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सर्वकोश
न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)

न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)

Nyayamanjari of Jayanta Bhatta Part 1

आचार्य जयन्त भट्ट (सम्पादक: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 654 में से

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पृष्ठ 155

"ग्रामीण्यानुभवो" -> or "ग्रामीणस्यानुभवो" or "ग्राम्यस्यानुभवो"?
Let's look closely at line 20-21:
Line 20 ends with: "ग्रामी-"
Line 21 starts with: "ण्यानुभवो" or "णस्यानुभवो"?
Look at line 21:
First glyph: ण् (n) + य (ya) = ण्य? Or ण् (n) + य (ya) + स्य?
Wait! Look at line 22: "कथं ग्राम्यस्य सादृश्यग्रहणम्"
And line 20 has: "ग्रामी-"
Then line 21 has:
'ण' with something?
Wait! Look at the glyphs:
'ण' (ṇa)
'स्या' (syā)
'नु' (nu)
'भ' (bha)
'वो' (vo)
YES! Look at the ligature:
It has 'ण' then 'स्य' with 'ा' = 'स्यानुभवो'!
Wait, is the first letter 'ण'?
Yes, 'ण' (na). Then 'स्या' (sya with a-matra)!
Wait, why would it be "ग्रामी" + "णस्यानुभवो" = "ग्रामीणस्यानुभवो"!
Yes! "ग्रामीणस्य अनुभवो" = "ग्रामीणस्यानुभवो"!
Let'