एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह स्वाध्याय केवल धर्म का ही या अध्यात्म का रस या स्वाद ही नहीं है।
स्वाध्याय मन का रस लेकर उसके द्वारा रस प्राप्त कर आत्मा तक पहुँचने
का प्रथम सोपान हो जाता अथवा बनता है, अथवा स्वाध्याय आत्मा का रस ही
या अध्यात्म का, आत्मा स्वयं ही रस स्वरूप तो स्वयं आत्मा आनन्दस्वरूप ही
होता
पर मनको स्थिर कर लें तो ही यह रस, आस्वादन होगा, अन्यथा
स्वाध्याय द्वारा स्वाध्याय का रस प्राप्त होना भी एक बहुत बड़ी साधना ही हो
जाती या फिर व्यर्थ मन का ही व्यापार बनता होगा? मन तो स्थिर रहा कभी-कभी
होगा, पर मन का भी स्वभाव है कि वह व्यर्थ स्वाध्याय करता रहे केवल रस लेने
के ही खातिर व्यर्थ, या स्वाध्याय का प्रभाव भी तो आत्मा तक ही रस रूप बन कर
पहुँचता रहता है?
इसका क्या उत्तर होगा? मन तो या स्वाध्याय द्वारा भी, या मन को रस तो
मिल रहा, रस स्वाध्याय द्वारा प्राप्त मन कर रहा, तो मन तो तृप्त हो चुका था
रस प्राप्त कर, या मन तृप्त न हो सका, तृप्त होता फिर स्वाध्याय
क्यों करता रहा! या फिर मन तो सब कुछ कर चुका था या केवल एक ही
रस स्वाध्याय द्वारा प्राप्त कर लेना-देना चाहता था या उसका स्वभाव
अथवा मन तृप्त न ही हो सका था यह रस प्राप्त कर लेने मात्र से,
केवल रस, स्वाद मात्र स्वाध्याय द्वारा प्राप्त तो कर लिया था तृप्त होने
तक रस, स्वाद ले चुका था; मन तृप्त नहीं हुआ, तृप्त तो मन होना
था; मन तो तृप्त नहीं हुआ? मन तो तृप्त हुआ ही? मन तृप्त हुआ ही न? तृप्त
तो आत्मा ही मन द्वारा रस प्राप्त कर तृप्त हो सका था, या तृप्त
ही स्वाध्याय द्वारा या आत्मा तक पहुँच कर ही रस प्राप्त होना था।
आत्मा-स्वभाव ही रस रूप या आत्मा आनन्द रूप तो होता ही, जब कभी मन
आत्मा से तृप्त न हो पा रहा, कभी-कभी व्यर्थ स्वाध्याय करता रहा, तो वह
तृप्त रस आत्मा से स्वाध्याय से था, तृप्त स्वाद से, तृप्त मन रस-तृप्ति मात्र
तक तृप्त रहा, मन तृप्त-आत्मा? तृप्त तो आत्मा द्वारा तृप्त स्वाध्याय
स्वाध्याय से हुआ था? मन तो स्वाध्याय का रस ले रहा था तृप्त तो, रस
तृप्त तो आत्मा से था, तृप्त स्वाद मात्र से मन था? मन तृप्त हुआ या नहीं
तृप्त तो या आत्मा रस-रूप से आत्मा
मन को स्वाध्याय के द्वारा रस तृप्त तो कर ही दिया था स्वाध्याय न रस का
रस रूप स्वाध्याय तो या तृप्त तो हो चुका होगा आत्मा द्वारा या स्वाध्याय का
तृप्त स्वरूप या तृप्त करने का आधार स्वाध्याय ही रहा होगा या आत्मा रस रूप
द्वारा ही स्वाध्याय से ही रस तृप्त हो रहा
तृप्त तो आत्मा, तृप्त तो रस से तृप्त हो गया, स्वाध्याय द्वारा प्राप्त
आत्मा तृप्त हो गया, या तृप्त तो आत्मा ही था केवल स्वाध्याय का रस आत्मा
पाया था? रस स्वाध्याय द्वारा ही तो आत्मा को रस के द्वारा तृप्त हुआ,
तृप्त होना ही आत्मा रस का स्वाध्याय बना, तृप्त मन तृप्त रस से मन रस का
रस था, तृप्त मन रस मात्र तक तृप्त रहा, तृप्त तो आत्मा रस तृप्त मन रस
द्वारा बना, तृप्त मन तृप्त रस स्वाध्याय द्वारा स्वाध्याय स्वाध्याय आत्मा का
ही रूप बन तृप्त रस मन तक पहुँचा
तृप्त आत्मा था, तृप्त आत्मा द्वारा मन को स्वाध्याय प्राप्त हो या
तृप्त आत्मा ही स्वरूप रहा
जो तृप्त होता तो मन आत्मा तक तो रस तृप्त स्वरूप मन स्वाध्याय का
स्वाध्याय बन तृप्त होता ही रस से? मन तृप्त आत्मा का स्वाद ले रहा था, आत्मा
तृप्त रस आत्मा ही तृप्त हो रहा था? मन तो तृप्त रस के रस मात्र तृप्त था!
तृप्त स्वाध्याय स्वाध्याय बना, तृप्त तो रस तृप्त था, तृप्त रस तो तृप्त आत्मा ही
रस का रस रहा था? या आत्मा का तृप्त होना स्वरूप था? या जो स्वाध्याय द्वारा
तृप्त रस स्वाध्याय का, तृप्त तो स्वाध्याय रस स्वाध्याय ही तृप्त रस द्वारा
तृप्त बना? तृप्त तो रस तृप्त रहा तृप्त हो कर तृप्त रहा तृप्त रस तृप्त तृप्त
तृप्त ही तृप्त का तृप्त रूप या तृप्त रस तृप्त ही तृप्त हो रस स्वाध्याय का
स्वाध्याय
रस तृप्त रहा, स्वाध्याय द्वारा तृप्त? तृप्त तो तृप्त आत्मा, तृप्त तृप्त
रहा? स्वाध्याय का तृप्त तो मन ही रहा तृप्त आत्मा द्वारा तृप्त रस तृप्त,
263