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सर्वकोश
न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)

न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)

Nyayamanjari of Jayanta Bhatta Part 1

आचार्य जयन्त भट्ट (सम्पादक: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 654 में से

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पृष्ठ 482

तत् , व्याप्तित्वे हि बुद्धीनां यौगपद्यं न निवर्त्तेत, अपि चायं"
Wait, why did I think 'अध्यापकं' before? Because the conjunct व्या looks a bit like ध्या, but it is definitely "अव्यापकं"!
Wait, in line 18, is there a double 'त' in निवर्तेत?
"निवर्त्तेत" - yes, there is a doubled त: निवर्त्तेत.

Line 19:
व्यवहार उक्तेऽपि क्वचिद्वचसि कश्चिदाह--नाहमेतदश्रौषमन्यत्र मे मनोऽभूत्-
Wait, let's verify line 19:

  • व्यवहार (vyavahāra)
  • उक्तेऽपि (ukte'pi)
  • क्वचिद्वचसि (kvacidvacasi)
  • कश्चिदाह-- (kaścidāha--)
  • नाहमेतदश्रौषमन्यत्र (nāhametadaśrauṣamanyatra)
  • मे (me)
  • मनोऽभूत्- (mano'bhūt-)
    All exact!

Line 20:
इति, तस्मान्न व्यापकं मनः ।
Matches!

Line 21:
प्रतिशरीरमेकं च तत् , अनेकत्वे पुनरपि ज्ञानयौगपद्यानपायात् ।
Matches!

Line 22:
क्रियावच्च तन्