न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)

न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)
Nyayamanjari of Jayanta Bhatta Part 1
आचार्य जयन्त भट्ट (सम्पादक: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
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तत् , व्याप्तित्वे हि बुद्धीनां यौगपद्यं न निवर्त्तेत, अपि चायं"
Wait, why did I think 'अध्यापकं' before? Because the conjunct व्या looks a bit like ध्या, but it is definitely "अव्यापकं"!
Wait, in line 18, is there a double 'त' in निवर्तेत?
"निवर्त्तेत" - yes, there is a doubled त: निवर्त्तेत.
Line 19:
व्यवहार उक्तेऽपि क्वचिद्वचसि कश्चिदाह--नाहमेतदश्रौषमन्यत्र मे मनोऽभूत्-
Wait, let's verify line 19:
- व्यवहार (vyavahāra)
- उक्तेऽपि (ukte'pi)
- क्वचिद्वचसि (kvacidvacasi)
- कश्चिदाह-- (kaścidāha--)
- नाहमेतदश्रौषमन्यत्र (nāhametadaśrauṣamanyatra)
- मे (me)
- मनोऽभूत्- (mano'bhūt-)
All exact!
Line 20:
इति, तस्मान्न व्यापकं मनः ।
Matches!
Line 21:
प्रतिशरीरमेकं च तत् , अनेकत्वे पुनरपि ज्ञानयौगपद्यानपायात् ।
Matches!
Line 22:
क्रियावच्च तन्