सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)

न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)

Nyayamanjari of Jayanta Bhatta Part 1

आचार्य जयन्त भट्ट (सम्पादक: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 321

कृत्" printed without 'र' (i.e. "उपसर्गवशाद्धातुर्थान्तरविलासकृत्") or intended as "उपसर्गवशाद्धात्वर्थान्तरविलासकृत्" or "उपसर्गवशाद्धातुरर्थान्तरविलासकृत्" happen all the time!
Wait, let's look at whether it could be "द्धात्वर्थान्तरविलासकृत्" or "द्धातुर्थान्तरविलासकृत्":
Wait, is there a typo in the book: "उपसर्गवशाद्धातुर्थान्तरविलासकृत्" ?
Wait, look at:
द्धा
तु
र्था
न्तर
विलासकृत्
Wait, look at line 18:
"नैष दोषः, अर्थान्तराभिधानसामर्थ्यापादनमेव धातोर्विदधदुपसर्गो विशेषणं भवितुमर्हति"
Look at line 18: "अर्थान्तराभिधान..."
And line 10: "धातोर्विचित्रार्थतामापादयन्तस्तद्विशेषणतया सम्बध्यन्ते, यथोक्तम् ,"
Then the verse:
"उपसर्गवशाद्धातु[र]र्थान्तरविलासकृत् ।"
Wait, if it's printed "उपसर्गवशाद्धातुर्थान्तरविलासकृत्" or "उपसर्गवशाद्धात्वर्थान्तरविलासकृत्" or "उपसर्गवशाद्ध