एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजगत का प्रत्येक पदार्थ भी, अपने उत्पत्ति-विनाश का कारण अपने आप, या अपने
आपमें समाया हुआ? कदापि नहीं? यह स्वाभाविक नियम है, कि जो वस्तु या पदार्थ या
तो था सदा से या नहीं था प्रथम तो पश्चात भी कभी नहीं होगा? इसलिए सब प्रकारों
से ही यह सिद्ध, प्रमाण और तर्कसम्मत? कि जो कुछ संसार बना, अवश्य उस
सबका सब उपादान या तो था सदा, और उस सबको बनाने वाला? जो था सो ही सदा,
और जो सबका स्वामी? सो सदा ही है! वह चेतन है, और चेतन रूप
का नाम चेतन ही होता अचेतन का नाम क्या? चेतन सर्वज्ञ ही होता है
सब उपादान कारण को जान, सो ही ज्ञान पूर्वक रच सकता और जो सब प्रकारों से
उत्पत्ति-विनाश का उपादान या कारण ही नहीं तो वह क्या है? यह उपादान सो प्रकृति
का नाम ही है, जो कि जड़स्वरूप ही केवल सब प्रकारों से जड़ का, नाम केवल; सो
कार्यरूप से सम्पूर्ण संसार प्रत्यक्ष अपने आप ही सब प्रकारों से सिद्ध सब को, जो
सो अपने आप अचेतन? कदापि चेतन नहीं? सो ही सदा से केवल था, सो कार्य बनकर
सब रूप
जगत सब कैसा सो है? सब प्रकार से ही सदा सत्य है, जो सो सत्य ही
सदा रहता है, या नहीं सदा रहता? सत्य का सर्वथा ही कभी अभाव तो नहीं
होता कहता है, सो सब प्रकार से सदा सत्य है, सो अपने स्वरूप करके ही
विवर्तित हो सकता; सो तो सदा सत्य, सो ही सदा परिणामी
अब सूक्ष्म और स्थूल सब जगत जिसको दोनों प्रकार विवर्तता करके
कहा जाता गया, जिस रूप करके सब जगत कार्यरूप सत्य ही सब बना, सो
तो नाम रूप-रंग सब मिथ्या हुए, केवल सूक्ष्म रूप ही सो सत-प्रतिपादक का रूप
सत्य रहा, न किसी प्रकार का भी यह संसार सब भ्रम था या कोई भ्रम का रूप
आकाश का, गंधर्व का, तृष्णा का, शशरूप का, सो सब नाम रूप-रंग सब का
नाम-कर्म सब मिथ्या रूप जगत का सत-रूप से सत्य-सत्य होकर सब प्रकाश
रूप सब नाम-रूप मिथ्या रूप, माया-सत्य स्वरूप सत रूप सब जगत का रूप
सत-स्वरूप ही प्रकाश सब का केवल या अविद्या विद्या दोनों रूप कहा जाता
है, सो अविद्या का प्रकाश भी, सो अविद्या का सत ही!
अब यह अविद्या अज्ञान-रूप का प्रकाश ज्ञान से अविद्या का
नाश सब हो कर केवल ही ब्रह्मरूप ही सब सत प्रकाश रूप सब रहा, सब ब्रह्म;
ब्रह्म सब का सत्य, सब माया सत्य; ब्रह्म ही सब रूप में सो प्रकाश ही
प्रकाश सब कार्य सब सत्य स्वरूप प्रकाश? फिर जो अविद्या को सत्य कहा
अविद्या सत रूप सब माया प्रकाश? फिर ज्ञान का अविद्यारूप से विरोध कैसा
? ज्ञान का अविद्यारूप से क्या विरोध रहेगा? सो तो जो अविद्या है, सो
ब्रह्म का अज्ञानांश रूप सब केवल सत्य रूप अविद्या? ज्ञान तो अज्ञान
अविद्या नाम-कर्म सब अविद्या ही, अविद्यारूप ज्ञान
अब जो सर्वज्ञ सर्वव्यापक सब में सत रूप प्रकाश रूप ज्ञान
रूप सो सच्चिदानन्द-स्वरूप है, सो सब का केवल सब ज्ञान रूप सत्य प्रकाश
रूप ज्ञान ही अज्ञानरूप हो कर लगा सो लगा, कि सब ही सो ज्ञान रूप अविद्या
अविद्यारूप हो कर लगा अविद्या ज्ञान का सब ही जब प्रकाश स्वरूप ज्ञान
अज्ञान का नाश कर के सब ज्ञान रूप ही ज्ञान रहा, सो सब ज्ञान ही रहा सो
केवल ज्ञान, ज्ञान केवल सत, ज्ञान केवल सत्य
अब केवल ज्ञान का नाम ही सत रूप केवल सब जगत हुआ सो
ज्ञान निराकार है, साकार का नाम केवल ज्ञान का नाम कैसा होगा क्या?
साकार कैसा है? सो ज्ञान का ही, ज्ञान रूप ही प्रकाश हुआ? केवल ज्ञान केवल
साकार का रूप हो कर प्रकाश सब का ही रूप हुआ, साकार सत्य ही रहा
सो सब का सब केवल सब ही का नाम सत प्रकाश-का प्रकाश नाम ही केवल
है, ज्ञान रूप ही सब का सब रहा
अब केवल नाम ही सब का रूप ही सो सो रहा, नाम केवल ही केवल
रहा; सो केवल सब केवल सब ही सो ही रहा, केवल केवल ही सब का रूप
केवल प्रकाश स्वरूप ही रहा, निराकार ही सब रहा, केवल केवल ही सो
रूप हो कर सब का सब का रूप ही केवल सब रहा! रूप केवल केवल
केवल रूप सब प्रकाश का रूप प्रकाश ही केवल केवल केवल ही सब
केवल ही केवल केवल
अब केवल सत, या केवल ज्ञान केवल रूप, केवल सब स्वरूप ही
रूप सब केवल सब रूप केवल रहा? सब ही सब केवल केवल सब सब केवल
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