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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 322 में से

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दयासिन्धो सब जग के स्वामी हमारा उद्धार करो हम अनाथ हैं। इन अत्याचारियों हमारा सर्वस्व छीन लिया हमारे
सब बन्धुओं को मार डाला सो केवल प्राण ही बाकी रह गये।
प्रभो, संशय होता था कि जब आपके परम भक्त प्रह्लाद केवल हरि ॐ की रट लगा रहे
नृसिंह अवतार कर बचाया, तो हे दयानिधे क्या हम पापी हैं? जो हम पर दया नहीं करते नहीं नहीं
आप तो सब दशा जान रहे सर्वात्मा, तो फिर हे कृपानिधे यह कैसा! क्या परीक्षा है? दयानिधे
हमारी रक्षा; आपके ही नाम का गुण गान करने वाले-हम भी लोग हैं, कृपा सिन्धु
अपनी दया दृष्टि हमारे ऊपर कीजिये पश्चात्-प्रभो जो न दशा की सो सब जग को विदित
हमारी पश्चात्-रक्षा जो नृसिंह से रूप धरके की सोई अवतार फिर कीजिये
हमारी रक्षा कीजिये क्योंकि दुष्टों ने सब प्रकार से हम लोगों को तंग कर रक्खा है
इन सब बातों को दयासिन्धु भगवान् तो सब कुछ जान ही रहे थे। परन्तु अवसर देखकर सहायता करेंगे,
पश्चात् जो यह सब लोग अपने कष्ट निवारणार्थ रोते थे सो सब बन्द किया गया, और स्वामी
लोग उन सबको डांट डपटकर चुप करा दिया! पश्चात् सब लोग अपने काम को चले गये!
सब लोग घर गये तो--दुःख से रो रो कर घर वाले कहने लगे, जहां कहीं
भी सब लोग अपने बन्धुओं को रो रहे थे कि उस समय में किसी प्रकार धीरज नहीं था, केवल
रो रो कर अपनी अवस्था को सुधारते हुए विचार करते थे। ऐसा विचार कि हम लोग अपने
स्वामी लोग से जान से बचते हैं पश्चात् न तो कोई, किसी बात करके बचता ही नहीं तब ऐसा
प्रकार का सोच कर सब लोग अपने घर गये, और अपने अपने काम सब लोग करते
पश्चात् जब सब लोग एकत्र हुए तब सब भाई पश्चात् सब लोग अपनी अपनी दशा पर रो रहे
थे। ऐसा विचार करने लगे कि किसी प्रकार तो विपत्ति चली जावे
हमारी अवस्था को देख कर दया सिन्धु प्रभु दयालु कभी, हमारी सुधिया
कभी लेंगे, पश्चात् सब लोग अपने विचार में रोते थे।
हे; विधि क्या हमारी दशा यही सदा बनी रहेगी वा कभी विपत्ति से छूटा जायगा और कोई
सुख भी हम लोग को होगा? पश्चात् रो कर प्रभु परमात्मा सब को देखते हुए दयासिन्धु जी,
फिर अपने मन में विचार कर कहने लगे कि इन सब लोगों को धीरज देना चाहिये पश्चात्
फिर, प्रभु जी अपने रूपको छिपाकर पश्चात् जो रूप धर कर गये उसका सारांश
नीचे लिखा जाता
ऐसा कह कर, "दीनबन्धु जो पर बस पर उपकार सो सांचा पर सब जगत् संशय
भयो"
सब बात दयासिन्धु भगवान् अपने मन
में विचार कर पश्चात् अपने भक्त प्रह्लाद की दशा स्मरण करके
पश्चात् विचार कर प्रह्लाद भक्त पर प्रभु का उद्धार
पश्चात् राम-अवतार के समय में सब प्रकार से जो जो दुष्टाचारी
निशाचरों का काम था उन-सब बातोँ को स्मरण किया! पश्चात् हे प्रभु दयाल सब रूप
अपने मन में विचार कर पश्चात् सब दशा विचारते हुए मन में सोचा कि संसार में सब,
दुष्टाचारी राक्षस भगवान् के नाम को केवल पाषाण में रख के पत्थर को पूज रहे
और उसी पत्थर रूप पाषाण को सब संसार मान रहा है; फिर दयानिधे
विचारते? जब संसार सब को ऐसा विचार में देखता तो फिर यह कष्ट भी सहन
करो, परन्तु प्रह्लाद अवतार स्मरण कर पश्चात् जो अवतार का विचार सब जगत् पर दया
किया सोई-विचार प्रभु जी सब अपने मन में पश्चात् सब संसार पर विचार किया
केवल सब दशा सुधार होगा? यह विचार कर सब संसार पर दया, की कि
सब लोग विचार करें; सो भी सब दुष्टाचारी पश्चात् सब मनुष्य, सब पर दया
अपनी-अपनी दशा को देख कर पश्चात् सब लोग विलाप क्यों? सो पश्चात्
साधु-सन्त जन-गण सब, एकत्र हो कर सब लोग हे दयाल जी, हे प्रभुजी जगपति
प्रभु, हे त्रिलोकीनाथ दयालु जी, दयालु रहो, दयालुता पूर्वक रहो, सहाय हो
प्रभु? ऐसी विनती सब लोग प्रभु चरण पर सब प्रकार सब से विनती हो रही
थी
"दीनबन्धु जो पर बस पर उपकार सो सांचा पर सब जगत् संशय भयो"
इस बात स्मरण कर के भक्त प्रह्लाद कहने लगे, जो दुष्टाचारी पाषाण को ईश्वर मान
कर पाषाण पूजा करते हैं सो सब पाषाण केवल संसार को धोखा दे रहे हैं, सो
केवल धोखा देकर पश्चात् सब लोग अपने काम को निकाल रहे पाषाण को प्रभु
समझ कर केवल संसार में धोखा फैला रहे हैं, सो केवल सब काम धोखा ही
है, केवल यह सब धोखे की बात बना कर केवल संसार को धोखा दे रहे हैं
सो, केवल यह धोखा सदा-सदा सब लोगों को रहेगा इस वास्ते सब पाषाण पूजा
करने वाले इन सब पाषाणों मिथ्या हैं।
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