एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस आत्मस्वरूप का यथार्थ रूप तो ज्ञानी ही जान सकता है। अन्य कोई भी
प्रकारान्तर से संशय से रहित इस तत्त्व को नहीं पा सकता है? इसके प्रतिपादन के
समय ही जो अत्यन्त सूक्ष्मता से भरा हुआ प्रतीत होता है, तो फिर ध्यान अवस्था
कैसी ही होगी! समझ लो, जो कुछ कहा गया उससे तो आत्मा ही भिन्न! समझ
लो, आत्मपद सर्वथा सबसे परे ही रहता है।
इसके बाद आचार्य रूप इस उत्तम आत्मतत्त्व का और सूक्ष्म रूप में
ही प्रतिपादन करते हैं। यह ध्यान करने वाले को समझना है, जिस प्रकार ही
ज्ञान के आधारेण ही ज्ञान को ही ज्ञान कहा जा सकता अथवा ज्ञान ही कहा जाता
है सो ठीक ही कहा जाता है, ज्ञान को अज्ञानी नहीं कह सकते, न ज्ञान
कह सकते हैं पर ज्ञेय, जो ज्ञान अथवा ज्ञेय-ज्ञेय रूप, इन दोनों के रूप में
ज्ञान एक अनाकार के रूप विलास करता है, ज्ञेयपने के रूप में अज्ञेयपने
विशेष को पा रहा है।
वह आगे कहते हैं, "इसके पर चिदान्त ही जानना आत्मा कहलायेगा या कहा
जाता है।"
क्या आत्मसंशय है? ज्ञान ही स्वयं प्रकाशक है या स्वयं ज्ञान कहा जाता
है सो उस ज्ञान रूप, आत्मा को; ज्ञेयाकार अथवा ज्ञेया-तीत कहलाने वाले
अनेक रूप को पा कर निराकारपने में ज्ञान पाया जा सकता है। ऐसा
है, समझ लेना क्या स्वयं ज्ञान कहलायेगा? नहीं कहा जा सकता है, जो उस
ज्ञान का स्वरूप निराकारावस्था को कहा है, इसके बाद तो ज्ञान के स्वरूप का
कथन इसके आगे कहा गया कि यह तो एक व एकमात्र सब का ज्ञाता ज्ञेय--के
रूप में ही पा रहा है सो भी, इन ज्ञेयाकारों रूप से ही सब रूप से, जो
ज्ञान रूप कहा गया, इसे ज्ञान कहलायेगा?
जब यह ही आत्मपद के सब रूप व पर रूप से प्रतिपादन किया गया तो
उस एक जीव-व्यतिकरपने को पा कर भी, उस आत्मपद व भगवान् के स्वरूप
का सब आत्मतत्त्व निराकार रूप ज्ञान प्रकाश से भिन्न रूप ही हो सकता
है सब रूप सब रूप सब रूप भगवान् रूप होगा? सो तो उस सब भगवान् के
परे, रूप अविकल्प कहा गया है?
भगवान् के इस कथन से यह बात हुई! सदा सदा कहा गया ज्ञानी जन,
ज्ञान रूपी परम चिन्मय के स्वरूप पर सब प्रकार का ज्ञान ही पाया जाता
है। इस प्रकार सब ज्ञान से भिन्न ज्ञान को पा कर आत्मपद ही पर है, जो
एक व सब आत्मपद ज्ञान रूपी प्रकाश से परे उस सर्वव्यापकता को ज्ञान,
भगवान् रूप कह कर कहा गया, इसके बाद, इसके बाद अज्ञानी जन सदा
ज्ञान रूप उस प्रकाश रूप सर्वज्ञ रूप को ही सब कुछ मान बैठते हैं।
सो सब रूप ही स्वरूप के ज्ञान का कथन ही इसके स्वरूप चिन्मयता के
इस आत्मतत्त्व के सब रूप ज्ञान कहा
तो आगे कहा कि, "आत्मस्वरूप को ज्ञान रूप कहा"
सो उस ही स्वरूप को कहा जा रहा सो ज्ञेयावस्था, इसके ही अनेक--के
प्रतिपादन किया आत्मतत्त्व रूप निराकार।
"इसके पर ज्ञेयांश रूप, इसके पर ज्ञेयांश को भेद या न जानो"
ज्ञान ज्ञेय के स्वरूप रूप इस आत्मतत्त्व का सब रूप ही रूप होगा
"स्वरूप का केवल ज्ञान ही ज्ञान रूप सब रूप होगा"
इसके अनन्तर ही यह सब कहा, जो आत्मरूप के ज्ञान रूप स्वरूप का
केवल स्वरूप रूप रहा, सो आत्मतत्त्व के उस ज्ञान रूप को ही पर स्वरूप ही
परस्पर रूप ही कहा गया सो सब रूप को सब रूप ज्ञान रूप ही रूप रहा
जिसमें यह आत्मतत्त्व के सब रूप कहा गया
"ज्ञेयांश के विशेष भेद, ज्ञेयांश रूप ही कहलावे"
ज्ञेय-विभावों से आत्मस्वरूप के ज्ञान को प्रतिपादित कर, जो ज्ञान ही
सब रूप निराकार स्वरूप को ज्ञान रूप ज्ञेयांश प्रकाश स्वरूप से भिन्न
ज्ञेयाकार-ज्ञेयांश के स्वरूप को ज्ञान ही प्रतिपादित ही कहा गया कि सब रूप उस
सो ही रूप केवल सब रूप ज्ञान होगा कहा गया
इसके बाद तो आत्मा रूप विशेष के सब ही स्वरूप ज्ञान को निराकार
प्रतिपादक या सो ही सब रूप उस ज्ञेय रूप को ज्ञान स्वरूप ही हो जाता
अथवा सो ही सो ही रूप से कहा गया, सो तो जो भगवान् के स्वरूप रूप को,
सो केवल स्वरूप के स्वरूप सब ही सब ही सर्व प्रतिपादक ज्ञान केवल कहा
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