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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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    तृतीयपरिच्छेदः ५६
    यतश्च साधनं साध्यधर्मप्रतिबद्धं तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यां प्रतिपत्तव्यं
    द्वयोरपि प्रयोगयोस्तस्मात्पक्षोऽवश्यमेव न निर्देश्यः ।
    यत्साधनं साध्यनियतं प्रतीतन्तत एव साध्यधर्मिणि दृष्ट्वा साध्य- (Wait, "प्रतीतं तत एव" or "प्रतीतन्तत एव"? In L4: "प्रतीतं तत एव" - let's check spacing: "प्रतीतं तत एव".)
    प्रतीतिरतो न किंचित्साध्यनिर्देशेनेत्येवमर्थमनुपलब्धिप्रयोगे दर्शयति ।
    यस्मात्साधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं
    सन्नोपलभ्यते सोऽसद्व्य