एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचारशीलता विचार करने की क्रियाशीलता का दूसरा नाम या पर्याय है, जिसने मानव
जीवन दिया।
विचार सबसे तीव्र गति से कार्य कर रहे हैं। भौतिक दृष्टि से प्रकाश को सबसे
तीव्रगामी माना, सूर्य की गति को माना गया या ध्वनि तरंगों को पर जो गति तथा प्रभाव
मन तथा विचार का, वाणी का देखा गया वैसा तीव्र वेग या प्रभाव किसी भी अन्य उपकरण
का नहीं।
यह प्रभाव व्यापक या गहरा दोनों स्तरों पर होता है। विचारशीलता जहां होगी, वहीं
सृजन होगा अथवा विनाश विचारशीलता क्रिया-रूप में परिणत होकर जहां होगी, वहां दोनों
तरफ प्रवृत्तियां पैदा होंगी।
जब भी विचारशीलता का रुख सत्य विचार होगा, तब मानव जीवन श्रेष्ठ कार्य में तत्पर
रहेगा, अपने आप स्वयं के प्रति एवं दूसरों के प्रति जागरूक रहेगा तथा उसके व्यवहार में भी
वह बात दिखाई देगी। इसलिए कहा भी गया है... 'मन में सोचे तो सब कुछ पर जब बात मुख
तक आए
मुख से जब शब्द रूप में निकले, वाणी का वह आचरण श्रेष्ठ स्वरूप बने।' जब
श्रेष्ठ कार्य की बात हो, व्यवहार को सुधारने की बात कही जाती है? तब मन हमेशा
उस ओर बढ़ जाता है। यहां पर एक बात कही गई जिस दिशा में चलना है, उस ओर विचार
को मोड़ देना ही उस ओर कदम बढ़ाना कहा जा सकता है। विचार एक दीपक के समान है।
वह जब तक जला रहता है, जीवन के व्यवहार को दिशा देता रहता है। दीपक को बुझा देने
पर या उसका प्रकाश मंद हो जाने पर मनुष्य का कदम भटकेगा, वह राह भूल जाएगा।
इसलिए कहा गया, जब तक ज्ञान रूपी दीपक जल रहा, तब तक विचारशीलता का प्रकाश
दिखाई पड़ेगा। मनुष्य को सद्मार्ग की ओर ले जाना ही दीपक का उद्देश्य है। दीपक के
स्वरूप को समझना होगा, उस ओर ज्ञान रूपी दीपक को जला कर के प्रकाश युक्त बनाना
होगा। जिससे मनुष्य कभी अपने जीवन पथ पर अंधेरा न पाए। भटकन न आए! व्यवहार में न आए!
"जो भी मन शुद्ध विचारधारा युक्त होगा सोचेगा, वह ही वाणी द्वारा श्रेष्ठ कहेगा"
इसका अर्थ यह भी, व्यवहार ज्ञान विचारशीलता पर टिका हुआ होकर मनुष्य आगे
बढ़कर उस विचारशीलता के अनुरूप स्वरूप सामने रखता है। जब मन में विचार ही ठीक
न--होगा जहां अज्ञान रूपी अंधकार का बोलबाला होगा या रहेगा, तो वह शब्द अथवा उस
विचारशीलता का जो फल बाहर रूप में आएगा, उसकी वाणी द्वारा प्रकट होकर जो कर्म रूप में,
उस रूप में नजर आने लगेगा, उस समय मनुष्य क्या कहे और क्या बोलेगा, उसका व्यवहार
किस तरफ जाएगा इसका कोई अंदाजा लगाना बड़ा कठिन होगा।
जब भी विचार मनुष्य, मन से सोचेगा, उस को कार्य रूप आ--कार-रूप-देने
रूप तक पहुंचाने हेतु वाणी का उपयोग कर उस बात को मुख से कहेगा, तो उस
विचारशीलता रूपी वृक्ष रूपी शाखाएं फलती हैं, उनका स्वरूप सब को उस विचारशीलता रूपी
वृक्ष पर नजर आने लगेगा कि फल कैसे निकले हैं।
"जो विचार मन को पूर्ण ज्ञान द्वारा सोचेगा, वह ही वाणी द्वारा श्रेष्ठ
कहेगा"
यह तो विचारशीलता का स्वरूप हुआ, मन का हुआ, पर जो विचार मन तक आया ज्ञान
द्वारा, सो मुख वाणी से भी ज्ञान द्वारा ही प्रकट होगा।
"विचार कैसा ज्ञान रूप में विचारशीलता को दिशा देता ज्ञान होगा, उस विचारशीलता का रुख
उस ओर मुड़ कर वाणी के स्वरूप को श्रेष्ठ बनाएगा या उस दिशा में ले जाएगा"
ज्ञान का यह सारा असर मन की क्रियाशीलता पर और मन की क्रियाशीलता का असर वाणी
रूप मुख पर या वाणी द्वारा जो मुख से निकलता हुआ शब्द रूप में आएगा, उस विचार को
एक विचारवान व्यक्ति ही जान या समझ पाएगा, उस विचार को पहचान पाएगा, जो विचार
ज्ञान से आ रहा होगा, वह विचारशीलता का जो प्रभाव मन पर ज्ञान द्वारा डाला जा रहा
होगा, उस बात को समझेगा।
जब ज्ञान द्वारा श्रेष्ठ विचार का प्रभाव मनुष्य के मन पर पड़ता है, सद्ज्ञान
विचारशीलता की दिशा में ले जाता है, व्यवहार विचारवान बनकर जब बाहर आता है, तो
विचारवान मनुष्य उस बात द्वारा प्रसन्न होगा कि! वह विचारशीलता श्रेष्ठ दिशा का ज्ञान कराती
है। ज्ञान रूपी मन ज्ञान द्वारा प्रकाशित हुआ दीपक ही सब दिशाओं में श्रेष्ठ प्रकाश
फैलाता विचारशीलता रूपी एक ऐसा दीपक होगा, जो दीपक जल कर न केवल विचारशीलता
प्रकाश को फैला रहा होगा, उस ज्ञान द्वारा उस विचारशीलता दीपक प्रकाश द्वारा हर एक
मनुष्य का जीवन प्रकाशित होगा।
विचार ही मनुष्य विचारवान को पहचानता हुआ उस पथ पर ले जाएगा, जिसके वह योग्य
होकर अपने जीवन स्वरूप को सार्थक करने का प्रयास कर सकेगा, जो वह मानव जीवन श्रेष्ठ
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