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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 322 में से

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इस प्रकार हम विचार कर सकते, अथवा कह सकते कि मनुष्य जन्म का क्या अर्थ? उस मनुष्य का जीवन
भी तो व्यर्थ कहलाने योग्य रहा जिसे मनुष्य जन्म तो प्राप्त हुआपरन्तु वह मनुष्य बन न सका
अथवा यों कहो, हे देव, यदि ऐसा मानव मुझे या अन्य किसी विवेक को जन्म देने योग्य हो तब
भी ठीक!
सो यह विचार निसंकोच प्रकट हो रहा था, जिससे उनके मानसिक द्वन्द्वका
समाधान मिलना सम्भव हो सके। सो जब विवेक जागृत हुआ तब देश-विदेश की समस्या
सामने रख उसने उस माता-पिता तथा उन सभी अन्य लोगों से वार्तालाप न आरम्भित की, व
साधारण रूप से समाधान कर दिया कि भारत को इस काल-रूपी संकट तथा इस भारी
दुःख बाधा संकट रूप उस भव रूपी कूप से अन्य संशय-कलुषित व्यक्ति नही निकाल
सकते उस को, जिनका मन, हृदय कलुषित रहा
पर जो लोग देश के सब नर और नार को एक मान कर चल रहे, उनकी अहिंसा,
उनका संगठन, सत्यप्रिय व्यवहार, यह... ही ऐसा शस्त्र तथा अस्त्र सिद्ध होगा जो
संसार रूपी इन दोनों शक्तिशाली विरोधी शक्तियोंके सामने टिक सकेगा, जब हम
संसारके किसी भी दल का आश्रय स्वीकारेंगे तो अन्य शक्तिशाली दल से भयभीत
होते ही, हम उस संकट से छुटकारा पानेके लिये कुछ समय पहले फिर भी भय पाते रहेंगे
यदि हम एक अन्य महान् शक्ति का रूप स्वतः अपने भीतर पैदा कर लेते जिसे सत्य कहा
सकता रहा हो, समय आ पड़े तो, हम तो सब मिल कर एक संगठित शक्ति बन जांय, और
संसारके किसी अन्य दल का भय भी न रहे
इस विचार धारा को सुन कर, जो लोग पहले ही अशिष्ट थे, उन सब जन समूह
तथा अन्य जन ने जब विवेक-बुद्धिके इस विचार का विचार कर लिया तथा समझ भी
गये तब उनका हृदय यह समझ कर कि भारत, जो पराधीन हुआ बैठा था उसने
तथा अन्य सब लोगोंने मिलकर यह तय किया स्वाधीनता तो जो मिले वही उचित
रहेगीऔर सब जनसमूह ने उस बात को स्वीकारना आरम्भ कर
विवेकने जब यह बात समझी कि स्वाधीनता पाने का यही पथ, सत्यनिष्ठा
सदाचार ही सब सम्भव करने वाला बन रहा, इससे उनके साथी अलबेला आदि
सब विस्मित हो विवेक अलबेलाके ही विचार को मानने लगे, इससे उनकी जो पहली
धारणा थी विरोधी से सहयोग न साधनेके लिये कष्ट, संकट तो उठाने पड़ेंगे पर उस
मार्गको नहीं छोड़ना
विवेक के प्रति माता प्रेम, अलबेला का प्रेम अपने प्रति सम्मुख, उस बात ने विवेक
आत्माको विचलित नहीं किया कि भारत को संकट तथा कठिनाइयोंसे छुड़ाना होगा, इसके
सम्बन्ध में विवेक का मन सब ओर भ्रमण किया, जिससे विवेक का संकट दूर होने लगा
साथ ही समाज सुधार आरम्भ
वह तो जानता रहा ही था कि भारत-मर्यादा प्राचीन विचार पर ही स्थित-
रहित होकर भारत आज जिस रूपमें खड़ा था, उसकी रक्षा करना एक व्यक्ति
का कार्य अथवा किसी एक दल विशेष द्वारा नहीं माना जा सकता रहा होगा, बल्कि
सब मिल करही ऐसा कर सकते थेऔर, जब आत्मिक दुर्बलता सम्पूर्ण देशमें
व्यापकतर दिखाई दे, सामाजिक संगठन केवल विचार तक ही सीमित हो कर बिखर-
सागया दिखाई पड़ने लगातथा देश के दो सम्प्रदायों के बीच, जो कि अपने समाजके
अन्य अन्य अंगों जैसे माने जाते रहे थे उनके बीच ऐसा भेद खड़ा हो चुका
था, जिससे समाज विच्छिन्न
होने लगातथा स्वाधीनता का लक्ष्य पीछे पड़ जाने लगा तथा धर्म के नामपर
अनेक घिनौने काण्ड देश के भिन्न भागों में प्रकट हो रहेथे, जिससे ऐसा नर,
जिसके दो विचार थे, जो सदा सर्वदा धर्मके नाम पर लड़ते रहे, वह अपने स्वार्थ
साधने के लिये विदेशी-ताकत कासहारा लेते, इससे यह, सिद्ध था, कि भारत दोनों
ओर से पिस रहाथाऔर इस बात से भी भय, कि कल सम्भव था विदेशी तो
भारत को छोड़ ही जाये, पर भारतीय ही आपस में कट-मरें, जो दशा आज के युग
में देश की दिखाई दे, उस संकटसे देश को मुक्त करने-करानेके लिये ही, भारत
संस्कृति सब धर्मों का आदर करती रही है, तो सब धर्म एकसाथ मिल परस्पर
सहानुभूति पूर्वक काम करते
तो आज भारत का मुख और उसकी अपनी संस्कृति विश्व भरमें अपनी विशेष प्रतिष्ठा
प्राप्त किये ही थीऔर उस का कारण विवेक का यह विचार ही था जिसने अलबेलाको ही
प्रभावित नहीं किया बल्कि भारत के दो दल विशेष जो परस्पर लड़ते रहने को तैयार रहते
आयेथे उन सब को विवेक समाज की यह सीख मिली, कि आपस में लड़कर सदा
व्यर्थ, पर विचार व एक होकर अपने देश को उस संकट से सदा सुरक्षित रखिये
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