अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरम्परागत ज्ञानियों जैसा दम भर रहे; कार्यकारण व्यवस्था का साधन मात्र मानकर जो किसी वस्तु
तथा व्यक्ति विशेष अथवा घटना को ही श्रेय अथवा, पश्चाताप, प्रतिरोधक-दबाव का
कारणत्व ही मानते चले आ रहे/मानने वाले हैं/मान रहे/मान सकते हैं/उन सबको,
जिनने पद एवं पद को प्राप्त होने वाले द्रव्य तथा आचरण द्वारा शासित जन को देख कर,
यह सम्भव या प्राप्त किया अथवा समझ लिया कि पद ही समस्त प्रकार की समस्याओं का
निदान करने लगता है।
अरे भैया ना पद तथा जन बल ही सब कुछ कर लेता होगा! वास्तविक रूप
मात्र पद या जन बल द्वारा नहीं हो पा, शक्ति को प्राप्त किए बिना शासित या शासित समाज
क्या कभी सुखी तथा सुव्यवस्थित रह सका है? क्या संसारी जन की कभी तृष्णा शान्त
हुई? जहां तक मैंने देखा, जाना तथा सुना ज्ञान द्वारा शासित जन कभी आकुल
नहीं हो सकता तथा नहीं रह सकता जब तक कि वह पद या जन या धन के प्रभाव द्वारा
शासित मन को ही पद की व्यवस्था का प्रभावकारी साधन न मान बैठा हो/
मान ना बैठा समझता रहा हो; वस्तुतः ना केवल ज्ञान मात्र सब कुछ क्रिया--पद
व्यवस्था का संचालन कर रहा वास्तविकता स्वरूप में, अपितु क्रिया शक्ति
द्वारा सम्पन्न मन ही, अपनी क्रिया शक्ति को संयत मन के अधीन हो, सब प्रकार का
वैभव पा
कार्यरूप परिणत कर सब कुछ पा या जान सका या जानने का प्रयास कर ही सका
होगा या सब कुछ जान सके सब कुछ कर भी सकता हो, यह सब शक्ति सम्पन्न मन
तथा ज्ञान द्वारा सम्भव हुआ या किया जा सका? क्या कभी विचार मात्र से? यह
सब विचार द्वारा भी, सम्भव हो सका, तब ज्ञान का प्रभाव रूप हो ही सका होगा
ऐसा सब अनुभव भी, यह सब ज्ञानवान् या ज्ञान सम्पन्न सब प्रकार के वैभव प्राप्त
सब जन जन का आचरण रहा ही था/होगा/रहा सब जन का सम्बोधन रहा
होगा ही जिसे देख कर सब जन को भी तो सब जन का पद रूप हो ही सका ही
रहा होगा, यद्यपि
ज्ञान मात्र ज्ञेय-ज्ञेयक व्यवस्था तक सीमित या ज्ञेय-ज्ञेयक सम्बन्धी ज्ञान
व्यवस्था विशेष तक मात्र रह गया हो, ज्ञान द्वारा ही वास्तविक व्यवस्था रूपी
मर्यादा का पालन सब जन के पद द्वारा ही किया, पाया गया; केवल ज्ञान मात्र
का ध्यान सब जन को रहा? तब तो सब जन ज्ञानी ही--सब जन का तो ध्यान ही
रहा, सब जन ज्ञान के साथ आचरण सम्पन्न सब प्रकार जन बन सका, ना कि
मात्र पद ही! पद से ही ज्ञान मात्र बना ही रह सका था
यद्यपि सब प्रकार जन ज्ञान द्वारा ही, पद की पद से हीन जन को सब प्रकार का
अधिकार दे दिया
पर मात्र अधिकार मात्र पा कर, जो अधिकारी या सम्पन्न जन, ना कभी
ज्ञानवान् हो सकता ना सम्बोधन या कल्याणकारी अथवा पद द्वारा शासित या ज्ञान सम्पन्न हो
सकता था/हो-सका/हो-सकेगा/ न हो सका, जो सब जन केवल वास्तविक ज्ञानवान्
अथवा पद सम्पन्न होकर अपने अधिकार रूपी पद को ही सब कुछ अधिकार का रूप ही
मानने लग गए हों; परिणाम स्वरूप ज्ञान सम्बन्धी ना मन को वह जान सका
ना अन्य जन को ही, पर केवल, मात्र परम्परा का रूप ही चलाने लगा/लगा
दिया गया हो सकता था जिसके कारण ज्ञान का जो रूप था सो, ज्ञान रूप
ज्ञान रूप मात्र ही, सीमित होकर रह गया; ना ज्ञान रहा ही, ना ज्ञानवान् ही
केवल पद प्रतिष्ठा का रूप पाकर ही आचरण भी भ्रष्ट हुआ, जो सब प्रकार के
जन का या सबका आचरण रूप हो चला था, सो सब अज्ञान के वश होकर ही
सब को ज्ञान का ना सम्बोधन ही मिला तथा सब ने ज्ञान रूपी प्रकाश को ही,
ज्ञान ना समझ कर पद को ही अधिकार जनित या मानकर अपने मन को ही
ही एकमात्र व्यवस्था का संचालक मान कर सब कुछ को ही ज्ञान मान कर ही
रहा।
यद्यपि सब विकारवान् जन
ना सब जन का सम्मान या आदर मात्र सब प्रकार के समाज से पा
सके जन तथापि, सब कुछ सब जन केवल सम्पन्न तो अपने ज्ञान द्वारा किया ही;
मात्र विकारों, सब विकार रहित रूप को भगवान् का रूप मानकर ही
क्रिया--ज्ञान रूप ही देखा, जो क्रिया के साथ ही ज्ञान--रूप मन सम्पन्न हो
सब प्रकार का ज्ञेय-ज्ञेयक रूप को ज्ञेय-ज्ञेयक रूप से, पद रूप ज्ञान का रूप
मानकर न केवल न केवल, ज्ञान के रूप को मर्यादा का रूप ज्ञानकर ही अपना
तथा पर का कल्याण या उत्थान कर सब जन ज्ञानी हो सब कुछ मात्र ही जान
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