एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाज का रूप था, भारत वर्ष का उस समय का राजनैतिक ढांचा इस प्रकार बना हुआ
का होगा । इसीलिए तो उस समय न्याय धर्म का विचार न करके ।
इसलिए विश्वामित्रजी ने उस समय जो कुछ भी कहा था सम्भवतः वे उचित ही
कह रहे होंगे, यद्यपि उस बात का वशिष्ठ जी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके उपरान्त
भी वशिष्ठ और उनके शिष्यों द्वारा विश्वामित्र द्वारा दी गाली-गलौज सहन करते रहे।
पर विश्वामित्र ने उन सब बातों को चुप चाप क्यों पी लिया ? पहले तो! ही
क्रोधवश कह गये होंगे किन्तु बाद में मन ही मन यह सोचकर पश्चाताप करने लगे
होंगे कि हाय! मैंने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से कह, कह डाला जो मुझे नहीं कहना था और
आज तक न कभी ऐसा कहा! अथवा मन ही सोच रहे होंगे
विचार तो रहे ही, इसके दो चार दिन बाद उन्होंने उस बात को भूल कर सोच
लिया होगा कि अरे जब वे अपनी प्रतिज्ञा अनुसार कल तक आ कर राम को लौटाएंगे ही?
तब उनसे स्वयं ही बात निपटा लेंगे या वशिष्ठ और विश्वामित्र का विवाद तो राम वापस आने पर
दोनों महामुनियों द्वारा सुलझा लिया
जाएगा ऐसी बात थी, लेकिन, माता--कौशल्या को, अपने वात्सल्य का स्नेह--
वियोग का, कारण वे सब यह भूल गईं।
कुछ दिन बाद ही तो, भगवान श्री राम उनके समक्ष आ जाते और राम का अभिषेक
उत्सव भी उनके समक्ष था? किन्तु जो होनी, सो होकर इसीलिए रहकर माता कौशल्या
विश्वामित्रजी ऊपर, या वशिष्ठ भगवान दोनों
"समान ही विश्वासी समझ कर कह उठीं थीं कि कौशल्या का यह कथन, सच,
इसलिए किसी सन्देह अथवा द्वेष पर टिका हुआ नहीं बल्कि केवल राम के प्रति प्रेम । उनका
ऐसा कथन था, जिसमें न तो वशिष्ठ और विश्वामित्र परस्पर दोषी थे, और न राम का कोई
दोष था"
इसमें उस समय का भारत कैसा समाज रहा होगा उस कालीन।
मानव जाति अपने आचार विचार धर्म और कर्म का सम्प्रदाय
किस प्रकार का सम्प्रदाय अपना रखा रहा होगा या प्रत्येक
व्यक्ति को अपने घर बार सब कुछ त्याग कर जंगल में तपस्या करने का कोई
भय अथवा डर अथवा कोई ऐसा नियम आदि था, जो आज लोग घर, बार छोड़ कर भाग जाते
हैं।
इसका कारण केवल यह कहा जा, सकता धर्म शास्त्र को पढ़ कर मन को बहलाना,
समय पास कर लेना कोई बात नहीं प्रत्येक व्यक्ति को तो उस समय तपस्वी सम्प्रदाय का प्रचार
ही सब कुछ सम्प्रदाय
समझकर प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्त्तव्य रूप कर्म को छोड़ कर तपस्या रूप को ही अपनाना
ही तो, धर्म रहा हो, भला ऐसा तो नहीं होगा कि प्रत्येक व्यक्ति ही काम धंधा न कर तपस्या-
ही करना शुरू कर दिया तो भारत का सारा समाज भूख और प्यास द्वारा नष्ट भ्रष्ट हो गया
होता; ऐसा तो नहीं देखा गया होगा ! हाँ यह हो सकता, जरूर हो, केवल साधु? सन्यासी ही
तप करना योग्य समझे ! भारत का सारा समाज काम में लगा हुआ था केवल रूप ही तप
विश्वामित्र
विश्वामित्रजी तपस्वी थे सही, लेकिन वे भी तो? क्षत्रिय धर्म को? धारण करते ही
तपस्या का नियम रहा? विश्वामित्र को सताया राम और लक्ष्मण? विश्वामित्र द्वारा केवल
आज्ञा दी गयी थी? या स्वयं विश्वामित्र उस समय राम को साथ लेकर न भी जाते तब
भी, राम सब को! राक्षसों को नष्ट तो कर ही देते किन्तु वे केवल उस समय यह सोच रहे
होंगे कि आज का काम कल, विश्वामित्र जी को साथ में लेकर कर दिया जाएगा
ही, इसका फल न तो राम भुगत रहे थे और न विश्वामित्र
विश्वामित्र जी को तो फल भोगना पड़ रहा था! विश्वामित्र केवल क्षत्रिय थे!
वे केवल विश्वामित्र ही नहीं बल्कि वे राज-ऋषि के रूप में विश्वामित्र ? राजा कौशिक?
राजा कौशिक विश्वामित्र केवल राजा ही! के विश्वामित्र केवल राज ऋषि विश्वामित्र
केवल राजा थे! विश्वामित्र केवल ब्राह्मण नहीं थे वे क्षत्रिय समाज विश्वामित्र
राम लक्ष्मण के विश्वामित्र राम गुरू थे! राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना और रक्षा
की थी; विश्वामित्र का कर्तव्य तो था केवल राम को साथ ले जाना ही, विश्वामित्र केवल एक
ही काम कर सकते थे कि राम को ले कर वे केवल यह
केवल इतना कहते कि, विश्वामित्र विश्वामित्र को केवल था, भला वे उस समय सभी
काम को सब कुछ छोड़ कर केवल विश्वामित्र के साथ ही क्यों चले जाते इसीलिए तो
स्वयं राजा दशरथ जी विश्वामित्र पर भारी क्रोध किया । इससे केवल यही सिद्ध होगा,
दशरथ जी विश्वामित्र और वशिष्ठ दोनों एक ही रूप में एक ही समान भक्त विश्वासी
81