एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपद्रव करें; उनका जो शिष्य, उनका जो; और न ही उस वक्त किसी का अविश्वास, किसी
का तो विश्वास कीजिए
तो वो साधक के आन्तरिक अभ्यास का प्रभाव या सिद्धि चमत्कारिक रूप से
दिखाई दे, जब तक इसका प्रभाव इस तरह का रहता रहता तब तक लोग यह समझ
लेते हैं ऐसा हुआ या नहीं, या यह एक कल्पित या भ्रम भरी बात, इसलिए उस
व्यक्ति को तब तक इन सब बातों का प्रभाव निष्प्रभावी या शान्त नहीं कर पाता जब--
तक कुण्डलिनी के चक्र, या सूक्ष्म रूप प्राण--का आकर्षण दुर्बल नहीं हो जाता। इसके
बाद तो जो भी साधक किसी वस्तु या पदार्थ रूप शक्ति द्वारा लाभ प्राप्त करता है, या
शक्ति का रूप या तो नष्ट हुआ या शान्त हो जाता। इन सब बातों के लिए साधक
रूप को इन सब बातों से बच कर या उनसे दूर ही रहने की चेष्टा निरन्तर रूप किया
जाना पड़ा
इसके लिए एक, केवल ही एक रूप का मन होना मात्र आवश्यक नहीं
कि यह केवल जप करे, या यह केवल ध्यान का करे, मन सब कुछ करने के न करने के
ही न मन का, या मन सब अभ्यास रूप हो, तब केवल जो, सब कुछ हो!
इससे केवल ज्ञान स्वाभाविक रूप प्राप्त हो सकता
"केवल मन ही चंचल नहीं है, इसके साथ ही साथ प्राण भी चंचल रूप
रहा, इस कारण विचार भी निरन्तर ही चलते रहते हैं और विचार जितने अधिक चलेंगे
मन उतना भटकेगा"
जो साधक अपने मन प्राणायामादि द्वारा प्राणों शक्ति एकाग्र करने लग--जाता
या जिनका प्राणायाम से प्राणों का योग हो ही जाता या मन शक्ति को प्राण शक्ति सब
ओर सब ओर स्थिर कर लेता वह विजयी; चित्त को जो वश करने लग जाता तो
विजयी; या मन, या प्राण, या इन्द्रियां आदि सब स्थिर कर लेता योगी ही
कहा जाता या जो स्थिर या वश में ही स्थिर न हो, तब तो सारा सब कुछ
स्थिर हो ही जाता । अतः प्राण व मन, इन सब शक्ति
कभी मन का निरोध कर लिया, तब तो प्राण रुकता ही, या फिर प्राण को
स्थिर करने पर मन स्थिर स्वतः होता, प्राण सब कुछ कार्य करने का ही तो
व्यापार या रूप है, शरीर में इन सब का प्रभाव ही तो मन के रूप को ही स्थिर
कर ले तब एकाग्रता या हो, या प्राण को वश करने सब एकाग्र चित्त हो कर प्राण
शांत रहा
चित्त के दो रूप रहे, संस्कार रूप मन में वासना का बना रूप,
संस्कार रूप यह वासना मात्र प्राण रूप को सब तरह नष्ट न करता तो
इन सब को खत्म करने से ही मन सब ओर से हट कर वासना से शून्य होकर
स्थिर रूप या स्वरूप में ही विलीन हो जाता या तो फिर प्राण शक्ति समाहित
अवस्था प्राप्त हो, तब यह सब तो स्वतः ही ही हो ही जाता ही रहता था!
वासना के नाश से; संस्कार नष्टता समाप्त हो, चित्त शांत रूप वासना का
प्रभाव खत्म रहा
चित्त को इस प्रकार वश में ही या तो योग, या ज्ञान, सब कुछ
के दो; ज्ञान रूप को तब तक मन स्थिर करता जब तक प्राण रूप सब ओर
तरह से ही तो सब ओर से ही शांत होता, तो मन तो शांत हुआ
केवल ही अभ्यास रूप क्रिया ही सब कुछ है; ज्ञान होना अलग है; केवल
ज्ञान का यह अर्थ नहीं कि केवल ज्ञान को जानना या सीखना मात्र ही सब कुछ
होना रहा, तो अभ्यास द्वारा ही ज्ञान लाभ सम्भव हो पाता है, इसके
विपरीत तो कुछ नहीं कहा गया; न ऐसा हो सका, केवल ही; या ऐसा ही
ज्ञान हो, केवल ही हो; या सब प्रकार से ज्ञान क्रिया एकाग्र अभ्यास सब
सम्भव रूप में किया जाता है, इसलिए अभ्यास
"केवल मन ही चंचल, अभ्यास से एकाग्र किया जाना सम्भव तो हो जाता
पर मन के साथ प्राण शक्ति को भी एकाग्र किये बिना एकाग्रता के ही सब ओर
भटकने का डर बना ही रहता इस कारण प्राण एकाग्रता से ही सम्भव, एकाग्रता ही
सब कुछ स्थिर कर प्राण शक्ति रूप योग को चित्त से ही एकाग्र कर साधक
ज्ञान का यह रूप पा कर ही वश करने लगता"
सब कुछ एकाग्र रूप में, अभ्यास से; क्रिया रूप से ज्ञान सम्भव है;
क्रिया ज्ञान से भिन्न सब एकाग्र ही होता है; ज्ञान स्वयं रूप न हो कर ज्ञान
का ही स्वरूप तो इन सब बातों द्वारा ज्ञान रूप में ही देखा जाता है, योग से
ही सम्भव ज्ञान एकाग्रता द्वारा शांत होता रहा
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