एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंकि यह एक आध्यात्मिक रूप बनता जा रहा था संप्रदाय का, तो मन में उठा थोड़ा डर।
दूसरा डर यह था, स्वामी दयानंद जी सब जगह घूमते हुए प्रचार कर रहे थे। वेद को
प्रत्येक के लिए सत्य मान कर सनातन धर्म के केवल बाहरी क्रिया रूप को ही ले रहे
थे। स्वामी दयानंद जी ने आर्य समाज की नींव डाली जिसके कुछ ही वर्ष बाद उनके
सारे सिद्धांत बदल गए थे। पर, डा. हेडगेवार यह सब कुछ गहराई पूर्वक देख रहे
थे। जब इस पर विचार डाक्टर हेडगेवार जी आपस में करते
उनके दो मित्र बापू जी, दादा राव कहते थे हमारे डाक्टर जी संघ को
आर्य समाज की तरह संप्रदाय न बनने देना।
दूसरी बात, जिससे संघ रूप ले सकता था समाज का दूसरा रूप था हिंदू
महा सभा, जो, व्यायाम, खेलकूद के रूप में सामने आई, अहिंसा, असहयोग
के लिए सब जन-मन को तैयार न होना देख डा. हेडगेवार समाज सुधारक का
क्रांतिकारी रूप देखना चाहते थे। वे समाज को राजनीति का अखाड़ा न बना कर
सत्य स्वरूप देना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे हिंदू महासभा की तरह यह मात्र
एक दल बनकर रह जाए। वे केवल हिंदू, हिंदू कहने वाले नहीं, अपितु,
हिंदुत्व, सनातन संस्कृति को मानने वालों के हृदय में क्रांति की ज्वाला
जगाना ही चाहते थे। वे, डा. हेडगेवार कभी भी राजनीति में भाग लेने
के लिए आगे नहीं आते थे। संप्रदाय बनने का विरोध करते थे।
क्रांति लाने वाले केवल यह कह कर नहीं रह जाते कि आज यह हो रहा
है। देश में जो कुछ हो रहा था, डाक्टर हेडगेवार उसे चुपचाप देख रहे थे।
उन्हें यह अहसास हो रहा था, जो क्रांति केवल विचारों तक ही सीमित रह जाएगी
उस क्रांति से कुछ नहीं होगा।
आर्य समाज केवल मात्र समाज का रूप, जो क्रांति का रूप था वह नहीं
था। हिंदू महासभा केवल राजनीति का रूप ले रही थी। देश को जिस क्रांति
की आज आवश्यकता थी वह क्रांति केवल विचारों तक ही सीमित नहीं रह
सकती थी।
एक क्रांतिकारी केवल बंदूक से क्रांति नहीं करता। वह केवल अपने
हाथ से बंदूक चलाता अवश्य है, पर मन से समाज को जगाने का काम करता
है। इस तरह क्रांतिकारी भी एक राजनीतिक रूप ले लेता है। पर, यह
क्रांतिकारी दल भी विचारों तक ही रह जाते थे।
सब डाक्टर हेडगेवार जी के सामने था। क्रांति केवल समाज का सुधार
नहीं चाहती। केवल देश को दासता की बेड़ियों से मुक्त नहीं करवाना चाहती।
केवल अपने विचारों का रूप बदलना ही क्रांति नहीं होती।
आज देश को आवश्यकता किस क्रांति की थी?
डाक्टर हेडगेवार जी इस पर निरंतर विचार कर रहे थे। वे
देख रहे थे कि देश का नौजवान आज भटक चुका था। वह समाज की बेड़ियों
में जकड़ कर समाज को ही सत्य मान रहा था, पर क्रांति के लिए तैयार नहीं
हो रहा था। केवल दल बन रहे थे। हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, कांग्रेस
ये सब दल बन कर रह गए थे। दल आपस में लड़ रहे थे।
क्रांतिकारी दल केवल समाज को जगाने का काम कर रहे थे। केवल विचारों
से क्रांति नहीं आ सकती थी। आज आवश्यकता देश में ऐसे नौजवानों
की थी जो अनुशासित हों, जिनके विचार संकीर्ण न हों। वे देश के लिए जीने-
मरने के लिए तैयार हों।
क्या था यह? डाक्टर जी के सामने इस पर प्रश्नचिह्न लग चुका था।
वे सोचने लगे कि जब तक समाज में संगठन नहीं होगा, जब तक समाज में
एकता नहीं होगी, जब तक समाज की शक्ति एक नहीं होगी, तब तक क्रांति
नहीं आ सकती। क्रांति केवल बंदूक से नहीं लाई जा सकती, बंदूक तो
केवल एक व्यक्ति को मार सकती है, पर जब तक समाज की चेतना नहीं
जगेगी, जब तक समाज के अंदर एकता नहीं आएगी, तब तक क्रांति नहीं
आ सकती।
जब देश पर आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया था, उस समय देश में
अनेक राजा थे, अनेक विचार थे, अनेक जातियां थीं। आज भी देश में
वही सब कुछ हो रहा था। देश में क्रांति की ज्वाला तो जल रही थी,
पर क्रांति को एक दिशा देने वाला कोई नहीं था।
आज डाक्टर हेडगेवार जी के सामने यह सबसे बड़ा प्रश्न था।
197