा निर्माण करा
देता है, सो उस सत्य स्वरूप को जान कर उसपरमपिता परमात्मा की शरण को प्राप्त हो
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इस प्रकार हम विचार कर सकते, अथवा कह सकते कि मनुष्य जन्म का क्या अर्थ? उस मनुष्य का जीवन
भी तो व्यर्थ कहलाने योग्य रहा जिसे मनुष्य जन्म तो प्राप्त हुआपरन्तु वह मनुष्य बन न सका
अथवा यों कहो, हे देव, यदि ऐसा मानव मुझे या अन्य किसी विवेक को जन्म देने योग्य हो तब
भी ठीक!
सो यह विचार निसंकोच प्रकट हो रहा था, जिससे उनके मानसिक द्वन्द्वका
समाधान मिलना सम्भव हो सके। सो जब विवेक जागृत हुआ तब देश-विदेश की समस्या
सामने रख उसने उस माता-पिता तथा उन सभी अन्य लोगों से वार्तालाप न आरम्भित की, व
साधारण रूप से समाधान कर दिया कि भारत को इस काल-रूपी संकट तथा इस भारी
दुःख बाधा संकट रूप उस भव रूपी कूप से अन्य संशय-कलुषित व्यक्ति नही निकाल
सकते उस को, जिनका मन, हृदय कलुषित रहा
पर जो लोग देश के सब नर और नार को एक मान कर चल रहे, उनकी अहिंसा,
उनका संगठन, सत्यप्रिय व्यवहार, यह... ही ऐसा शस्त्र तथा अस्त्र सिद्ध होगा जो
संसार रूपी इन दोनों शक्तिशाली विरोधी शक्तियोंके सामने टिक सकेगा, जब हम
संसारके किसी भी दल का आश्रय स्वीकारेंगे तो अन्य शक्तिशाली दल से भयभीत
होते ही, हम उस संकट से छुटकारा पानेके लिये कुछ समय पहले फिर भी भय पाते रहेंगे
यदि हम एक अन्य महान् शक्ति का रूप स्वतः अपने भीतर पैदा कर लेते जिसे सत्य कहा
सकता रहा हो, समय आ पड़े तो, हम तो सब मिल कर एक संगठित शक्ति बन जांय, और
संसारके किसी अन्य दल का भय भी न रहे
इस विचार धारा को सुन कर, जो लोग पहले ही अशिष्ट थे, उन सब जन समूह
तथा अन्य जन ने जब विवेक-बुद्धिके इस विचार का विचार कर लिया तथा समझ भी
गये तब उनका हृदय यह समझ कर कि भारत, जो पराधीन हुआ बैठा था उसने
तथा अन्य सब लोगोंने मिलकर यह तय किया स्वाधीनता तो जो मिले वही उचित
रहेगीऔर सब जनसमूह ने उस बात को स्वीकारना आरम्भ कर
विवेकने जब यह बात समझी कि स्वाधीनता पाने का यही पथ, सत्यनिष्ठा
सदाचार ही सब सम्भव करने वाला बन रहा, इससे उनके साथी अलबेला आदि
सब विस्मित हो विवेक अलबेलाके ही विचार को मानने लगे, इससे उनकी जो पहली
धारणा थी विरोधी से सहयोग न साधनेके लिये कष्ट, संकट तो उठाने पड़ेंगे पर उस
मार्गको नहीं छोड़ना
विवेक के प्रति माता प्रेम, अलबेला का प्रेम अपने प्रति सम्मुख, उस बात ने विवेक
आत्माको विचलित नहीं किया कि भारत को संकट तथा कठिनाइयोंसे छुड़ाना होगा, इसके
सम्बन्ध में विवेक का मन सब ओर भ्रमण किया, जिससे विवेक का संकट दूर होने लगा
साथ ही समाज सुधार आरम्भ
वह तो जानता रहा ही था कि भारत-मर्यादा प्राचीन विचार पर ही स्थित-
रहित होकर भारत आज जिस रूपमें खड़ा था, उसकी रक्षा करना एक व्यक्ति
का कार्य अथवा किसी एक दल विशेष द्वारा नहीं माना जा सकता रहा होगा, बल्कि
सब मिल करही ऐसा कर सकते थेऔर, जब आत्मिक दुर्बलता सम्पूर्ण देशमें
व्यापकतर दिखाई दे, सामाजिक संगठन केवल विचार तक ही सीमित हो कर बिखर-
सागया दिखाई पड़ने लगातथा देश के दो सम्प्रदायों के बीच, जो कि अपने समाजके
अन्य अन्य अंगों जैसे माने जाते रहे थे उनके बीच ऐसा भेद खड़ा हो चुका
था, जिससे समाज विच्छिन्न
होने लगातथा स्वाधीनता का लक्ष्य पीछे पड़ जाने लगा तथा धर्म के नामपर
अनेक घिनौने काण्ड देश के भिन्न भागों में प्रकट हो रहेथे, जिससे ऐसा नर,
जिसके दो विचार थे, जो सदा सर्वदा धर्मके नाम पर लड़ते रहे, वह अपने स्वार्थ
साधने के लिये विदेशी-ताकत कासहारा लेते, इससे यह, सिद्ध था, कि भारत दोनों
ओर से पिस रहाथाऔर इस बात से भी भय, कि कल सम्भव था विदेशी तो
भारत को छोड़ ही जाये, पर भारतीय ही आपस में कट-मरें, जो दशा आज के युग
में देश की दिखाई दे, उस संकटसे देश को मुक्त करने-करानेके लिये ही, भारत
संस्कृति सब धर्मों का आदर करती रही है, तो सब धर्म एकसाथ मिल परस्पर
सहानुभूति पूर्वक काम करते
तो आज भारत का मुख और उसकी अपनी संस्कृति विश्व भरमें अपनी विशेष प्रतिष्ठा
प्राप्त किये ही थीऔर उस का कारण विवेक का यह विचार ही था जिसने अलबेलाको ही
प्रभावित नहीं किया बल्कि भारत के दो दल विशेष जो परस्पर लड़ते रहने को तैयार रहते
आयेथे उन सब को विवेक समाज की यह सीख मिली, कि आपस में लड़कर सदा
व्यर्थ, पर विचार व एक होकर अपने देश को उस संकट से सदा सुरक्षित रखिये
261

उस उपद्रवकारी मनुष्य को यह बात ठीक तरह समझ लेनी चाहिए कि भारत का हर सच्चा नागरिक जो
चाहे या नचाहे रूप में भारत का अन्न खाता अथवा कपड़ा पहनता है; या भारतीय डाक्टरों की चिकित्सा
अथवा जीवन औषधि पाता अथवा भारत भूमि द्वारा प्रदत्त आमोद-प्रमोदनों अथवा पद, प्रतिष्ठा को,
जो भारतमाता अथवा उस समाज का अंग अथवा अंश बनकर सब कुछ भोगता हुआ सुखिया रहता है
उसका धर्म बनता, कि कृतघ्न न होकर कम से कम भारत का तो सम्मान करे ही जिससे उस देशद्रोही
रूप में उस उपद्रवकारी जन को समझना
तो चाहिए कि व्यवहार में वह कोई भी रूप क्यों न अपनाए पर परमात्मा के सच्चे न्याय रूप में
उसका सुख केवल इस बात समझकर नष्ट अवश्य होगा क्योंकि, इस स्थिति का उसका कोई
सच्चा साथीदार बनेगा, न माता पिता, रिश्तेदार, सब उससे अपना संबंध केवल स्वार्थ
रूप ही मानकर या अज्ञानतावश ही निभाएंगे, न्याय रूप में परमात्मा की कचहरी में वह अकेला ही
ही होगा? तो विचारना का रहेगा भला? कृतघ्नता का न्याय बनेगा? जो मनुष्यता के सर्व
ही विपरीत या पाप में गिना गया, इसके सिवाय और क्या रूप उपद्रवकारी को प्राप्त हो
सब समय या रूप में विचार सकते हो? न्याय रूप ही तो ऐसा सत्यता का एकमात्र
व्यवस्थापक कहा जाएगा
हर समय अपने विचार को शुद्ध रख, जिससे कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य परमात्मा
स्वरूप को समझ कर ही पालन कर के श्रेष्ठ कर्मों का फल प्राप्त कर सके, ना कि केवल शरीर
को सन्तुष्ट रूप रख कर ही सुख अनुभव करता रहे; या तो ऐसे रहो, जिससे कि सबका
कल्याण हो या सबका अहित करने वाले उस वातावरण से स्वयं को अलग कर
निर्भय बना कर सब को प्रेरणा देकर जीवन सफल किया जाए जिससे स्वयं सब कुछ श्रेष्ठ
बनते हुए सब को सन्मार्ग प्रेरणा देकर शुद्ध, पवित्र हो कर न केवल अपना भला, बल्कि
सब का ही कल्याण कर प्रभु कृपा प्राप्त, सबको ही उस परमात्मा रूप सच्चा
साथीदार तो हर एक जीवात्मा का केवल प्रभु, और केवल परमात्मा ही अपना एक
सर्वसमर्थ सच्चा और जीवन-दाता परमेश्वर रहा और सदा रहेगा भी केवल परमात्मा रूप सच्चा
प्रभु सब का ही, सब ही का स्वामी सदा प्रभु सब समय में सहारा दे तो सकता है पर मनुष्य न
बात को न मान कर केवल स्वार्थ, या सब कुछ अपने कर्मों द्वारा सब कुछ सोच कर ही
अहंकारपूर्वक कर्म, विचार करता हुआ, हर समय केवल भ्रम में भटकता हुआ ही परमात्मा
शक्ति अथवा कृपा से वंचित हो जाता, जो कि सबसे बड़ा पाप
विचार वास्तविकता त्यागकर या सब कुछ नश्वर समझ त्यागने वाले मनुष्य को
किया, जब सब कुछ त्याग कर सब कुछ प्रभु को, अपने सब विचार समर्पण करता हुआ
प्रभु शरणागत हो सब रूप से हर एक का सच्चा कल्याण करता हुआ सब कुछ पाकर भी,
वास्तविकता त्यागे बिना रहता, तो भगवान, परमात्मा, विचार भला? या तो प्रभु सब
नियम सत्यता त्याग करता, जो प्रभु शरण केवल परमात्मा की ही कृपा समझकर त्याग करता,
प्रभु का भक्त, सब संसार को त्यागकर केवल प्रभु कृपा पर निर्भर करता, वह प्रभु कृपा वंचित
क्यों रहता? परमात्मा भक्त की वास्तविक स्थिति ही, यह होगी, कि प्रभु का सब प्रकार
का सहारा, प्रभु कृपा से सब प्रकार केवल ईश्वर के ही सब कुछ समझ सकता है प्रभु कृपा से
सहज रूप से सब का पालन प्रभु, स्वयं ही सब कुछ करा रहा, तो न तो कोई
व्यक्तिगत द्वेष रखता है, न किसी बात का पश्चाताप करता हुआ रोता है, हर समय
केवल हर सांस प्रभु का स्मरण ही, हर पल प्रभु का ध्यान करता, इसके सिवाय प्रभु
कृपा का कोई रूप नहीं बल्कि प्रभु की शरणागत अवस्था को ही मनुष्य जीवन का एक
मात्र रूप या परिणाम कहा गया व माना जाएगा
परमात्मा की सच्ची शरण ही मनुष्य जन्म को पाकर हर एक को सच्चा रास्ता
दे कर हर समय प्रसन्न रख कर अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करा सकती, केवल प्रभु शरण
ही सब प्रकार मंगल रूप व हर अनिष्ट निवारण करने वाली बन सकती, प्रभु कृपा
केवल हर एक का सब रूप से सब रूप में कल्याण सब अवस्था में व सब काल में
करेगी
परमात्मा का स्मरण ही सब कुछ रूप में सच्चा सहारा जीवात्मा का बन कर सच्चा फल
देकर परमात्मा स्वरूप दर्शन करा कर प्रभु कृपा का पात्र बनाता होगा या नहीं? केवल
प्रभु शरण ही जीवात्मा रूप मनुष्य व केवल प्रभु ही हर प्रकार से समर्थ रहा अथवा रहेगा,
सब जीवात्माओं परमात्मा रूप ही तो है सब रूप में प्रभु का ध्यान कर ही तो सब प्रभु,
हर रूप में सब कुछ प्राप्त हो सकता है, सब कुछ केवल प्रभु सब कुछ करने वाला, प्रभु!
सब प्रकार सब कुछ देने वाला व केवल प्रभु ही हर बात का हर समय हर रूप से
सब रूप सत्य प्रदान करे, भगवान्! केवल कृपा करो सब पर सब व केवल प्रभु ही
सब को दया कर, सब का कल्याण ही हो सकता प्रभु, कृपा करो प्रभु!
262

यह स्वाध्याय केवल धर्म का ही या अध्यात्म का रस या स्वाद ही नहीं है।
स्वाध्याय मन का रस लेकर उसके द्वारा रस प्राप्त कर आत्मा तक पहुँचने
का प्रथम सोपान हो जाता अथवा बनता है, अथवा स्वाध्याय आत्मा का रस ही
या अध्यात्म का, आत्मा स्वयं ही रस स्वरूप तो स्वयं आत्मा आनन्दस्वरूप ही
होता
पर मनको स्थिर कर लें तो ही यह रस, आस्वादन होगा, अन्यथा
स्वाध्याय द्वारा स्वाध्याय का रस प्राप्त होना भी एक बहुत बड़ी साधना ही हो
जाती या फिर व्यर्थ मन का ही व्यापार बनता होगा? मन तो स्थिर रहा कभी-कभी
होगा, पर मन का भी स्वभाव है कि वह व्यर्थ स्वाध्याय करता रहे केवल रस लेने
के ही खातिर व्यर्थ, या स्वाध्याय का प्रभाव भी तो आत्मा तक ही रस रूप बन कर
पहुँचता रहता है?
इसका क्या उत्तर होगा? मन तो या स्वाध्याय द्वारा भी, या मन को रस तो
मिल रहा, रस स्वाध्याय द्वारा प्राप्त मन कर रहा, तो मन तो तृप्त हो चुका था
रस प्राप्त कर, या मन तृप्त न हो सका, तृप्त होता फिर स्वाध्याय
क्यों करता रहा! या फिर मन तो सब कुछ कर चुका था या केवल एक ही
रस स्वाध्याय द्वारा प्राप्त कर लेना-देना चाहता था या उसका स्वभाव
अथवा मन तृप्त न ही हो सका था यह रस प्राप्त कर लेने मात्र से,
केवल रस, स्वाद मात्र स्वाध्याय द्वारा प्राप्त तो कर लिया था तृप्त होने
तक रस, स्वाद ले चुका था; मन तृप्त नहीं हुआ, तृप्त तो मन होना
था; मन तो तृप्त नहीं हुआ? मन तो तृप्त हुआ ही? मन तृप्त हुआ ही न? तृप्त
तो आत्मा ही मन द्वारा रस प्राप्त कर तृप्त हो सका था, या तृप्त
ही स्वाध्याय द्वारा या आत्मा तक पहुँच कर ही रस प्राप्त होना था।
आत्मा-स्वभाव ही रस रूप या आत्मा आनन्द रूप तो होता ही, जब कभी मन
आत्मा से तृप्त न हो पा रहा, कभी-कभी व्यर्थ स्वाध्याय करता रहा, तो वह
तृप्त रस आत्मा से स्वाध्याय से था, तृप्त स्वाद से, तृप्त मन रस-तृप्ति मात्र
तक तृप्त रहा, मन तृप्त-आत्मा? तृप्त तो आत्मा द्वारा तृप्त स्वाध्याय
स्वाध्याय से हुआ था? मन तो स्वाध्याय का रस ले रहा था तृप्त तो, रस
तृप्त तो आत्मा से था, तृप्त स्वाद मात्र से मन था? मन तृप्त हुआ या नहीं
तृप्त तो या आत्मा रस-रूप से आत्मा
मन को स्वाध्याय के द्वारा रस तृप्त तो कर ही दिया था स्वाध्याय न रस का
रस रूप स्वाध्याय तो या तृप्त तो हो चुका होगा आत्मा द्वारा या स्वाध्याय का
तृप्त स्वरूप या तृप्त करने का आधार स्वाध्याय ही रहा होगा या आत्मा रस रूप
द्वारा ही स्वाध्याय से ही रस तृप्त हो रहा
तृप्त तो आत्मा, तृप्त तो रस से तृप्त हो गया, स्वाध्याय द्वारा प्राप्त
आत्मा तृप्त हो गया, या तृप्त तो आत्मा ही था केवल स्वाध्याय का रस आत्मा
पाया था? रस स्वाध्याय द्वारा ही तो आत्मा को रस के द्वारा तृप्त हुआ,
तृप्त होना ही आत्मा रस का स्वाध्याय बना, तृप्त मन तृप्त रस से मन रस का
रस था, तृप्त मन रस मात्र तक तृप्त रहा, तृप्त तो आत्मा रस तृप्त मन रस
द्वारा बना, तृप्त मन तृप्त रस स्वाध्याय द्वारा स्वाध्याय स्वाध्याय आत्मा का
ही रूप बन तृप्त रस मन तक पहुँचा
तृप्त आत्मा था, तृप्त आत्मा द्वारा मन को स्वाध्याय प्राप्त हो या
तृप्त आत्मा ही स्वरूप रहा
जो तृप्त होता तो मन आत्मा तक तो रस तृप्त स्वरूप मन स्वाध्याय का
स्वाध्याय बन तृप्त होता ही रस से? मन तृप्त आत्मा का स्वाद ले रहा था, आत्मा
तृप्त रस आत्मा ही तृप्त हो रहा था? मन तो तृप्त रस के रस मात्र तृप्त था!
तृप्त स्वाध्याय स्वाध्याय बना, तृप्त तो रस तृप्त था, तृप्त रस तो तृप्त आत्मा ही
रस का रस रहा था? या आत्मा का तृप्त होना स्वरूप था? या जो स्वाध्याय द्वारा
तृप्त रस स्वाध्याय का, तृप्त तो स्वाध्याय रस स्वाध्याय ही तृप्त रस द्वारा
तृप्त बना? तृप्त तो रस तृप्त रहा तृप्त हो कर तृप्त रहा तृप्त रस तृप्त तृप्त
तृप्त ही तृप्त का तृप्त रूप या तृप्त रस तृप्त ही तृप्त हो रस स्वाध्याय का
स्वाध्याय
रस तृप्त रहा, स्वाध्याय द्वारा तृप्त? तृप्त तो तृप्त आत्मा, तृप्त तृप्त
रहा? स्वाध्याय का तृप्त तो मन ही रहा तृप्त आत्मा द्वारा तृप्त रस तृप्त,
263

परमात्माका वियोग कभी किसी अवस्था विशेषमें नहीं होता, प्रत्युत परमात्माका वियोग
सर्वथा असत् है?
इसका उत्तर यह दिया गया कि उत्पत्ति और विनाश तो प्रकृति और प्रकृतिके कार्य
शरीरादिके होते हैं। प्रकृतिके कार्यके वियोगको तो हम वियोग मानते हैं, पर प्रकृतिके कार्यके साथ
परमात्माका जो नित्य योग है, उस नित्य योगको नहीं मानते। यद्यपि प्रकृतिका कार्य और नित्य
तत्त्व दोनों एक हैं, दोनों सत् हैं, प्रकृतिके कार्य और
जीव का नित्य सम्बन्ध केवल परमात्माके साथ ही है। जब जीव परमात्माका
स्वरूप ही है तब जीव परमात्माका अंश होकर भी परमात्माके वास्तविक तत्त्वको नहीं जान रहा
केवल इस बात को, इस मूल बात को, इस तत्त्वको जान लेनेपर अज्ञानका नाश हो
जायगा। मनुष्य जब तक इस प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़कर रख रहा है तबतक परमात्मासे अलग ही
बना रहेगा। पर जब यह मान लेगा कि 'मैं केवल ईश्वरका हूँ? मेरा ईश्वर ही सब कुछ है? केवल
मेरा प्रभुके साथ ही नित्य सम्बन्ध है?
साधक जब केवल परमात्माको अपना मान लेता है तब वह प्रकृतिको अपनेसे अलग कर देता
परमात्माको सब कुछ मान लेनेसे ही, यह जीव प्रकृति-संसारके बन्धनसे छूट जायगा। जब--
परमात्माको ही अपना मान ले, तो उसका मन, उस जीवका मन--चित्त सब कुछ ईश्वरके चरणोंमें
लग जाय। फिर वह ईश्वरके चरणोंमें लीन होकर ईश्वरके साथ एक हो जाय तब वह ईश्वरके साथ
सम्बन्धका रस पाने लगे तब वियोग कहाँ? परमात्मा तो सब जगह परिपूर्ण हैं।
इस प्रकार जब वह परमात्माके स्वरूपको जान लेता है तब वह, केवल उस भगवान्के
ध्यानमें रत रहेगा।
जब ऐसा जान लेता है तब वह जीव सब जगह और सब कालमें परमात्माकी सत्ताका ही अनुभव
करने लगेगा। जब परमात्माको सब कुछ समझता है तब वह संसारको ईश्वरका स्वरूप ही मानेगा।
अतः, वियोगकी सम्भावना कहाँ रही? ईश्वरकी सत्तासे अलग न संसारका अस्तित्व है और न उस
जीवका स्वरूप ही? जब सब भगवान् ही हैं तब परमात्मासे भिन्न क्या रहा? जब
सब भगवान् ही हैं? केवल यह न जाननेके कारण ही जीव इस मिथ्या वियोगका अनुभव
कर रहा है।
जब वह इस बातको समझता है कि भगवान्के सब ओर होनेपर भी जो जीव अपनेको
भिन्न मान रहा है उसका कारण उसका यह अज्ञान ही है कि वह भगवान्को अपनेसे
अलग समझ रहा है, इसीसे वह भटक रहा है, पर जब, ज्ञान उत्पन्न होनेपर वह अपने स्वरूपको
भी उस स्वरूपका ही अंश मानने लगता है तब उसका जन्म-मरणरूप यह सब प्रपञ्च नष्ट हो
जाता है।
सब कुछ परमात्माका ही अंश होनेके कारणसे ही, सबमें एक ही, उस एक परमात्माका अंश ही
व्यापक होनेसे परमात्मासे अलग कोई नहीं है, परमात्माका स्वरूप सबमें व्यापक है।
अतएव, परमात्माका नित्य-योग स्वाभाविक रूपसे सबके भीतर वर्तमान होनेपर भी
अज्ञान, भ्रमके कारण उस नित्यको न जाननेसे जीव इस संसारके नश्वर सुखको ही सुख
समझता रहता है।
वास्तवमें तो सब कुछ भगवान् ही हैं, उस ईश्वरके सिवाय अन्य कुछ
है ही नहीं! जब नित्य-तत्त्व ही सब जगह व्याप्त है तब जीवका यह जो वियोगका
भाव है, वह केवल भ्रमके कारण ही है। जब मनुष्य अपने आपको इस भ्रमसे छुड़ा
लेता है तब वह इस बातको समझ जाता है कि परमात्माका वियोग सर्वथा असत् है।
सब ओर और सब समयमें केवल वही एक परमात्मा ही परमात्मा व्यापक हैं। इस प्रकारके
तत्त्वज्ञानसे सब भ्रम दूर हो जाते हैं।
परमात्माका कभी किसीके साथ वियोग नहीं होता। प्रत्युत परमात्माका वियोग
केवल उस अज्ञानी व्यक्तिके मनमें ही रहता है। परमात्माका स्वरूप सर्वथा अखण्ड है। जो मनुष्य
संसारके प्रपञ्चमें फँसा रहता है और भगवान्के स्वरूपको भूल जाता है, वह
अज्ञानके कारण अपनेको परमात्मासे अलग मानता है, पर जो मनुष्य ईश्वरका भजन-कीर्तन
करता है और भगवान्के स्वरूपका ध्यान करता रहता है वह इस संसारके आवागमनसे
मुक्त होकर उस परमधामको प्राप्त कर लेता है जहाँ परमात्माका नित्य-योग रहता है!
इस प्रकारसे जब मनुष्य अपनेको सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर देता है
तब वह इस संसारके सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जब तक मनुष्य अज्ञानमें फँसा रहता
है तबतक वह इस बातको समझ नहीं पाता कि उसका ईश्वरके साथ नित्य सम्बन्ध है,
परन्तु जब भगवान्की कृपासे उसके भीतर ज्ञानका प्रकाश होता है तब वह सब संशयोंसे
मुक्त हो जाता है। अतएव परमात्माके साथ कभी किसीका वियोग हो ही नहीं सकता।
परमात्मा सर्वत्र और सब समयमें विद्यमान हैं। मनुष्यको चाहिये कि वह अपने सारे
सांसारिक कार्य परमात्माके निमित्त करे और अपने चित्तको केवल परमात्माके
ध्यानमें लगाये रखे।
264

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265

स्वरूप ज्ञान का कारण और निमित्त उपादान कारण भिन्न; लेकिन केवल ज्ञानकी पर्याय का जो कारण रूप
जो त्रिकाली कारण शुद्ध द्रव्य रूप जो उपादान कारण इसका निश्चय कर पर्याय! उस त्रिकाली उपादान
का लक्ष्य करने से, कार्यकारण भाव का जो यह उपादान ज्ञान का पर्याय निश्चय हुआ समकित
हुआ! जब तक ज्ञान का यह उपादान का निश्चय किया, वह पर्याय निर्मल पर्याय रूप का यह हुआ
यह बात न कोई विचार
मात्र व्यवहार की क्रिया से यह जीव परिभ्रमण करता आया, एक समय मात्र त्रिकाली
का आश्रय का निश्चय किया नहीं समकित उपादान निश्चय हुआ नहीं कि पर्याय, मुझे
स्वरूप प्राप्ति कब होगी? सम्यग्दर्शन कब होगा मुझे? पर्याय में जो विकार होता उसका निश्चय
तो यह पर्याय उपादान निश्चय किया? पर्याय को ज्ञान विकार का निश्चय तो किया है, राग निश्चय
किया राग है, लेकिन ज्ञान स्वयं राग नहीं पर्याय का निर्णय किया कि पर्याय विकार?
विकार त्रिकाली कारण उपादान रूप तो नहीं? ज्ञान स्वरूप द्रव्य है, त्रिकाली उपादान
ज्ञान स्वरूप कारण उपादान का पर्याय! उस का अवलंम्बन पर्याय किया तो यह सम्यक्त्व
पर्याय का कारण रूप जो यह पर्याय का उपादान निश्चय हुआ ऐसा निर्णय किया
निश्चय से ज्ञान ज्ञान द्रव्य है, पर्याय का निश्चय करनेवाला पर्याय है, निश्चय से
पर्याय निश्चय का कारण राग नहीं राग-द्वेष का अवलंम्बन का कारण ज्ञान पर्याय नहीं
पर्याय ज्ञान का अवलंम्बन ज्ञान द्रव्य त्रिकाली कारण ज्ञान रूप पर्याय निश्चय
ऐसा द्रव्य रूप का अवलंम्बन राग-द्वेष कारण का अवलंम्बन ज्ञान पर्याय नहीं
यह बात राग-द्वेष रहित का द्रव्य ज्ञान स्वरूप ज्ञानानंद
ऐसा पर्याय रूप परिणत जो पर्याय उपादान स्वरूप कारणद्रव्य का ज्ञान किया
पर्याय का अवलंम्बन हुआ, वह अवलंम्बन हुआ, पर्याय का जो त्रिकाली स्वरूप उपादान
कारण द्रव्य-स्वभाव का निश्चय सम्यक्त्व पर्याय का अवलंम्बन किया गया
यह ज्ञान-ज्ञेय निश्चय किया यह निश्चय, सम्यक्त्व ज्ञान पर्याय-
स्वभाव का निश्चय ज्ञानी किया तो त्रिकाली ज्ञान ज्ञेय-ज्ञेय स्वरूप ज्ञानी पर्याय
ज्ञान त्रिकाली कारण ज्ञान ज्ञेय उपादान स्वरूप कारण पर्याय ज्ञान उपादान पर्याय रूप
उपादान का कारण ज्ञान ज्ञेय उपादान ज्ञान पर्याय ज्ञान किया यह इस प्रकार उपादान
उपादान निश्चय राग का नहीं राग ज्ञान में राग रूप राग ज्ञान उपादान नहीं, राग
पर्याय विकारी-विकार, विकारी-विकार का अवलंम्बन किया पर्याय ज्ञान किया
यह उपादान पर्याय पर्याय रूप का अवलंम्बन राग पर्याय उपादान का नहीं ज्ञान
रूप, पर्याय ने ज्ञान अवलंम्बन का राग का पर्याय उपादान अवलंम्बन समकित ज्ञान पर्याय
ज्ञान ज्ञायकपना पर्याय समकित पर्याय समकित का जो निर्णय पर्याय समकित पर्याय उपादान
राग उपादान निश्चय पर्याय निश्चय किया ज्ञान-स्वभाव का।
जब समकित ज्ञान निश्चय स्वरूप परिणत हुआ यह ज्ञान का पर्याय रूप उपादान
रूप जो कारण पर्याय का यह उपादान है? पर्याय तो राग स्वरूप निमित्त ज्ञान पर्याय,
पर्याय विकारी उपादान पर्याय का परिणत हो ज्ञान का जो यह रूप, तो यह ज्ञान पर्याय
सम्यक्त्व निश्चय हुआ
ज्ञान का स्वरूप, का स्वरूप का उपादान कारण ज्ञान
ज्ञान कारण ज्ञान, पर्याय सम्यक्त्व का जो पर्याय का ज्ञान पर्याय रूप
ज्ञान पर्याय ज्ञान राग राग ज्ञान सम्यक्त्व
ज्ञान स्वरूप ज्ञान राग राग सम्यक्त्व
ज्ञान पर्याय राग सम्यक्त्व राग ज्ञान राग राग राग पर्याय सम्यक्त्व
ज्ञान पर्याय राग सम्यक्त्व राग राग राग सम्यक्त्व
ज्ञान स्वरूप राग सम्यक्त्व ज्ञान राग राग सम्यक्त्व
राग राग राग राग राग राग राग राग
पर्याय सम्यक्त्व का पर्याय का राग ज्ञान है, राग ज्ञान है, राग ज्ञान राग
ज्ञान पर्याय का पर्याय का पर्याय है? सम्यक्त्व का पर्याय राग का राग का सम्यक्त्व
राग पर्याय राग राग राग राग राग राग राग राग राग राग राग राग राग राग राग राग
राग राग ज्ञान का ज्ञान का पर्याय का राग सम्यक्त्व का पर्याय उपादान का सम्यक्त्व?
राग का सम्यक्त्व? राग का सम्यक्त्व सम्यक्त्व? राग का सम्यक्त्व का सम्यक्त्व राग न राग
है?
राग राग राग, सम्यक्त्व ज्ञान, का पर्याय सम्यक्त्व ज्ञान उपादान ज्ञान का सम्यक्त्व
न राग सम्यक्त्व का सम्यक्त्व राग-राग ज्ञान पर्याय का उपादान का ज्ञान का ज्ञान ज्ञान
सम्यक्त्व
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268

अथवा किसका सन्देह है? यदि तुम्हारे विचार ज्ञान का विषय नहीं हैं तो यह सब व्यर्थ ही
तो नहीं है? यदि इन विचारों तथा इनके विषयभूत पदार्थों का ज्ञान तुम्हारे प्रत्यक्ष द्वारा नहीं
माना जाता है, किन्तु इन विचारों का प्रत्यक्ष तो किया गया और इनके विषय को जाना, तो फिर
अन्य बाह्य वस्तु का भी ज्ञान क्यों नहीं माना जाता? तुम यह किस प्रकार कहते हो? इसलिये
ज्ञान के सब विषय बाह्य ही प्रत्यक्षरूप प्रत्यक्ष प्रतिभासित होते हैं। स्वप्न अवस्था में भी
अनुभूत ही वस्तु का इस प्रकार का यह मिथ्या प्रतिभास होता है।
अन्यथा जो इस तरह का प्रतिभास होता है वह अज्ञान जन्य प्रतिभास प्रतिभास ही तो है अथवा
भ्रमरूप? या फिर यह बात ही मिथ्या? वस्तु के ज्ञान का यह विषय? प्रत्यक्ष दृष्टांत तो
इस प्रकार है, जब कि किसी के द्वारा सम्पादित यह ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से यह
ज्ञान अन्य बाह्य वस्तु के समान ही तो है? ज्ञान इस प्रकार अन्य वस्तु के समान दिखाई
दे? इसलिये यह विचार केवल प्रतिभास मात्र ही रूप में सत्य है।
इस प्रकार बाह्य वस्तु का ज्ञान रूप में प्रत्यक्ष रूप होने पर भी पदार्थ रूप ज्ञान नहीं
हो रहा जिस प्रकार रस्सी में सर्प का ज्ञान अथवा रेत-कण ज्ञान के रूप, तो प्रतिभास मात्र
एक पदार्थ मात्र रूप ही तो सब जगत् प्रतिभास रूप ज्ञान के द्वारा ही ज्ञात हो रहा है, रस्सी
का ही यह ज्ञान रूप प्रकाश मिथ्या है, रस्सी का न होकर? फिर यह क्या है? ज्ञान बाह्य वस्तु
प्रकाशक? प्रतिभास प्रकाश स्वरूप? या प्रतिभास ही ज्ञान प्रकाश? यह रूप किसका है?
यह क्या प्रतिभास? ज्ञान प्रकाश जिस प्रकार बाह्य रूप में अन्य प्रकाश के साथ सत्य ही
रहता है। रस्सी का ज्ञान बाह्य पदार्थ के साथ ज्ञान होने से यह ज्ञान प्रकाश ही तो
होगा फिर, उस रस्सी ज्ञान प्रतिभास से ही ज्ञात हुआ, यह न ज्ञान रूप बाह्य पदार्थ
का ज्ञान उस प्रतिभास ज्ञान रूप में न प्रतिभास प्रकाश का रूप प्रतिभास
रूपी प्रकाश का प्रत्यक्ष रूप ही तो ज्ञान आ--ना प्रतिभास का प्रकाश ही तो है, रस्सी
ज्ञान मात्र ही यह सन्-मात्र रूप ज्ञान ही रूप प्रकाश न रहा, तो यह ज्ञान का ही ज्ञान
के सन्दर्भ में सन्--का ज्ञान ही रूप में प्रकाश ही सब जगत् के प्रतिभास मात्र ही
रहा है, तो यह ज्ञान बाह्य पदार्थ रूप में ज्ञान बाह्य ज्ञान रूप से भिन्न नहीं, यह
ज्ञान प्रकाश ही प्रतिभास
इस प्रकार ज्ञान के स्वभाव का ज्ञान बाह्य रूप सब प्रतिभास, मात्र प्रतिभास, मात्र
प्रतिभास स्वरूप ही सब रूप जगत् प्रतिभास रूप ज्ञान द्वारा ही ज्ञात हो रहा
ज्ञान प्रकाश मात्र ज्ञान के रूप सब जगत् का प्रतिभास मात्र ज्ञान बाह्य ज्ञान
प्रत्यक्ष बाह्य ज्ञान के साथ ज्ञान होने से ज्ञान प्रतिभास बाह्य ज्ञान रूप ही
सब बाह्य पदार्थ प्रतिभास ही सब रूप सब रूप ज्ञान से भिन्न रूप में प्रतिभास
ही सब रूप है, तो सन्-मात्र ज्ञान का ज्ञान प्रतिभास ही सब का बाह्य रूप सब
ज्ञान ही प्रत्यक्ष का प्रकाश ही न हुआ! न प्रत्यक्ष ही प्रतिभास, सब ज्ञान ही
प्रतिभास ज्ञान प्रतिभास का प्रकाश प्रकाश, प्रतिभास प्रकाश, रूप बाह्य
प्रतिभास का प्रतिभास प्रतिभास
तो यह प्रत्यक्ष के अभाव स्वरूप का ज्ञान प्रतिभास का प्रत्यक्ष स्वरूप
ज्ञान सब जगत् का प्रतिभास मात्र ज्ञान सब जगत् ज्ञान के साथ ही सब रूप
इस प्रकार सब ही प्रकाश सब ज्ञान रूप सब ज्ञान सब प्रतिभास का ज्ञान सब ज्ञान
ज्ञान रूप सब ही ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप का ही ज्ञान सब प्रकाश रूप सब
सब रूप ही ज्ञान के साथ ही सब ज्ञान रूप का प्रतिभास स्वरूप ज्ञान सब ज्ञान
सब बाह्य पदार्थ का सब ज्ञान रूप ज्ञान रूप सब ज्ञान, जो प्रतिभास मात्र रूप
के साथ बाह्य ज्ञान रूप प्रतिभास, बाह्य पदार्थ रूप ज्ञान प्रकाश रूप, ज्ञान
प्रकाश रूप सब ही ज्ञान का प्रत्यक्ष रूप ज्ञान सब ज्ञान सब ज्ञान रूप ही सब
ज्ञान रूप ज्ञान का प्रत्यक्ष
ज्ञान रूप सब जगत् ज्ञान-मात्र प्रकाश ही सब रूप ज्ञान सब जगत्, बाह्य
पदार्थ रूप, तो सब ज्ञान के ही रूप स्वरूप प्रतिभास प्रकाश रूप ही सब सब ज्ञान
सब बाह्य पदार्थ सब सब ज्ञान बाह्य रूप सब सब ज्ञान रूप है, ज्ञान रूप ही
प्रत्यक्ष प्रतिभास प्रतिभास के ज्ञान स्वरूप सब ही ज्ञान सब रूप सब बाह्य
के सब रूप पदार्थ है, बाह्य पदार्थ सब ही ज्ञान बाह्य ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान सब
सब ही ज्ञान सब प्रत्यक्ष रूप सब सब ज्ञान सब ज्ञान सब बाह्य प्रतिभास सब
ज्ञान सब ज्ञान सब ज्ञान के सब ही प्रतिभास ज्ञान है? या सब प्रत्यक्ष सब ज्ञान
है, ज्ञान बाह्य ज्ञान, सब ज्ञान ज्ञान ज्ञान सब
तो सब ही सब सब ज्ञान रूप स्वरूप का प्रतिभास रूप है, प्रतिभास प्रत्यक्ष
सब ज्ञान का ही सब ज्ञान का ज्ञान स्वरूप ही सब ज्ञान पदार्थ के प्रत्यक्ष
ज्ञान सब बाह्य प्रकाश सब प्रतिभास सब है! ज्ञान सब प्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष सब
269

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271

विलास मात्र भी नहीं किया। माता-पिता पहले जितने स्वाधीन थे अब उतने नहीं रहे, बात
भी नहीं करते कि न मालूम कब सुपुत्र चिढ़ जायँ! पहले माता-पिता आज्ञाकारी थे
आज्ञा देकर अपने कर्त्तव्य का पालन तो कर सकते थे मगर अब बालक का हाथ पकड़
कर यह या वह काम कराना या तो सिर तोड़ लेना था अथवा न कराना था क्योंकि अब
उसे अपने कर्त्तव्य का ज्ञान नहीं था या अपने ज्ञान अनुसार ही! ऐसी दशा बालक
की? सब ही या बहुत
अवस्था में यह बात हो ही जाती मगर यदि यह न भी हो तब बालक का मन सब ओर
सिर्फ अपने सुख में अपना सुख समझ सकता था, न कि सब के सुख में या सब बात में
सब अपने सुख को न देख सकें, बालक भी सब के सुख में अपना सुख देख-कर सुखी
सब के साथ न हो सकता था यह न समझ कर पहले कहा गया, माता-पिता का सब
बात सिर्फ मां के हाथ में न थी तब सब को या सब लोग सुख समझ सकते सिर्फ!
बाल से बालक अथवा माता-पिता सुखी हों! यदि स्वाधीनता ही सब कुछ या
अपना सुख अपना सुख! तो स्वाधीनता से भी तो माता-पिता अपने सुख
सिर्फ सुखी
प्रत्येक स्वाधीनता सिर्फ एक ही को सब तरह सब से अलग कर या सब
कुछ को तोड़ कर ही नहीं, तब माता सब से सब बात भला-बुरा सब सोचे
सिर्फ अपने स्वाधीनता से तब ही सब, अपने स्वाधीनता सिर्फ बालक ही लें!
सब से एक ओर भी बालक सिर्फ अपने सुख से या सब बात सब सब सब
सब अपने सुख समझे सब सिर्फ बालक के हाथ सब माता सब सब बात में
सिर्फ स्वाधीनता ही लें, सब, सब से सब लें! तो सब बात से सब सब बात
या सब बात सिर्फ बालक ही सब लें!
सिर्फ एक स्वाधीनता से ही सब के साथ साथ बात सब हो या
स्वाधीन या सब हो कर सब स्वाधीनता सब बात से ही न हो कर सब
सब बात में सब सब बात सब से सब स्वाधीन से सब बात सब सब सब
या, तो सब बात सब सब सब सब स्वाधीन बात से सब से न हो सब
सिर्फ स्वाधीन से ही सब से ही सब से सब सब स्वाधीन सब ही या
सब सब से ही सब सब बात सब स्वाधीन, या सब सिर्फ बात सब
सब सब सब
स्वाधीन तो सब बात सब से बालक सब बात से सब स्वाधीन
स्वाधीनता लें! बालक सिर्फ सुख से, सिर्फ सब से न सब बात से सुख लें,
सब से सब से सब बात बात से सब, सब बात से सब बात सब से बालक
से न लें, सब सब बात से सब बात से माता-पिता बात लें! माता
स्वाधीन लें!
तो सिर्फ सब बालक स्वाधीनता से सब से बात बात स्वाधीन बात से
बालक से बात स्वाधीन सब बात से बात से या सब सब सब सब
स्वाधीनता से बालक सब से बात बात सब स्वाधीन स्वाधीन बात से, तो
बात से, बालक बालक सब सब सब बात, बालक बालक से सब से स्वाधीन
स्वाधीन? स्वाधीनता से सब, सब सब लें! सब बात सब स्वाधीन
सब सब सब से सब बात से सब सब स्वाधीन? तो सब से बात, तो बात
सिर्फ बात
स्वाधीन सब बालक से बालक से, बालक से सब सब लें? बात, सब बात
से सब से सब से सब, बात से सब बालक से सब, तो सब से बात से या बालक
से सब सब लें? सब से बात बालक सब बालक लें! तो बालक सब बात से
सब सब बात सब से बालक सब से सब सब सब बात से बालक से
सब बालक से या सब सब लें?
बालक से सब से सब से सब सब बात से सब बात से सब लें?
बात से सब लें? बात स्वाधीन सब लें? तो सब से सब से सब सब बात
बालक बालक बात बात से या या सब से या बालक बालक से सब
सब सब लें? स्वाधीन बात बालक स्वाधीन से बात सब से बालक
से या बालक सब सब बात बात से--तो सब सब सब बालक से--या सब
बात बात बालक से या सब बालक के स्वाधीन से बात बात
स्वाधीन बात सब बालक सब बालक बालक से बात सब बालक
से बात लें, सब बात लें! सब से बात बालक सब सब लें! सब सब बात

272

जितने प्रत्येक परमाणु रूप से सब जगत् भरा साधिकार होकर रहता तिनका जो भोग्य सो भी सब
विचार कर, त्याग किया था सो भी अपना सा, सो यह अज्ञान रूपी पिशाच सर्व को व्याप रहा
सो विचार का प्रभाव ऐसा कि स्वरूप-ज्ञान उत्पन्न हुआ सो भोग्य त्याग को भी अविद्या
का विलास जान कर भोग को भोग्य कैसा? त्याग कैसा? भ्रम मात्र जो त्याग, भोग रूप
विकल्प का अवलम्बन था सोई अज्ञान था क्योंकि जो सब ब्रह्म ही का स्वरूप भास भया
तब स्वरूप विश्राम-अविश्राम दोनों समान प्रतीत हो गये सो सर्व त्याग आत्म स्थिति
का हेतु नहीं यह जो पर से पर तत्त्व साक्षात्कार रूप है सो स्वरूप स्थिति आत्मिक पद
को प्राप्त भया कि जिस पद को प्राप्त होकर महा पुरुष ज्ञानी स्थित होते हैं सो
पदवान्, रूप भया सो भी आत्म विचार, ज्ञानवान् हुआ, विदेह मुक्त हो, अकलंकपद
हुआ, सो यह अज्ञान को तर गया सो मन के जीते मन जीता
जब राजा के अज्ञान का अभाव भय तब ज्ञानवान् हो कर राज्य भोग करने लगा!
भोगों को भोग्य जान कर न भोगे और न त्याग इच्छा करे? अज्ञानी की नाईं भोगों को
भोग करता दृष्टिवन्त भासे किन्तु हृदय करके राजा सो स्वरूप की महिमा को प्राप्त भया।
इति-श्री योग वा० वि० उप० चु० भो०
हे राम! इस पर विचारपूर्वक देखो कि यह मन मन के जीते वश होता है वा
न होता? हाँ, जो नर सर्व त्याग करके वन में जावैं सो क्या? हे राम, जो नर सर्व त्याग करके
भिक्षा मांगें सो क्या? हे राम, जो नर सर्व त्याग करके वन में मौन साधे सो क्या? हे राम, जो नर
सर्व त्याग कर काष्ट मौन साधे सो क्या? हे राम, जो नर अन्न, फलाहार, त्याग कर केवल
पवनहार करे सो क्या? हे राम, जो नर नग्न हो कर शीत घाम भोगे सो क्या? इन से ज्ञानी नहीं
कहाता और न अज्ञान तरता है?
ज्ञानी वही है जो समता अवलम्बन कर केवल साक्षी रूप जान संसार व्यवहार
करता हुआ सम बुद्धिमान् होकर न राग करे न द्वेष करे केवल साक्षी रूप जाने सो ज्ञानी है।
त्याग वही जिस से वासना का क्षय हो सो त्याग उत्तम है। त्याग केवल एक देह से सम्बन्ध
का जो क्रिया रूप हो सो त्याग अज्ञान है। त्याग केवल वासना रूप त्याग को कहा है।
राजा चूड़ाला के त्याग मात्र से स्वरूप स्थिति न पाई, पर जब विचारपूर्वक वासना का
क्षय किया तब स्वरूप स्थिति पाई, सो ज्ञानवान् राजा व रानी दोनों परस्पर यथार्थ ज्ञान के
धारक थे और निष्काम होकर राज करते थे। दोनों का चित्त सम था। वासना शून्य, व न
वासना करके भोग को भोगा था, न वासना करके त्याग को ही अङ्गीकार किया था, यह जो
वासना का नाश सो त्याग और जो वासना सहित त्याग कैसा? वासना का त्याग सर्व त्याग
है॥
राम उवाच॥ हे भगवन्! सर्व त्याग कर जब राजा वन में प्राप्त हुआ था तब क्या
न त्याग हुआ, जो केवल देह से सम्बन्ध था वह तो त्याग किया था पर मन का त्याग
न हुआ॥
श्री वसिष्ठ उवाच॥ हे राम! स्वरूप साक्षात्कार जो है सो आत्म विचार से होता है,
कर्म उपासना मात्र करके नहीं, सो देह चेष्टा मात्र को कर्म उपासना कहते हैं। आत्म साक्षात्कार
सो, जो चित्त के द्वारा साक्षात्कार रूप घट पट होता है सो नहीं, जो केवल देह चेष्टा
व कर्म आदि क्रिया का त्याग सो त्याग नहीं कहाता॥
वसिष्ठ-उवाच॥ हे राम! जब राजा वन को गया, भोग-विलास छोड़े थे!
राजपाट छोड़ा था सो त्याग सत्य नहीं था अज्ञान के कारण से सर्व त्याग कर वन में
जा कर कन्द मूल खाता था पर वासना सत्य मन में थी, तब वासना का त्याग न हुआ, कर्म
ज्ञान, जो चित्त घट--पटादि रूप हो कर ज्ञान का प्रकाश करता सो सत्य अज्ञान ज्ञान
हुआ, ज्ञान के न होने से सर्व त्याग का क्या फल? वासना के नाश हुए बिना त्याग
रूप भी जो त्याग कहाता सो वह स्वरूप स्थिति सिद्धि का कारण नहीं कहाता॥
हे राम! सर्व त्याग सो कहाता है॥
वासना अहङ्कार सहित चित्त जो अहङ्कार वासना से हीन हो कर साक्षी रूप
हो, सो सर्व-त्याग कहाता है। जब चित्त की सर्व वासना-रूपी क्रिया क्षय होगी
तब चित्त साक्षी भाव को प्राप्त होगा! फिर कैसा? आकाशवत् सर्वव्यापी रूप निर्विकल्प
शुद्ध सच्चिदानन्द रूप जो निष्प्रपञ्च अहङ्कार से रहित पद है सो, निश्चय आत्मा
स्वरूप है, चिन्मात्र है, परमानन्द सर्व का अधिष्ठान है, सो उस स्वरूप ज्ञान का स्वरूप
सत्य त्याग चित्त का वासना से हीन होना है। सो त्याग कैसा है? सब वासना
संकल्प रूपी सब जगत् को सर्व-प्रकार से त्याग करे, देह-इन्द्रिय के सर्व भोगों
को, संकल्प-विकल्पों को क्षय करके शुद्ध परमात्म पद में स्थित, शुद्ध ज्ञान रूप
मन का जो वासना रूपी त्याग सोई सर्व त्याग जान कर शुद्ध ज्ञानी कहाता सो
राजा को न हुआ॥
273

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चित्र का अक्षरशः (as-is) प्रतिलेखन:

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274

इसका फल यह होगा कि सदा काल के संसारी जीव भी मोक्ष पद को प्राप्त कर
सकते हैं।
फिर क्या जो जीव कभी मोक्ष नहीं जाता तथा सदा कर्म फल भोग भोगकर
दुख भुगतेगा।
इस बात पर विचार करने से सिद्ध हुआ कि संसार अनादि सांत नहीं हो
सकता व प्रत्यक्ष
ऐसा तो सब सज्जन मानते ही सांख्यकार ने कहा, कि संसार का जो
नाश पद सांख्य सिद्धान्त में कहा है वह सांख्य के मत अनुसार केवल प्रकृति का
पुरुष से वियोग होना ही मोक्ष होना है। इसी प्रकार से अन्य दर्शन भी
मानते हैं कि जीव जब मुक्ति में जाता है, संसार कहां? संसार से छूट ही
जाता है। इस प्रकार से सांख्य मत में जीवात्मा का नाश तो सिद्ध नहीं
होता केवल मोक्ष में जा के संसार के दुखों से छूट जाना कहा है। जैन
मत में भी कर्म का फल भोगकर मुक्त हो जाने से कर्मों का नाश कहा
है। कोई जीव ऐसा नहीं माना कि जो मोक्ष में न जावे सदा संसार में दुखों
को भुगतता ही रहे।
यदि कोई कहे कि जीव तो अनन्त हैं तो क्या वे सब मोक्ष में जा सकते हैं? हां जो
चाहे जा सकता है जो मोक्ष के यत्न न करे वह नहीं जा सकता। यदि मुक्ति में
सब जीव चले जावें तो संसार खाली हो जावे इस से कर्म व संसार कैसे अनादि सांत?
इस विषय में? कोई जैन क्या कहे? हम सब जैन भाईयों से पूछते हैं
कि? हे भव्य जीवो जो तुम सब को कहते हो कि कोई जीव ऐसा संसार
में नहीं रहेगा जो कर्म भोग से कभी न कभी न छूटे, संसार का सब जीव
उद्धार कर लेंगे।
यदि सब कर्म भोगकर, संसार खाली हो गया तो क्या
जैन मत में मोक्ष न, रहा वा मोक्ष की खाली रहा, कर्म फल वा
ईश्वर का कर्म, फल का फल भी सदा नहीं रहा।
अतः सिद्ध हुआ कि जो बात मुक्ति संसार विषय में जैन मत की
है विरुद्ध सिद्ध हुई। अस्तु! हम तो यह, ही कहेंगे
कि! संसार अनादि व मोक्ष अनन्त है। इस से सिद्ध हुआ कि संसार कभी
खाली नहीं होगा। इस विषय में संशय न कीजिये।
यद्यपि वे सब बात सत्य नहीं हैं, "सत्यम् ज्ञानम्,
अनन्तं ब्रह्म, आनन्दं ब्रह्म, सनातनं ब्रह्म, अच्युतं ब्रह्म,
विश्वातीतम्, विश्वं व्याप्य तिष्ठति, व्यापक सच्चिदानन्दं, निराकारं ब्रह्म,
ज्योति स्वरूपं ब्रह्म, सर्वज्ञं ब्रह्म, सर्वेशं ब्रह्म, सर्वान्तरयामि, विश्वस्य,
कर्ता, धर्ता, हर्ता, सर्वस्य प्राणिनां, सर्वस्य सुखप्रदम्, सर्वस्य
शरणम् वा अवलम्बनं च, सर्वेषां च पावनं, सर्वेषां च स्वामी, सर्वेषां च पतिः,
सर्वेषां च सखा, सर्वेषां सुहृद्, सर्वेषां बन्धुः, सर्वेषां रक्षकः, सर्वेषां
पालकः, सर्वेषां न्यायप्रदम्, निष्कामम्, सर्वव्यापकम्, सर्वव्यापिनम्,
अजम्; मोक्ष प्रदम्, मोक्ष का दाता, मोक्ष का स्वामी।"
इन विशेषणों-युक्त ईश्वर को, जैन लोग किस रीति से कह
सकते हैं। इस विषय को हम संक्षेप में इस स्थान पर वर्णन कर
देते हैं कि इन में से एक बात भी जैन मत में सत्य नहीं मानी
जाती। क्या वे ऐसा कह सकते हैं? क्या जैनियों! तुम ऐसा कह सकोगे,
कि? हम ऐसा मानते हैं, कदापि नहीं!
अब विचार कीजिये कि, इन विशेषणों से, ईश्वर सम्बन्धी जैन
मत में ईश्वर का होना व उसका प्रभाव कुछ भी सिद्ध नहीं होता।
जब वे ईश्वर का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते तो ईश्वर के
गुण, कर्म स्वभाव का मानना कैसा? जो जैन
मत के, विचार से ईश्वर का होना सिद्ध नहीं
होता तो जैन मत में, ईश्वर का होना प्रत्यक्ष नहीं माना,
ईश्वर के गुण वा प्रभाव का होना प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकता।
वे ईश्वर को स्वीकार ही नहीं करते तो वे, इस बात का
यत्न क्यों करते हैं कि जैन धर्म में, ईश्वर का
होना माना गया है।
275

इस प्रकार स्पष्ट, सुदृढ़ अनुमान का बल पा कर वे मान गये जान पड़े किन्तु
वास्तव में वास्तव तक पहुँच सकने योग्य विवेक का उनमें लेश भी न था। इसलिए कुछ
दिनों उपरान्त ही, वेदान्ती की समालोचना पर अपनी सम्मति प्रकट करने के लिए जो पत्र
उन्होंने स्वामी जी के पास भेजा उससे पता लगा उनके पुराने विचार फिर उलटे ही रूप में
सामने आये।
पहले जो युक्तिपूर्वक उत्तर दे दिये गये थे उन सबको बिना समझे-बूझे उन्होंने फिर
लिखा कि ईसाई लोग वेदान्तियों की तरह यह तो स्वीकार ही नहीं करते कि, वह स्वयं
ही अपने रचे हुए समस्त संसार का कर्त्ता भी है और उपादान भी--
सदा सर्व काल साक्षी स्वयं रूप परमेश्वर
हेरान्द महाराज! यह वेदान्तियों सिद्धान्त केवल, यह कह करके छोड़
दिलायाजायगा कि मत करो भाई! क्योंकि वेदान्ती सिद्धान्त का कोई यह अर्थ नहीं करता कि जो
वेदान्तीहैं सोईईश्वरहैं। वेदान्तीका यह कथनहै कियहजो प्रतीतहोताहै सोईवहहै सोईवेदान्तीहैं
यह तो किसी रीति से भी घट नहीं सक्ता कियथा समुद्र की तरंगें हैं, सोई समुद्र नहीं
कहातीहैं किन्तु समुद्र ही तरंगें हैं॥
एक बात और भी है पादरी साहब की ओर से जिसका उत्तर आना बाकी रहा था कि
जो कार्य-कारण है, उसका ज्ञान केवल कार्यकारण सम्बन्धित, दशा ही तक हो सक्ता,
अन्य दशाओं तक तो नहीं रहा सो उस कार्य-कारण के ज्ञान द्वारा सब प्रकार का ज्ञान प्राप्त
हो जाय, यह बात ठीक प्रतीत नहीं होती। इस तरह अज्ञान-मूलक भ्रम में पड़े वेदान्ती ईश्वर
जैसी परम शक्ति को ही जगद्रूप में, स्वयं मिथ्या माया रूपी जाल रचने वाला कह कर
उसे अज्ञानी ठहराते हैं। जिस पर स्वामी जी का ज्ञान प्रकाश ऐसा हुआ जिसने ईसाई
को हक्का-बक्का कर दिया। उन्होंने कहा, जिसे तुम अज्ञान कहते हो, वह ज्ञान स्वरूप
का पूर्ण भान होना ही परमात्मा का लक्षण है। वह अपने भक्तों को इस जाल से पार लगा
देता है, सो भी परमात्मा स्वरूप सच्चिदानन्द परमात्मा के ज्ञान रूप का ही अंग है, तो
इसमें जो अज्ञानता मानी, क्या वह तुम्हारा अज्ञान ही नहीं कहा जायगा?
पादरीजी तर्क द्वारा तो जो कुछ उत्तर स्वामीजी द्वारा दिया गया उसे काट न
सके! इसलिए शास्त्र के पक्ष लेकर वे तर्क द्वारा समाधान करने लगे सो भी उल्टा ही
कर बैठे। वे कहने लगे कि ईसा, मूसा सब एक बात पर तो सहमत हैं कि परमेश्वर
एक जीव, जगत निर्माता जीवों का पिता तथा जगत् पालन कर्ता व संहारक, स्वामी
सर्वशक्ति सम्पन्न पर दया सिन्धु
ईसाई मत का यह मुख्य लक्षण पा कर स्वामी जी को पुनः स्पष्ट करना ही पड़ा।
क्योंकि वह, इस विषय मत पर कुछ वादविवाद नहीं करना चाहते थे। जब तक ईसाई
मत वाले अपने को सत्य समझ कर ईश्वर को इस संसारिक माया से परे मान कर
भिन्न रूप दें।
वेदान्तियों पर जो आक्षेप पादरी हेरान्द ने लगाये गये थे उनका एक रूप उपहास
मात्र सिद्ध हुआ। वेदान्तियों के जिस मत को पादरी हेरान्द भ्रम कह रहे थे वह स्वयं! ही
ईसाइयत सिद्ध कर रही थी। और इस तरह तर्क के आधार पर पादरी को मुंह की खानी-
पड़ी। वेदान्त को अज्ञान का साधन कहने वाला ईसाई मत जब स्वयं ही इस जाल में उलझ
गया तो? ईसाइयत का जो लक्षण पादरी ने बताया वह सब निराधार ही था, क्योंकि
वह सब अपने मनका फेर ही? ईसाई मत तो स्वयं ही विरोधाभास से भरा पड़ा है, वह
दूसरे मतों को क्या निर्देश देगा। जिसका अपना ज्ञान शून्य है उसका क्या कहें।
इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जब जब स्वामी जी द्वारा किसी भी
वेदान्ती व्याख्या का खण्डन चाहा गया तो! पादरी हेरान्द की तरह ईसाई विद्वान,
जिन्होंने मत का ज्ञान केवल, अपनी दृष्टि तक सीमित रखा, किसी भी सत्य विचार शास्त्र
को ठीक! से प्रतिपादित न कर सके। उनकी संकीर्णता के आगे वे परास्त होकर
वेदान्त को विकृत रूप देने का जो प्रयास करते उसका स्वामीजी ने मुंह तोड़ उत्तर
दिया और इस प्रकार सत्य का ज्ञान देकर अज्ञान के अन्धकार को दूर करने में सहायता
की व अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से न केवल भारत अपितु विश्व के कोने कोने तक ज्ञान
फैला कर, सब को प्रेरित कर, इस बात का ज्ञान करा दिया कि सनातन वेदान्त ज्ञान
धरोहर, सम्पूर्ण का कल्याण ही इसका उद्देश्य रहा समस्त विश्व इसके लिए एक ही
परिवार प्रतीत हो सकता है। जिसका न आदि है न अन्त उस ज्ञान को कोई कैसे नष्ट कर
सके? जिस प्रकार! सूर्य का तेज सब ओर ज्ञान देता, सूर्य का प्रकाश सब दिशाओं
फैला कर अज्ञान को मिटाता है? सो ही काम सनातन वेदान्त ज्ञान करता है। यह सब
विवादों से परे हट कर विश्व को ज्ञानोपदेश देता है। यह सब ज्ञान केवल वेदान्तियों
का ही मत नहीं हो सकता, यह सब मानव व जीवमात्र
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