अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
इस कारण प्रभु नाम, प्रभु रूपके जप और ध्यान रूप पुरुषार्थ को तो सब कोई कर सकते हैं।
विचार ही से साधनसाध्य सब गुण प्रगट हो जाते हैं। विचार ही से जीव का विचारवान्
पद हो कर संशय निवृत्त होता है, भ्रम नष्ट होता है; भय का डर दूर हो कर संशय
रहित हो कर जीव सुख रूप आनन्द को प्राप्त होता हुआ निज रूप स्वरूप होता है॥
अब विचार का साधन बताते हैं। प्रथम जिस बात को विचारेगा उस पर ही मन
को थिर कर लेवे, अन्य संकल्प त्याग देवे, अन्य संकल्पों को त्याग करके जो मन
एक बात पर थिर होगा तभी ही तो उस बात सम्बन्धी विचार सिद्धान्त हृदयङ्गम हो कर
मन को निज स्वरूप आनन्द पद को प्राप्त करा सकेगा और मन विमल होकर सब ओर ज्ञान
प्रकाश ही को देखेगा और फिर एकान्त स्थानमें बैठ कर मनकी चञ्चलताको त्याग कर
विचार रूप ध्यान करे, एकचित्तता चित्त को ठहरा करके सदा सत्संग और सत्शास्त्र
अनुशीलनपूर्वक विचार करता रहना चाहिये; और सन्तजनकी संगति, सन्मुख हो कर सब बात
विस्तार पूर्वक पूछे॥
जैसे गृहस्थी अपने काम पर तो ध्यान रख कर सावधानी से यत्नवान् रहता है,
अपनी कार्यकुशलता द्वारा अपने सब काम सुधारता है। सत्कार्योपयोगी वस्तुओं को
एकत्र करता है? व्यापार चतुराई, समय देख कर, सावधानी, युक्ति, बुद्धि
द्वारा विचार कर मन में निश्चय करके जो काम आरम्भ करेगा? उस का फल अवश्य
भलाई ही होगा। इसी प्रकार से विचार रूप मन की लग्न लगा कर यथार्थ साधनके नियम
को, गुण को जानकर उस बात रूपी विद्या को ग्रहण कर के यत्न से उस साधन
द्वारा अपने मन एकाग्रता से जो विचार मन को थिर करेगा तो?
इस अभ्यास से विचारवान् का चिन्तनीय रूप जो मन सत्स्वरूप हुआ, उसही
का ध्यान रूप मन रूप हो गया। इससे परे दूसरा कोई साधन नहीं॥
अब विचार करो, विचार द्वारा मन से ही यह सारा जगत् दृश्यमान हो कर
भास रहा है। विचार ही स्वरूप रूप से दृष्टि रूप हो कर रहा; सो तो विचार रूप स्वयं
आप ही रहा न? किस लिये कि; यथार्थ रूप विचार से स्वयं ही सब ओर प्रकाश
दृष्टि गोचर हो रहा है न? विचार ही द्वारा सब कुछ दृश्य से अदृश्य और अदृश्य
से सब दृश्य बना, दृश्य को त्याग कर के सत्स्वरूप प्रकाशको सब ओर देख कर, अपने
स्वरूप रूप सत्य विचार से सब कुछ लय होता देख कर यथार्थतः सर्वव्यापी प्रकाश
सच्चिदानन्द रूप प्रकाश ही को स्वयं जान कर सब ओर व्यापक अपने रूप प्रकाश रूपको
ही देख रहा॥
हां, विचार रूप सब प्रकाश का नाम ही यथार्थ है, उस नाम को ही सब जप कर
लेते हैं; सो रूप तो मन रहा, सो यत्न सब हुआ; तो फिर मन का लय कैसे हो?
इस से विचार रूप को ही तो नाम रूप करके स्मरण ही करना ही सब काम बनता है।
केवल स्मरण यत्नशीलता से ही तो मन लीन होता है; सो ध्यान का रूप
विचार द्वारा ही तो सिद्ध हो सकता है॥
अब इस पर विचार करके देखो कि, विचार से ध्यान न स्वरूप हुआ॥
नाम का अभ्यासी पुरुषार्थ से स्मरण द्वारा जब मन को थिर करके
नाम का ध्यान स्वरूप रूप-रङ्ग प्रकाशादि रूप देखा, यथार्थतः जो ध्यान
स्वरूप लय स्वरूप प्रकाश का साक्षात्कार हुआ, तो सो रूप प्रकाश रूप हो कर
स्वयं प्रकाशवान् स्वरूप प्रकाश स्वरूप से सम्बन्ध को पाकर लय हो कर नाम
रूप लय--हो गया। इससे तो विचार रूप ज्ञान का साधन रूप ही तो सिद्ध हुआ;
केवल ध्यान रूप नाम का स्मरण द्वारा प्रकाश का ध्यान करने से सब का लय
साक्षात्कार न हुआ; केवल नाम रूप ही सब का लय कारण साधन न हुआ, केवल
ही न हुआ मन, विचार द्वारा ही नाम का मन में ध्यान रूप लय, यथार्थतः ध्यान
ज्ञान से स्वरूप प्रकाश का प्रकाश रूप साक्षात्कार रूप में प्राप्त रूप सब
सत्यमय हुआ॥
स्मरण रूप का साधन द्वारा मन का ध्यान तो हो सकता रूप ध्यान द्वारा ज्ञान
की प्राप्ति विचार से ही, सो विचार रूप ही तो सब का मूल कारण स्वरूप
हुआ कि जिस से यत्न द्वारा विचार ज्ञान से ही प्रकाश साक्षात्कार-रूप
सब... में ही प्रकाश पाया गया--कि जिस बात से सन्देह दूर, सब भ्रम निवृत्त हुआ!
इस कारण से नाम ध्यान से ज्ञान का स्वरूप हुआ, विचार से स्वरूप प्रकाश
का सो तो सब ओर ज्ञान रूप ही हो कर प्रकाश में स्वरूप ज्ञान का ध्यान ज्ञान ही का
प्रकाशक ज्ञान ही स्वरूप, सब ओर ज्ञान ही हुआ॥
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श्यामा का मनपसन्द भोजन, उसका मनपसन्द पहरावा और, उसका अधिक समय अपने कमरे में--सब कुछ उसका
अपना था और इन बातों पर किसी का कोई अधिकार नथा, लेकिन उसका प्रत्येक कार्य किसी अन्य, विशेषकर रानी
जी की आज्ञा! यह बात कभी उस अनाथ कन्या की समझ में नहीं आई कि रानी अधिकार का प्रयोग केवल कठोर भाषा
तक सीमित क्यों रखती हैं और, इस सब बातों पीछे वास्तविक रूप किसका है अथवा
उसका क्या स्वरूप? यह रानी का केवल ढोंग मात्र था? किन्तु यदि यह सब ढोंग मात्र होता,
श्यामा को क्या लाभ पहुँचा
हाय री अभागिनी! रानीजी इस प्रकार का व्यवहार क्यों कर रही हैं यह समझ पाना श्यामा की बुद्धि
से परे था, विशेषकर उस परिस्थिति मेंजब श्यामा; किसी को मुंह दिखाने योग्य नथी, रानीजी नेउस
समय अपना विशाल अन्तःकरण खोलकर रख दिया था। उस समय वह रानीजी की विशालता तथा उदारता की तुलना
अपनी सास की संकीर्णता से किये बिना न रह सकी। वह बारम्बार रानीजी की ओर देख रही थी कि रानीजी की
बातों मेंउसे कहीं छल-कपट दिखाई दे लेकिन जब कभी भी श्यामा नेरानीजी को देखा, रानीजी केचेहरे
पर कठोरता थी; रानीजी की वाणी मेंव्यंग्य, कटुताएवं ईर्ष्या-द्वेष था; वह रानीजी सेकांपती थी!
उस समय वह सोच रही थी कि हे प्रभु, रानीजी केअन्तर्मन मेंक्या भरा हुआ हैतथा यह सब
नाटक वेक्यों कर रही हैं। श्यामा, यह सब सच तो मान नहीं सकती थी कि कोई उसकी सेवा इस प्रकार
भी कर सकता हैकि स्वयं कष्ट सहकर भी सामनेवाले को आराम दिया जाए। ऐसा दयालु भाव तो केवल
श्यामा केमाता-पिता अथवा देवेन्द्र का हो सकता था। वह श्यामा को सांत्वना देनेकेलिए उसकी सास
केविषय मेंगलत विचार प्रकट करती; उस समय श्यामा को यह विचार भी आया कि हेभगवान्! यह
संसार भी क्या केवल धोखा है? या मनुष्य का नाम कपटी प्राणी है? वास्तव में
छल-कपट करना ही इसका स्वाभाविक गुण हैतथा मानव हृदय मेंदया-धर्म नाम का कोई अंश नहीं? क्या सब लोग
ऐसे ही हैं! क्या सब संसार ही छल-कपट का ही रूप
मानकर जी रहाहै?
श्यामा रानीजी की ओर देख कर आश्चर्य सेस्तब्ध मात्र होकर बैठी-बैठी सब कुछ
देख रही थी; रानीजी नेसारे विषय को व्यंग्य मेंक्यों बदल दिया? वह स्वयं अपराधिन की
तरह सिर झुकाये, अपराधी की तरह रानीजी की बात सुन रही थी। रानीजी का भाषण जारी था, "और हाँ!
तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक रहता हैना, तुम्हारी दवाई समयपर पहुँच जाती होगी। तुम्हारी
देखरेख मेंतो कोई
कमी नहीं रहती? यदि नौकरानी सेकोई शिकायत हो तोबतलाना तथाहाँ, तुम यह सारी
दवाइयाँ समय पर पीती हो ना? मुझे सच बताना?
रानीजी श्यामा केउत्तर की बाट नजोहते हुए, अपना सिर हिलाकर वहां सेचलती बनी।
उन दोनों महिलाओं का यह एक ऐसा नाटक था, जिसे वे स्वयं समझती, पर वे दोनों नहीं, श्यामा अपनी इस सास
की सांत्वना को स्वीकार करनेकेलिए बाध्य नहोकर भी विवश थी... ! श्यामा आश्चर्यचकित होकर
सास की ओर देख रही थी कि यह उस महिला का रूप कैसेहो सकता हैजो श्यामा केलिए कभी विष की
गांठ बनी हुई थी। वह श्यामा को अपनेरास्तेका कांटा समझ कर उस पर नित्य नयेअत्याचार किया
करती थी। श्यामा रानीजी केइस छल-कपट पूर्ण व्यवहार को देखकर सिर पकड़ कर बैठ गई। उसका
सिर चकराने लगा। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह अपनेजीवन मेंकहां सेआकर कहां फंस गई है।
यह सब क्या नाटक हो रहा है, रानीजी नेश्यामा की ओर मुंह करके मुस्कुरा कर कहा,
श्यामा अब तुम सो जाओ; सब समय सिर पर व्यर्थ की चिन्ताएं मत सवार रखो!
श्यामा सोच रही थी कि रानीजी का हृदय कितना कोमल हैअथवा रानीजी का यह केवल
दिखावा मात्र है--क्या रानीजी सचमुच बदली? अथवा केवल नाटक?
श्यामा को इस बात का आश्चर्यथा, कि जिन सासने जीवनभर उसेएक मीठा शब्द
नबोला, वह आज उसके साथ मीठी बातेंकर रही थी। वह सास जिसने श्यामा को कभी बहू
रूप मेंस्वीकार नहीं किया था वह आज श्यामा को 'मेरी बहू' कहकर पुकार रही थी, जिस सास ने
श्यामा को कभी अपनेकमरे मेंपैर भी नहीं रखनेदिया था, वही सास आज श्यामा केकमरे
मेंआकर उसके स्वास्थ्य की चिन्ता कर रहीथी, जिसको देखकर श्यामा कांप उठती थी, वही सास आज
श्यामा को प्रेमपूर्वक सहला रही थी! यह सब श्यामा को समझ नहीं आ रहा था, सच क्या थाऔर झूठ क्या,
यह वह समझ नहीं पा रही थी। यह सब देखकर श्यामा आश्चर्य-चकित थी! वह स्वयं अपनेआपको कोस रही थी
कि उसने सास को कभी प्यार क्यों नहीं किया। उसने रानीजी को क्यों नहीं पहचाना! वह रानीजी केचरणों
मेंगिरकर अपनेअपराधों की क्षमा मांगना
चाहती थी, पर हिम्मत नहीं जुटा सकी!
यह सोच कर श्यामा का हृदय भर आया था कि हेप्रभु, श्यामा क्या कर रही है? उसने
तो आज तक अपनी सास को अपना समझकर प्यार ही नहीं किया। इस विषय मेंश्यामा का दोष नथा। सास
नेश्यामा केलिए कभी प्यार नहीं दर्शाया; यह सोच कर श्यामा अपने-आपसे लज्जित हो रही थी; श्यामा
रानीजी केबारे मेंसोच कर अपनेको कोसती हुई बैठी थी। श्यामा विचारमग्न थी, कि
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अवश्य ही इसका परिणाम यह हो कि मनुष्य अंधा हो जाय! वैयक्तिक स्वार्थ बढ़ता जायगा; इसका
प्रभाव सब क्रियाकलापपर पड़ता जाय
विचार की परंपरा असीम विस्तार-क्षेत्रवाली होने और क्रियाकलाप सीमित होने से मस्तिष्क
तथा हृदय दोनों पर ही प्रभाव का आधिक्य रहता हुआ यह सब कुछ केवल मानसिक क्रियाकलाप बनकरही
वैयक्तिक जीवनकी सीमा में बंधकर संकुचित रह जायगा और वैयक्तिक संकीर्णता बढ़ायगा जो स्वयं
व्यक्तिवादी सभ्यता बनकर विश्व शांतिमें बाधक नहोगी क्या? इस वैयक्तिक क्रियाशीलता का प्रभाव यदि
अन्य किसी दिशा अभिमुख नहोजायगा तो, वह प्रभाव केवल एक इस ओर क्रियाशीलताको विकृत करनेवाला--
मात्र होगा; उसका वैयक्तिक क्रियाकलाप आवश्यकता से कम और वह विचार की ओर बहुत अधिक प्रभाव डाले
सकेगा। विचार क्रिया का स्वरूप स्वयं बन जायगा आवश्यकता के कम रूप में उपस्थित होकर अपने
रूपमें? केवल इस विचारमें विश्वास रखकर नहीं
केवल इसपर ही सब कुछ छोड़ देना व्यर्थ होगा मस्तिष्कपर भार अधिकताका, यह उचित
क्रियाशीलताका! यह समाज-रचना, इसका विकास नहीं; विकास नाम तो व्यक्ति अथवा समाजकी
उस सब क्रिया शक्तिमें निहित क्रिया रूप विकास-शक्तिका उपस्थित होनाहै, जो केवल विचारमें नहीं;
केवल विचारशक्तिके ही रूप द्वारा नहीं क्रियाशीलता का भी, कार्य को क्रियान्वितकरके ही जो
समाज को इस स्थितिमें लाने का कारण बनेगी शक्ति, जिससे स्वतः उसका रूप ही यह
क्रियात्मकतापर आधारित
क्रियात्मकता ही रूप हो इस वैयक्तिक क्रियाका भी जो समाज को इस स्थिति की ओर ले
जायगी जिस दिशा में विचार और यह रूप दोनों ही रह सकेंगे और समाज स्वयं एक ऐसे रूप में
उपस्थित हो सके जिसकी क्रिया का यह विचार वैयक्तिक क्रियाकलाप की समानता और सहयोगपर आधारित
बना रहेगा, तभी वह स्वतः न रहकर समाजकी सेवाका रूप बनसकेगा तो, जहां वैयक्तिक रूप का
क्रियाकलाप मस्तिष्कपर ही अधिकताका प्रभाव डाले रहने की आवश्यकता होगी, वैयक्तिक
क्रियाकलाप का स्वरूप स्वतः कम आवश्यकता लिये हुए, वैयक्तिक क्रियाकलाप उस रूप ओर रूपमें
रूप धारण कर सकेगा जो समाज की ओर जानेवाले क्रियाकलाप का कारण बन सकने योग्य
केवल इतना ही नहीं कि केवल विचार का प्रभाव केवल मस्तिष्कपर ही सीमित रहेगा; केवल
विचारमें? फिर उसका प्रभाव व्यक्ति स्वयं पर प्रभाव डाले बिना क्रिया रूपमें क्यों न होगा?
केवल मस्तिष्कपर ही प्रभाव का परिणाम तो विचार का यह रूप स्वरूप होगा ही, मस्तिष्क स्वयं
विकृत
होकर रहेगा ही, जिसका असर सब क्रियापर पड़े बिना न रह सकेगा जो केवल विचारपर ही बल देते
रहकर वैयक्तिक क्रियाशीलताको संकुचित बनाते हैं; इस रूपकी क्रियाशीलता समाज को स्वस्थ रूप देनेमें
समर्थ हो सके क्या? इसका तो रूप ही इस रूप में समाज बनकर सामने आवेगा, जो केवल एक ऐसे
समाज का रूप बना सकेगा जो विचार, विचार, सब कुछ सोच और समझ तो सकता हैपर करनेके समय
शिथिल होकर केवल उस रूप में केवल एक विचार बन जायगा, जिसे केवल विचार ही कहसकेंगे; कोई
रूप क्रिया का नहीं होगा
क्रिया व्यक्ति को क्रियाशील बनकर रूप देगी, व्यक्ति का विचार जब क्रिया का रूप ले; तब
विचार सफल होगा ही, विचार मस्तिष्कपर कोई विकृत भार डालनेमें असमर्थ ही रहेगा
और समाज-रचना, व्यक्ति अथवा रूप संबंधी सब क्रिया को स्वतः सफल बनानेमें समर्थ हो ही
सकेगा। जब क्रिया स्वयं समाजके स्वरूप में निर्मित होती रहेगी और यह रूप समाज को स्वतः
एक नया जीवन प्रदान करेगा जो व्यक्ति तथा उस समाजके परस्पर संबंधपर ही नहीं, वैयक्तिक तथा
सामाजिक दोनों क्रियाओंके इस रूप और क्रियाशीलताको भी स्वस्थ रूप प्रदान करेगा, जिससे
यह विचार; केवल मस्तिष्कपर भार ही न बनकर रह जाय केवल न रहकर, जब स्वतः समाजका
रूप बनकर, नया स्वरूप; समाजको रूप की सहायता
इन दोनों रूप क्रियात्मक और विचारात्मक जिनका मस्तिष्कपर प्रभाव पड़ता है। यदि केवल
एक तरफका प्रभाव ही इन दोनों शक्तियोंपर पड़ा तो समाज विकृत बनजायगा और! केवल क्रिया
एक विकरालता लेवेगी; या तो केवल विचार क्रिया शक्तिहीन रूप में समाज को बनायगा जिससे
केवल शून्य रहेगा; क्रिया शून्य हो, जन-बल केवल विचारपर ही आधारित रह जाय तो समाज
केवल विचारके ही आधार समाज का रूप बन जायगा, जिससे समाज का रूप और क्रिया दोनों
नष्ट होकर ही, व्यक्तित्व केवल एक विडंबना
वैयक्तिक रूप और उस क्रियाकलाप का जो क्रियाशीलता को रूप देवे, वह केवल
हो; न तो केवल विचारात्मक भार क्रियाकी क्रियाशीलताको नष्ट ही करने पावे
आवश्यकता का रूप यदि सब कुछ होने लगे तो न केवल एक व्यक्ति, न केवल एक
मस्तिष्कपर, सब कुछ भार बनकर समाप्त होगा
80
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81
यद्यपि वह साधन केवल ध्यान स्वरूप साधन था, इसलिए उसके द्वारा सिद्ध होने वाला फल भी
केवल मन की ही सीमा तक बना रहा, पर जो साधक-साधना का रस, रस का रहस्य जानता
नहीं था, उसे ध्यान स्वरूप साधना का स्वरूप न समझ, केवल सांसारिक दृष्टि से उसके
लाभ या स्वरूप समझना ही पर्याप्त न समझ, उसकी सत्यता सिद्ध करने हेतु प्रमाण
मांग ही बैठा? वह प्रमाण क्या मांग बैठा केवल यह प्रमाण नहीं, चमत्कार स्वरूप ही मांग
पर बैठा जिस रूप से ज्ञानियों, संतों का विश्वास उठता; पर जो सच्चे थे, स्थिति के
ज्ञाता, स्वरूप ज्ञाता, साक्षात्कार भाव-युक्त मन की गति ज्ञाता, स्वयं मन ज्ञाता
या स्वरूप मन ज्ञाता, पर जब वह सत्य का ज्ञाता, स्वरूप ज्ञाता, ज्ञान का
पूर्ण ज्ञाता था उसने तो जान ही लिया न वह केवल ज्ञान के रूप को सत्य ही जानने
वाला, उसे तो रूप का प्रमाण साक्षात्कार ही रूप में देना होगा जो रूप स्वयं देखना
चाहता था?
इसका तो यह अर्थ हुआ भक्तराज प्रह्लाद को ज्ञान पूर्ण था, ज्ञान रूप का
भी ज्ञान था; ज्ञान का रूप केवल ज्ञान सीमा तक ही रहा यह जानकर ही उसने
ज्ञान दिया, प्रभु तो सब घट में वास है; कश्यप तो ज्ञान रूप शब्द को, या उस
शब्द स्वरूप लाभ को? शब्द के स्वरूप लाभ को समझ न सका इसलिए उसका ज्ञान
रूप लाभ केवल शंका रूप में बना रहा, जिस रूप से उसका वह ज्ञान था; केवल
रूप ही ज्ञान रूप का वास या वास का रूप ही ज्ञान रूप लाभ समझ लिया जाता
क्या? सब कुछ सत्य रूप में प्रकट हुआ? ऐसा क्यों रूप का वास
केवल ध्यान के रूप को समझकर ही ज्ञान का रूप माना गया, इससे
वह साध्य रूप से सिद्ध न हो सका, इससे सब साधन व्यर्थ कहलाने लगा, जब
तक ध्यान, साधन रूप स्वरूप ज्ञान का यह सत्य न ज्ञान में पूर्ण रूपमयी
था, प्रह्लाद ने इस रूप का रस-रूप देखा समझा
हिरण्यकश्यप तो इस रूप के प्रभाव को नहीं जान रहा था इसलिए उसने पूछा
कि तू जो कहता रहा कि सब में ज्ञान, सब दिशा सब काल-दिशा का वास है
तो बता कि यह जो, प्रह्लाद ज्ञान का साधन है या तू जो समझता है, या
केवल यह प्रह्लाद का ज्ञान ही सब का वास जानकर समझ रहा, यह सोच कर
सब का रूप ज्ञान का वास रूप समझ रहा था केवल प्रह्लाद ज्ञान का ही, इसी रूप
जान कर ही यह सब में केवल ज्ञान स्वरूप वास रूप को जान रहा था रूप का स्वरूप
ज्ञान, ध्यान स्वरूप का ज्ञान था, इससे कश्यप जान नहीं सका स्वरूप ज्ञान रूप
ज्ञान रूप हुआ ज्ञान रूप का जो ज्ञान स्वरूप रूप का ज्ञान समझ सकता
जो ज्ञान का वास केवल ध्यान रूप में ही था वह रस-रूप तो बन रहा था
पर, इस रस का रूप, रस का वास, रस का ज्ञान, रस का साधन, सब कुछ जो
ज्ञान था... तो वह सब तो प्रह्लाद रूप साधन समझ रहा, पर कश्यप कैसा! प्रह्लाद
सब का प्रमाण था? सब का साधन रूप ज्ञान था? कश्यप अज्ञान रूप साधन
रूप का साधन रूप में ही यह ज्ञान था, कैसा? जब वह, ज्ञान ऐसा समझता था,
तो बता, कहां, कहां भगवान है? या तो इस खंभे में भगवान है? सब ओर,
चारों ओर, जिस खंभे में तूने देखा! तो बता सब का रूप, प्रभु, जो सब
प्रह्लाद का स्वरूप बन कर वास कर रहा है सब में सब रूप बनकर! प्रह्लाद
क्या समझ रहा? ज्ञान स्वरूप रस, स्वरूप के रस साधन किया! या तो ज्ञान ही
सब कुछ था, सब ज्ञान रूप वास का वास रूप सब रस का वास था; पर केवल
ज्ञान रूप ज्ञान का वास रूप ज्ञान में ही था, ज्ञान रूप का प्रभाव
साक्षात्कार का रूप! ज्ञान स्वरूप रूप का रस, ज्ञान स्वरूप का वास था! जब उस
का वास दिखा तो, वह ज्ञान रूप साधन कैसे बन रहा? या तो प्रह्लाद का केवल
ज्ञान रूप वास ही था सब, इसका रस कैसा था?
केवल ज्ञान रूप सब मन का वास स्वरूप ही रहा या रस रूप का प्रभाव न
था इसलिए ज्ञान रूप वास रूप हुआ जिससे वास काल-दिशा ज्ञान रूप प्रभाव
के प्रभाव से यह सब साधन रूप ज्ञान का प्रभाव बना; इसलिए प्रह्लाद
का यह साधन ज्ञान था, प्रह्लाद के इस साधन द्वारा सब साधन सिद्ध रूप हुआ
था, जब वह कश्यप द्वारा पूछा गया; प्रह्लाद सब प्रकार सब ओर से? प्रह्लाद
सब ज्ञान स्वरूप रूप रहा? कश्यप सब प्रकार क्या समझा? या तो वह भी ज्ञान
स्वरूप ही ज्ञान रूप समझ, जो ज्ञान के सब सत्य स्वरूप प्रकार सब रूप बना
जिससे उसका ज्ञान प्रभाव स्वरूप हुआ ज्ञान रूप हुआ सब ज्ञान का स्वरूप रूप
बनकर प्रगट हुआ जिससे कश्यप रूप ज्ञान सब मन का विश्वास हो गया जिससे
ज्ञान रूप सब वास हो कर, जो ज्ञान के सब स्वरूप द्वारा सब घट में था, वह
82
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तथा अनेक प्रकार विषय भोगों करके तृप्त हो सकते वा नहीं सो कहो, इस वचन करके राजाने
मन को वशमें कर लिया
सो हेराजन् इस प्रकार, जब मन को वश करे, तब परम प्रकाश रूप आत्म तत्त्व ग्रहण
करने का उपाय विचारै सो तुम सुनो। प्रथम तो शास्त्र के अर्थ का भली प्रकार विचार
करे अरु वैराग्य भावना भी मनमें निरन्तर दृढ़ करे अरु ब्रह्म--विद्या पढ़े अरु बहुत
काल पर्यन्त अभ्यास को विचारै सो सब संशय को, अरु अविद्यारूपी तमको नाश करैगी अरु
विचार; अरु जो राग--द्वेष विषय--विकार करके तृष्णा उपजी, तिसकरके नष्ट जो
स्वरूप आत्मप्रकाश तिसको उदय विचार करे। तिस चिन्मात्र रूप में जो अविद्याकृत
चेत्याकार वासना का उदय है तिसको विचारकर नष्ट करै तब चिन्मात्र रूप उदय हो
प्रकाशता भान हो, अविद्याकृत वासना का उदय तिसको बन्धन है, तिसकरि रहित आत्म
पद प्राप्त होवै
जिस काल राग--द्वेष अरु विषय की तृष्णा का--सा अविद्याजनित उदय जो चित्त
विषे उपजा तिस चित्त को न तो यह चित्त कहे, ना अविद्या कहे॥
विचारि यह तो सूक्ष्म संशय, ...
जब ना तो यह चित्त न अविद्यास्वरूप हो, तब ना यह चित्त कहावै कहा, अरु स्वरूप जो
चेतन सोई सदा सो ही रहा; विचारवान को चित्त भी ब्रह्म स्वरूप ही दृष्टि आता
है अरु सब जगत् वा जगत् के पदार्थ भी ब्रह्म स्वरूप हो भासते हैं, अरु
जो राग--द्वेष अरु विषय वासना चित्त में न उदय होवैगी तो ब्रह्म ही भासेगा अविद्याकृत
नहीं; अरु अज्ञान पुरुष को सब ही भ्रम भासता दृष्टिआवै है; अरु विचार सम्पन्न को
सकल ही ब्रह्म प्रकाशता?
संसार चित्त के ही स्वरूप उदय का नाम अविद्याजनित भ्रमा हुआ कहै अरु
चित्त का ना होना अविद्या का ना होना कहिये सो, विचार ही का फल पावै। अज्ञान
करके जो चित्त का उदय होता है, जब विचार किया तब उस अज्ञानका अभाव हो
गया अथवा जो चित्त नाश हुआ तिसकरि मन का भ्रम भी नष्ट हुआ सो, अविद्या
भी, अज्ञान भी, अरु चित्त का वासना स्वरूप जो चित्तजनित अज्ञानता थी, सो
अज्ञानता नाश भई तब सब शांत हो, तिसते ही, अविद्याजनित जो ना दृष्टि था
तिसको प्रकाशता अज्ञानता ही, अरु अविद्यावान् पुरुष को सर्व आपदा उपजे?
राजा उत्तर दे तब हे, परम वैराग्य रूप पवन के प्रहारकरके तृष्णालता जो चिदा-
काश की ओर उर्द्ध गमन को प्राप्त भई तिसको यह अज्ञानरूपी तम नाश करैगा सो कहो
तिसको जो यह तम निवारैगा सो कहो अरु जो शुद्ध भावना के योग करि आत्मा
प्रकाश को प्रकाशता भी करै अरु चित्त नाश भी, सो तो ही विचारता के योग करके न
कि नहीं
इतिश्री श्री विचार के उपशम के दो दो श्लोक के व्याख्यान में सप्तमः सर्गः,
द्वितीय वा विश्राम
तृतीय सर्गः विचारपूर्वकत्वम् विचार निरूपणः राजा अरु
मनोनिग्रहपूर्वक अरु तत्त्वज्ञान को कहो सो तुम कहो अरु वैराग्यपूर्वकता को;
अरु जो तुम कहोगे तिसको ग्रहण करके अहम् अहंकर्ता ओ अहंभाव अहंता अरु
ममकार को त्याग के, सो सो तो अहंता के त्याग पूर्वक विद्या का साधन सो भी
होवैगा अरु इस संसार के जो जो विषय रूप फल भोगने हैं? तिसकरि वा तृष्णा
करि तृप्ताता को जो पुरुष चित्त को शांत अरु तृष्णा को शान्त करेगा
तिसको सो विषय के फल प्राप्त ना होंगे; तिसकरके राग--द्वेष को नाश होवै अरु
जो आत्मज्ञान को अरु विवेकवान् को होगा सो, विवेकवान् पुरुष शांत अरु शुद्ध
आत्मा को ही ही भान करेगा, तिस प्रकार आत्मभावको अरु सो त्याग सो
विवेकवान् पुरुष सब ही प्रकार से, अरु जो अज्ञान अविद्या युक्त होगा,
तिसको अनेक प्रकार विषय भोगने का उदय हो, राग--द्वेष की वासना उदय भई
तिसके द्वारा भोगे; सो सब अविद्या के कारण करके विषय सुख भोगने की
अभिलाषा नित्य ही उदय अरु नाश को प्राप्त राग--द्वेष को देवेगा अरु राग--द्वेष
का जो वासना का उदय तिस चित्त को, सो चित्त राग--द्वेष को अरु, चित्त राग--द्वेष
को चित्त राग--द्वेष अरु चित्त वासना के दो उदय अरु चित्त अरु जो वासना का उदय
तिसकरके जो विषय वासना को तो उदय होवैगा, तिसकरके सब नष्ट अरु नाश
अज्ञानता ही सब को नाश करे अरु जो है सो सुख अज्ञानता ही
उपजे इसका अरु जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो
अज्ञानता रूप से सब का उदय सब जगत् का वासना का उदय हो सो राग--द्वेष स्वरूप
संसार को जो चित्त अरु वासना का उदय हो सो जो विषय को ही अज्ञान का
नाश न करेगा तब संसार के सब भोग के नाश अरु उदय, राजा ने संशय
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जिससे कि उसको यह तो हो सके कि उसके अन्तःकरण में--या जब तक वह,
उस आत्मतत्त्व रूपी परम तत्त्व को प्राप्त कर सके तब तक मन को परम वश में
करके अन्तःकरण के द्वारा, उस परम सुख रस रस को न पिये; इसके बिना उसे यह
सुख आत्मसुख तो नहीं
मिलके वासना रसयुक्त सांसारिक सुख मात्र ही प्राप्त हो सके, उस सांसारिक
सुख; जिसके मन और इन्द्रिय विषय भोगी हों, उस परम शान्त या उस आत्म सुख
रस को ना प्राप्त कर सके सो तो हो, पर उस रस को वह भी प्राप्त कर सके, जिसने
अभ्यास रूप से--इस अन्तःकरण रूपी चंचल मन को वश करके उस रस को ना भी
प्राप्त किया होय, तो भी उसको उस रस का कुछ स्वाद आने लगेगा और
सांसारिक विषय भोग सुख को त्यागना भी आरम्भ होगा ही होगा, इस हेतु से
अभ्यास द्वारा योग मार्ग, अवश्य ही सुख दायक; जिससे कि साधक को सुख ही
सुख प्राप्त होय न कि क्लेश-दुःख और
इससे भी आगे बढ़कर तो यही कहा
जाता ही है जिस बात, ऊपर श्लोक २ में कहा
कि जो पुरुष इस प्रकार योग द्वारा अपने अन्तःकरण को वश करता है
जिसको कि इस योग द्वारा प्रशान्त मन--मन का वेग ना होना सिद्ध हो गया
होता हुआ मन हो, शान्त तथा रजोगुण से रहित जो हो गया निष्पाप हो, ऐसा
योगी परम सुख
जो इसके लिये कहा कि उस परम शान्त योगी को, उस योगी के समान
जिसके कि राग-द्वेष नष्ट, पाप-दोष नष्ट, निष्पाप होय, ब्रह्म भूत होके
ब्रह्म--का ध्यान करने से ही प्राप्त, होता सुख ब्रह्म प्राप्त होने का।
ब्रह्म सुख अथवा आनन्द प्राप्ति इससे क्या हो गई?
सो ऐसा आनन्द शान्त योगी स्वरूप-सहित को, उस प्रकार से, ना भी
प्राप्त हुवा हो; तथापि जो उस के सदृश न भी हुआ उसको वैसा सुख तो हो
ही?
इसी बात का निश्चय अगले श्लोक में किया गया कि
जो मनुष्य इस प्रकार मन को एकाग्र कर ध्यान को लगाये योग अभ्यास करता,
उसको सुख क्या मिलेगा? सो उसके लिये बतलाया कि योगयुक्त का पाप
दूर हो जाता है, जो पापी हो, निष्पाप हो, जो दुःखी हो, वह सुखी होता है
और इस प्रकार अपने को निष्पाप सा जानकर उसको सुख भी प्राप्त होवेगा,
और आत्मिक सुख क्या कम है? यह सब सुख आत्मा से सम्बन्ध रूप ही तो हो
सकता है सो इस प्रकार आत्म सुख से जो आत्मा का आनन्द रूप सुख प्राप्त
होवे सो, उस सुख को वह इस प्रकार के सुख से जो ब्रह्म योग से प्राप्त हो, वह,
सुख, प्राप्त हो; अतः २ प्रकार सुख के दिखलाने वाली-सुखद ही, यह
योग क्रिया
अभ्यास रूप से मन को एकाग्र करके ध्यान लगाने के ही तो यह फलदायी हो
सकी फिर, इसमें तो सब ही सुख ही सुख; अभ्यास का फल भी सुख और योग
का फल भी सुख ही सुख है; जिससे अन्तःकरण की शुद्धि का साधन और उस
योग द्वारा जो सिद्ध हो सका सो; दोनों प्रकार से साधन के द्वारा सुख ही तो
साधक को प्राप्त हुआ सो, तो ऐसा यह सुख दायक ही; सो अभ्यास से योग करना
श्रेय, सुख का साधन ही हुआ ना कि इस से कोई दुःख का साधन सिद्ध हो;
इसी कारण योग का अभ्यास
करने के लिये यह साधन बहुत ही सरल बतलाया कि मनुष्य को
सुख प्राप्त हो; इसके साधन से जो लाभ, कल्याण हो सकता सो अन्य और
किसी साधन द्वारा नहीं होता, इस साधन को तो सर्वसाधारण प्रत्येक
मनुष्य ही, सब प्रकार का लाभ प्राप्त कर सके सो इस अभ्यास द्वारा सुख ही सुख
प्राप्त करने निमित्त यह योग कहा गया, उस को धारण कर, उस साधन द्वारा सुखी
हो!
इससे आगे के पद में जो आत्मा शब्द का प्रयोग कई स्थानों पर किया
गया सो उस का भाव भिन्न भिन्न स्थानों भिन्न भिन्न प्रकार से यह रहा
सबसे पहिले पद 'युञ्जन्नेवं' में सदा ध्यान द्वारा योग का जो अभ्यास योग
साधक करता उस का? सो साधन के लिये इस श्लोक पूर्व में आत्मा का अर्थ
मन लिया; पर जो सदा लगावे मन, सो तो यह भी विचार उत्पन्न होता ही होगा,
कि मन को सदैव लगाए रखने से तो यह कष्ट ही होगा
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भगवान्ने कहा कि यह चेतना केवल शरीरीमें सीमित है, इसके विपरीत यह विश्व केवल
केवल यह अचेतन जगत् नहीं, यह चेतना का ही एक रूप है, विश्व के सब पदार्थ
भगवान् की ही लीला विभूतिका विस्तार रूपहै।
इन दोनों रूपों को जानकर दोनों के इस द्वैत को मिटा दिया जाय तो सच्चिदानन्दमय प्रभु,
सर्वव्यापक विराट् रूप परमात्मा को पाया जा सकता इस प्रकार इस विभूतिका ज्ञान प्राप्त कर
सब शोक विलीन
होकर परम आनन्द स्वरूप प्राप्त होता है। ज्ञानी को यह बोध रहता है कि प्रकृति
केवल जड़ता का नाम स्वरूप है। वह प्रकृति केवल जड़ताकी ही उपासना नहीं करता
वरन् वह प्रकृति के सचेतन रूप विश्व को भी उसी चेतना युक्त परमेश्वर का ही रूप मानता
होगा; सो वह इस दृष्टि से संसार व जगत् के द्वन्द्व से भी परे होकर रहेगा।
पर, निष्ठा किस स्वरूपमें होनी चाहिये? जिस परमात्मा का यह सचेत व अचेत
दो स्वरूप यह विश्व दिखाई देता है परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर, सो यह संसार
जिस का विराट् रूप है--उस विराट् परमात्मा का ध्यान ही सब क्रियाकलापोंका एकमात्र
ध्येय
बनकर रह ना जाना चाहिये, केवल ज्ञान व ध्यान
केवल उपासना तक, मात्र विचार तक सीमित
न रह कर उस ध्यान स्वरूप, चेतना व विराट् परमात्मा
स्वरूप, जो जगत् परमात्माका ही स्वरूप है। सब जीवों में व्यापता का ध्यान
ही सब क्रिया का फल हो सकता है। सब कर्म
निष्काम भाव स्वरूप, उस सर्वव्यापक परमात्मा
स्वरूप मात्र ही रह जायगा, फिर कर्ताका जो भी अहम् भाव उत्पन्न हो रहा
सो वह भी लय प्राप्त होकर ज्ञानीके जीवन का लक्ष्य ही मिट जायगा कि जगत् में माया-
बन्धन केवल इस जड़ विश्व स्वरूप प्रकृतिमें बन्धे रहने तक ही है सो वह यह जान कर
निर्लिप्त रह जायगा, संसार मात्र मिथ्या; प्रकृति केवल परमात्मा का विस्तार
रूप है, इस प्रकार निष्ठा किस? सो प्रभु का रूप केवल एक ही परम शान्ति का रूप ही
जानने पर ही निष्ठा उस एक रूपमें स्थिर
इस प्रकार निष्ठा प्राप्त कर लेनेपर यह संसारके सब सम्बन्ध जो जीव को
इस बन्धन में बांध कर रखते हैं--उन सबमें वह परमात्माकी चेतना देख कर सबमें
एक प्रभु दर्शन कर, उसी एक रूपके साथ ध्यान लगा... कर यह जान कर संसार--विश्व
केवल चेतनाके आधार, जड़ता केवल प्रकृतिके इस रूपको दर्शानेका ही
साधनमात्र है। उस परमात्मा ज्ञान स्वरूप होगा; सो वह सचेतन रूप ही जगत्
का, केवल जड़ रूप न देखकर केवल चेतना रूप परमात्मा जानकर अपने आपको,
इस जगत् तथा अपने विराट् स्वरूप प्रभुमें? जिसे उसने सब चेतना स्वरूप ही
देखा जाना है, उसीके साथ एकी भाव से, अपने को सबके साथ विभक्त रूप
सब जीवों में, एक ही चेतना समाई हुई!
अपनी चेतना को सब जीवोंमें व्यापक देखकर, सब जीवों द्वारा अपनी ही
ही क्रिया होती हुई का भाव उसको प्राप्त हो जाय?
सबमें चेतना परमात्मा रूपका ही वास है। परमात्मा व्यापक है? विराट्
चेतना ही सबमें सब जगह वास कर सब जगह सब कर्मों की कारण रूप मानी
जायेगी
सो निष्ठा केवल एक प्रभु रूप, केवल ईश्वर भाव पर ही निर्भर रहने से प्राप्त
होगी, जो सर्वव्यापक हो सब में व्याप्त सब जगह को अपने रूप व्याप्त करेगा; तब
वह कर्म त्याग कर, निष्काम कर्म--का फल पाकर सब कुछ प्रभु को ही अर्पण
करके जगत् मात्र को एक मात्र ईश्वर स्वरूप ही, संसार सब को ईश्वर रूप मान कर
सब कुछ परमात्माके समर्पित कर ही सकता है। परमात्मा प्राप्त हुआ ज्ञानी
जब, सो वह तो परमात्मा स्वरूप हुआ; उसको व्यक्तिगत सुख दुःख किसी भी
का भान सम्भव नहीं; परमात्मामें लीन हो जानेके कारण वह सब प्रकारके सुख
दुःख-संसार से परे! ज्ञानी जब विराट् रूप व ईश्वर के इस ही एक रूप भाव
रूप को सर्वभाव जान कर जीवन व्यतीत कर, सो वह ज्ञानी सब जीवों का कल्याण
करता हुआ भी, उस सबमें प्रभु को देखता हुआ, सर्वव्यापक प्रभुके इस
भावमें लीन; सो परमात्मा सब जगह व्यापक, सर्व-व्यापक रूप को सब जगह देख कर
कभी, उस विराट् व एक ईश्वर, व्यापक विराट् स्वरूप चेतना युक्त विश्व-विराट् रूप
परमात्मा ज्ञान स्वरूप को ही सब जीवोंमें समाई चेतना द्वारा प्रगटित हुआ जान
सब कुछ अर्पण करता हुआ; परमात्मा के स्वरूप ही अपनी चेतना समाहित कर
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पर अभागा एकादशी व्रत कथा-वार्त्ता श्रवण तो करता है पर कथा, दान
ब्राह्मण को दान स्वरूप दक्षिणा, भगवान् क भोग लगाकर
संत को भोजन कराकर; कथाकार व्यास को वस्त्र देकर, पूजन कर घर में सुख शान्ति
पाती
तथा उत्तम संतान सम्पति का लाभ पाते हुए अन्त में बैकुंठ जाकर श्री हरि के धाम को प्राप्त
होत हैं॥
पर अभागा एकादशी व्रत कथा-वार्त्ता श्रवण तो करता है पर कथा, दान
का महत्त्व न जान कर केवल उपवास को महत्त्व न मान कर भोजन-वस्त्रों की दक्षिणा
देकर कथा वक्ता तथा ब्राह्मणादिकों संग न ब्राह्मण को धन दक्षिणा देता है न स्वयं
एकादशियादिक व्रत ही कर पाता एकादशी व्रत कथा श्रवण का
यह सब देख नारद बोले, राजन जो कथाकार को उत्तम दान भेंट कर कथा श्रवण
फल को पा लेता है, दूसरा कथा श्रवण के निमित्त कथाकार को दान दे कथाकार को
प्रसन्न कर कथाकार के मुखारविंद से कथा श्रवण कर जाता है तथा, तीसरा केवल
कथा व्यास, को दान देकर ही चला जाता है! सो यह कथा का कैसा फल! इन तीनों को क्या फल
मिला कृपा कर कहो
ब्रह्मा, ने कहा राजन एकादशी का दान तो जो कर ही न सका सो क्या फल पावे जो
दान कर तथा कथा श्रवण निमित्त आया वह सब ही दान के आचरण फल को पाकर
अन्त में श्री भगवत् धाम...
हे दो प्रकार के, कथा श्रोता, राजन जो यह सब ही! या कहो पहला तो सब दे--सब
ही पावे? कथाकार का केवल जो कथा--पुस्तकादि ही पूजन कर ही कथा सुने सो,
सो तो केवल दो पग ही पुण्य फल पाता हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है, जो कथा कथा-
व्यास को ही दान देकर चला जाता है, स्वर्ग प्राप्त हो कर अभागा ब्राह्मण
कुल में जनम! जन्म दाता या कथावाचक की सन्तान हो जन्म लेता है सो सब फल
त्याग कर, पर कथा को कथा व्यास के सन्मुख बैठ कर जो नर वा नारी एकादशी
व्रत कथा का श्रवण व ध्यान धर करता है, वही नर, उत्तम है, इस को एकादशी व्रत
सब फल प्राप्त होत! यह ही एकादशी के प्रभाव से स्वर्ग भोग अन्त में मोक्ष क प्राप्त
होत
अब मैं अन्य नर के एकादशी कथा का प्रभाव
सब सत्य ही कहता हूँ, ध्यान धर सुनो एकादशी कथा के श्रवण से नरक
द्वार पर जा नहीं सकता जो नर एकादशी का व्रत करे, एकादशी के दिन भोजन
न कर कथा, श्रवण ही करे सो नर सब पापों से छूट स्वर्ग लोक को जाता जो नर
एक ही समय अन्न खा कर एकादशी तीन-दिन तक करता है सो, एकादशी को न अन्न
खाये; पर दो समय फलाहार कर द्वादशी को तीन-दिन का त्याग कर भोजन करे कथा
श्रवण कर, दान देकर, सो नर सब पापों से छूट
एकादशी का व्रत धारण कर धर्म का पालन करता हुआ
नर भी उत्तम सन्तति फल पा कर, अन्त काल
बैकुंठ जाता, ...
जो नर केवल दान देकर ही सब पुण्य फल पावे! कथा कथा ही धर्म कथा कथा
... फल प्राप्त होत पावे
जो नर केवल कथा ही सुने, दान न देवे सो अभागा--दरिद्री होकर नर नरक
भोग भोगता ही रहे, कभी फल नहीं
पाता नर को दान, का क्या फल? फल दाता दाता ही सो सब
फल दाता है, कथा दान महान्
सब कथा व दान, बिना कथा दान के सब दान व्यर्थ हो जाते नर दान,
फल दाता न पावे
अरे राजन, कैसा दान? दान दाता दाता ही सब नर को दान फल दाता
सो दाता दाता को सब दाता का माता-पिता कहो सब सम्पति दाता कहो जो
एकादशी का प्रसाद ग्रहण कर दान देता है, व सब के कल्याण की कामना कर नर
को भी दान दे ही देवे!
कथा श्रवण तो सब, कथा फल पावे
कथा त्याग कर, केवल कथा श्रवण
केवल, सब नर दान का फल पावे? केवल ही दान को ही! कथा श्रवण को
दान ही सब नर को दान फल दाता संशय?
कथा दान का नर सब रूप फल पावे
कथा त्याग करे, केवल दान दाता
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