सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

२६ भाषाटीका सहित
उतनेसे ही अर्थकी प्रतीति हो जानेसे दृष्टान्त नामवाला कोई पृथक् अवयव साधन
में नहीं है । इसलिये उसका लक्षण पृथक् नहीं कहा [ क्योंकि उतने से ही ] अर्थ
विदित हो जाता है ।
हेतोः सपक्ष एव सत्त्वमसपक्षाच्च सर्वतो व्यावृत्तौ रूपमुक्त-
मभेदेन पुनर्विशेषेण कार्यस्वभावयोर्जन्मत-
न्मात्रानुबन्धौ दर्शनीयावुक्तौ ।
क्योंकि हेतु का सपक्ष में ही रहना और सब विपक्षोंका उससे शून्य रहना ये
दोनों रूप कह दिये । विशेष अभेदसे कार्य जन्म [ ज्ञातव्य ] और स्वभाव का तन्मात्रा-
नुबन्ध दर्शनीय कह दिया ।
तच्च दर्शयता यत्र धूमस्तत्राग्निरसत्यग्नौ न क्वचिद् धूमो
यथा महानसेतरयोः ।
उसको दिखलाते हुए 'जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि होती है' । अग्नि के अभाव
में धूम भी नहीं होता । जैसे पाकशाला और तालाब में ।'
यत्र कृतकत्वं तत्रानित्यत्वमनित्यत्वाभावे कृतकत्वासंभवो
यथा घटाकाशयोरिति दर्शनीयम् ।
जहाँ कृतकत्व होता है वहाँ अनित्य होता है । अनित्यत्व के अभाव में कृतकत्व
असम्भव है । जैसे घट और आकाश में । यह सब देखना चाहिए ।
न ह्यन्यथा सपक्षविपक्षयोः सदसत्त्वे यथोक्त-
प्रकारे शक्ये दर्शयितुम् ।
तत्कार्यतानियमः कार्यलिङ्गस्य स्वभावलिङ्गस्य
च स्वभावेन व्याप्तिः ।
क्योंकि अन्यथा यथोक्तप्रकार के सपक्ष और विपक्षमें सत्त्व और असत्त्व और
कार्यलिङ्ग का तत्कार्यतानियम और स्वभावलिङ्ग की स्वभाव से व्याप्ति नहीं दिखलायी
जा सकती ।
अस्मिंश्चार्थे दर्शिते दर्शित एव दृष्टान्तो भवति ।
इस अर्थ के समझ जाने पर दृष्टान्त समझ में आ ही जाता है ।
एतावन्मात्ररूपत्वात्तस्येति ।
क्योंकि वह केवल उतना ही है ।
एतेनैव दृष्टान्तदोषा अपि निरस्ता भवन्ति ।
इससे ही दृष्टान्तदोषों का भी निराकरण हो जाता है ।
यथा-नित्यः शब्दोऽमूर्तत्वात् , कर्मवत्परमाणुवद् घटवदिति ।

न्यायबिन्दु २७
जैसे—शब्द नित्य है, क्योंकि वह कर्म, परमाणु और घटके समान अमूर्त है ।
साध्यसाधनधर्मोभयविकलास्तथा सन्दिग्धसाध्यधर्मादयश्च ।
साध्यधर्मविकल, साधनधर्मविकल, उभयविकल तथा सन्दिग्धसाध्यधर्म आदि
(सन्दिग्धसाधनधर्म तथा सन्दिग्धोभय) [दृष्टान्त दोष हैं]। (इनमें से कर्म
साध्यविकल, परमाणु साधनविकल और घट उभयविकल दृष्टान्त हैं।)
यथा रागादिमानयं वचनाद्रथ्यापुरुषवत् ।
जैसे—यह राग आदि से युक्त हैं, क्योंकि मार्गमें चलनेवाले पुरुषके समान
बोलता है (यह संदिग्धसाध्यधर्म का उदाहरण है)।
मरणधर्मोऽयं पुरुषो रागादिसत्त्वाद्रथ्यापुरुषवत् ।
यह पुरुष मरणधर्मवाला है, क्योंकि यह मार्ग में चलने वालों के समान
रागादिमान् है। (यह संदिग्धसाधनधर्म दृष्टान्त है।)
असर्वज्ञोऽयं रागादिमत्त्वाद्रथ्यापुरुषवदिति ।
यह असर्वज्ञ है क्योंकि यह रथ्यापुरुष (मार्ग में चलने वाले पुरुष) के समान
रागादिमान् है। (यह सन्दिग्धोभय दृष्टान्त है।)
अनन्वयोऽप्रदर्शितान्वयश्च ।
अनन्वय और अप्रदर्शितान्वय भी [दृष्टान्त दोष हैं।]
(जिस दृष्टान्तमें साध्य और साधनमें सम्भवता तो दिखलाई दे किन्तु वह
साध्यसे व्याप्त न हो वह अनन्वय है। जिस दृष्टान्त में अन्वय के होते हुए भी उसे
कहने वाले ने दिखलाया न हो उसे अप्रदर्शितान्वय कहते हैं।)
यथा यो वक्ता स रागादिमानिष्टपुरुषवत् ।
जैसे—जो वक्ता होता है वह इष्ट पुरुष के समान रागादिमान् होता है। (यह
अनन्वय का उदाहरण है।)
अनित्यः शब्दः कृतकत्वाद्घटवदिति ।
शब्द अनित्य है। क्योंकि वह घटके समान कृतक होता है। (यह अप्रदर्शि-
तान्वय का उदाहरण है।)
तथा विपरीतान्वयः ।
तथा विपरीतान्वय—
यदनित्यं तत्कृतकम् ।
जो अनित्य होता है वह कृतक होता है।
इति साधर्म्येण ।
यह साधर्म्य से [नौ दृष्टान्त कह दिए।]
वैधर्म्येणापि परमाणुवत्कर्मवदाकाशवदिति साध्याद्यव्यतिरेकिणः ।

२८ भाषाटीका सहित
वैधर्म्य से भी 'परमाणु, कर्म और आकाशके समान' ये साध्याव्यतिरेकि आदि
दृष्टान्त दोषों के उदाहरण हैं ।
(इसमें परमाणु साध्याव्यतिरेकि, कर्म साधनाव्यतिरेकि और आकाश उभया-
व्यतिरेकि दृष्टान्त हैं ।)
तथा संदिग्धसाध्यव्यतिरेकादयः ।
तथा संदिग्धसाध्यव्यतिरेक आदि—
यथाऽसर्वज्ञाः कपिलादयोऽनाप्ता वा । अविद्यमानसर्वज्ञताप्त-
तालिङ्गभूतप्रमाणातिशयशासनत्वादिति ।
जैसे—कपिल आदि असर्वज्ञ अथवा अनाप्त हैं, क्योंकि उनमें सर्वज्ञता का
लिङ्गभूत प्रमाणातिशयशासन नहीं है ।
अत्र वैधर्म्योदाहरणं यः सर्वज्ञ आप्तो वा स ज्योति-
र्ज्ञानादिकमुपदिष्टवान् ।
यद्यथा-ऋषभवर्धमानादिरिति ।
इस प्रमाणमें वैधर्म्य उदाहरण—
जो सर्वज्ञ या आप्त होता है वह ज्योतिर्ज्ञान आदि का उपदेश देता है । जैसे—
ऋषभ और वर्धमान आदि [ जैन तीर्थंकर । ]
तत्रासर्वज्ञतानाप्ततयोः साध्यधर्मयोः संदिग्धो व्यतिरेकः ।
क्योंकि साध्यधर्म असर्वज्ञता और अनाप्तता में व्यतिरेक सन्दिग्ध है ।
संदिग्धसाधनव्यतिरेकः ।
यथा—न त्रयीविदा ब्राह्मणेन ग्राह्यवचनः कश्चि-
त्पुरुषो रागादिमत्त्वादिति ।
सन्दिग्धसाधन व्यतिरेक—
कोई पुरुष त्रयीवित् (जो ऋक्, यजुः और साम इन तीनों वेदों को जानता है )
ब्राह्मणसे ग्राह्यवचनवाला (जिसका वचन ग्रहण किये जाने योग्य हो) नहीं हैं।
क्योंकि पुरुष राग आदि से युक्त होता है ।
अत्र वैधर्म्योदाहरणम् ।
ये ग्राह्यवचना न ते रागादिमन्तस्तद्यथा गौतमादयो धर्मशास्त्राणां
प्रणेतार इति गौतमादिभ्यो रागादिमत्त्वस्य साधनधर्मस्य व्यावृत्तिः।
उसमें वैधर्म्योदाहरण—
जो ग्राह्यवचन वाले होते हैं । वह रागादिमान् नहीं होते । जैसे—गौतम आदि
१. पी० सं० में 'सर्वज्ञाः' पाठ है, जो अशुद्ध है ।

न्यायबिन्दु २६
धर्मशास्त्रोंके बनानेवाले। इस प्रकार गौतम आदिसे रागादिमत्त्व साधनधर्म की
व्यावृत्ति की।
संदिग्धासंदिग्धोभयव्यतिरेकः ।
यथाऽवीतरागाः कपिलादयः परिग्रहाग्रहयोगादिति ।
संदिग्धासंदिग्धोभयव्यतिरेक—
जैसे—कपिल आदि वीतराग नहीं है; क्योंकि उनमें परिग्रह और आग्रह है।
अत्र वैधर्म्योदाहरणम् ।
यो वीतरागो न तस्य परिग्रहाग्रहौ यथा ऋषभादेरिति ।
ऋषभादेरवीतरागत्वपरिग्रहाग्रहयोगयोः साध्यसाधनधर्मयोः
संदिग्धो व्यतिरेकः ।
इसमें वैधर्म्योदारण—
जो वीतराग होता है उसके परिग्रह और आग्रह नहीं होता। जैसे—ऋषभ आदि।
ऋषभ आदि के साध्यधर्म अवीतरागत्व और साधनधर्म परिग्रह और आग्रहके योगमें
व्यतिरेक संदिग्ध है।
अव्यतिरेको यथाऽवीतरागो वक्तृत्वात् ।
अव्यतिरेक—
वक्ता होनेसे वीतराग नहीं है।
वैधर्म्योदाहरणं यत्र वीतरागत्वं नास्ति स वक्ता । यथोपलखण्ड
इति । यद्यप्युपलखण्डादुभयं व्यावृत्तया सर्वो वीतरागो न
वक्तेति व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेरव्यतिरेकः ।
वैधर्म्योदाहरण—
जिसमें वीतरागता होती है वह वक्ता नहीं होता। जैसे—पाषाणखण्ड। यद्यपि
पाषाणखण्डसे दोनों की व्यावृत्ति हो जानेसे 'सभी वीतराग वक्ता नहीं होते' इस व्याप्तिसे
व्यतिरेकके सिद्ध न होनेसे अव्यतिरेक है।
अप्रदर्शितव्यतिरेको यथा—अनित्यः शब्दः कृतकत्वादाकाशवदिति।
अप्रदर्शितव्यतिरेक—
जैसे—शब्द अनित्य है; क्योंकि वह आकाशके समान कृतक है।
वैधर्म्येणापि विपरीतव्यतिरेको यथा यदकृतकं तन्नित्यं भवतीति ।
वैधर्म्यसे भी विपरीतव्यतिरेक—
जो कृतक नहीं होता वह नित्य होता है।
न ह्येभिर्दृष्टान्ताभासै र्हेतोः सामान्यलक्षणं सपक्ष एव सत्त्वं विपक्षे

३० भाषाटीका सहित
च सर्वत्रासत्त्वमेव निश्चयेन शक्यं दर्शयितुं विशेषलक्षणं वा ।
इन दृष्टान्ताभासों से हेतुका सामान्यलक्षण, सपक्षमें ही रहना और विपक्षमें सर्वत्र
अभाव अथवा विशेषलक्षणको निश्चय रूपसे दिखला ही नहीं सकते ।
तदर्थापत्त्यैषां निरासो वेदितव्यः ।
अत एव उनका निराकरण अर्थापत्ति ( सामर्थ्य ) से ही जान लेना चाहिये ।
दूषणं न्यूनतायुक्तिः ।
न्यूनता का कहना दूषण है ।
ये पूर्वं न्यूनतादयः साधनदोषा उक्तास्तेषामुद्भावनं दूषणम् ।
जो पहिले न्यूनता आदि साधनदोष कहे हैं उनका कहना दूषण है ।
तेन परेष्टार्थसिद्धिप्रतिबन्धात् ।
क्योंकि उससे दूसरेके इष्ट अर्थ की सिद्धिमें रुकावट होती है ।
दूषणाभासास्तु जातयः ।
दूषणाभास जातियाँ हैं ।
अभूतदोषोद्भावनानि जात्युत्तराणीति ।
अभूत दोषका प्रकट करना जात्युत्तर है ।
इति तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
न्यायबिन्दुः समाप्तः ।
इति तृतीय परिच्छेद समाप्त ।
न्यायविन्दु समाप्त ।
१. मुद्रित पुस्तक में 'अनुभूत०' पाठ है । किन्तु टीका से हमारे ही पाठ की पुष्टि होती है ।
इसके अतिरिक्त पहिले पाठ से अर्थ भी ठीक नहीं बैठता ।

इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (Text) अंकित नहीं है; यह एक कोरा पृष्ठ (Blank Page) है।

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है। यह पुस्तक का एक रिक्त पृष्ठ/जिल्द (blank page/cover) है।