न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें१९. सू०] प्रमेयप्रकरणम् ३३
यत्र मिथ्याज्ञानं तत्र रागद्वेषाविति । प्रत्यात्मवेदनीया हीमे दोषाः कस्माल्लक्षणतो
निर्दिश्यन्त इति ? कर्मलक्षणाः खलु रक्तद्विष्टमूढाः । रक्तो हि तत्कर्म कुरुते येन
कर्मणा सुखं दुःखं वा लभते; तथा द्विष्टः, तथा मूढ इति ।
‘दोषा रागद्वेषमोहाः’–इत्युच्यमाने बहु नोक्तं भवतीति ॥ १८ ॥
( झ ) प्रेत्यभावलक्षणम्
पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ॥ १९ ॥
उत्पन्नस्य क्वचित्सत्त्वनिकाये मृत्वा या पुनरुत्पत्तिः स प्रेत्यभावः । उत्पन्नस्य
= सम्बद्धस्य । सम्बन्धस्तु देहेन्द्रियमनोबुद्धिवेदनाभिः । पुनरुत्पत्तिः = पुनर्देहा-
दिभिः सम्बन्धः । पुनरित्यभ्यासाभिधानम्, यत्र क्वचित्प्राणभृन्निकाये वर्तमानः
पूर्वोपात्तान्देहादीन् जहाति तत्प्रैति, यत् तत्रान्यत्र वा देहादीनन्यानुपादत्ते
तद्भवति । प्रेत्यभावः = मृत्वा पुनर्जन्म ।
सोऽयं जन्ममरणप्रबन्धाभ्यासोऽनादिरपवर्गान्तः प्रेत्यभावो वेदितव्य
इति ॥ १९ ॥
साधारणजनों द्वारा हमेशा ही इन दोषों का अनुभव करते रहने से ये लक्षण बिना
बताये भी जाने जा सकते हैं, पुनः इनका पृथक् लक्षण करने की क्या आवश्यकता ? उन
कर्मों के कारण ही पुरुष रागी, द्वेषी तथा मूढ होते हैं; रागी पुरुष वही कर्म करता है,
जिससे उसे सुख या दुःख मिलता है, इसी तरह द्वेषी तथा मोही पुरुष के विषय में
समझना चाहिए; तात्पर्य यह निकला कि द्वेष प्रवृत्ति के कारण (जनक) हैं, यह ‘जनकत्व’
दिखाने के लिये ऐसा लक्षण किया गया है ।
‘राग द्वेष मोह दोष हैं’—ऐसा कहने पर इनकी गणना-मात्र होती, इनका लक्षण
नहीं होता, अतः ‘प्रवर्तनालक्षणा दोषाः’—ऐसा ही सूत्र पढ़ा गया ॥ १८ ॥
पुनः उत्पन्न होना (मर कर जन्म लेना) प्रेत्यभाव है ॥ १९ ॥
उत्पन्न हुए प्राणी का मरकर पुनः जन्म लेना प्रेत्यभाव कहलाता है । उत्पन्न का
अर्थ है ‘सम्बद्ध’ । किस से सम्बन्ध ? देह, इन्द्रिय, मन बुद्धि, वेदना से । इस तरह पुन-
रुत्पत्ति से मतलब है आत्मा का देहादि से सम्बन्ध ( क्योंकि आत्मा के नित्य होने से
उसमें उत्पाद या मरण नहीं होता, अतः ‘सम्बन्ध’ कहा गया है) । ‘पुनः’ शब्द से अभ्यास
( बार बार होना ) में तात्पर्य है । जहाँ कहीं प्राणसंयुक्त शरीर में रहते हुए पूर्वोपात्त
देहादि को छोड़ना—‘प्रैति’ (मर जाता है) कहलाता है, तथा वहाँ से अन्यत्र दूसरे देहा-
दिक का ग्रहण कर (सम्बन्ध जोड़) लेता हुआ—‘भवति’ ( जन्म लेता है ) । इन दोनों
शब्दों के संयोग से व्युत्पन्न ‘प्रेत्यभाव’ का अर्थ है—‘मर कर फिर जन्म लेना’ ।
इस जन्म-मरण की परम्परा का पुनः पुनः होना अनादि है, अपवर्ग जब होगा तभी
इसका अन्त होगा—यह इस प्रेत्यभाव के विषय में समझ लेना चाहिये ॥ १९ ॥
न्या० द० : ३