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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १ . अ० १ . आ०
युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् ॥ १६ ॥
अनिन्द्रियनिमित्ताः स्मृत्यादयः करणान्तरनिमित्ता भवितुमर्हन्तीति ।
युगपच्च खलु घ्राणादीनां गन्धादीनां च सन्निकर्षेषु सत्सु युगपज्ज्ञानानि
नोत्पद्यन्ते, तेनानुमीयते—अस्ति तत्तदिन्द्रियसंयोगि सहकारि निमित्तान्तरम-
व्यापि, यस्यासन्निधेर्नोत्पद्यते ज्ञानम्, सन्निधेश्चोत्पद्यत इति । मनःसंयोगानपे-
क्षस्य हीन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ज्ञानहेतुत्वे युगपदुत्पद्येरन् ज्ञानानीति ॥ १६ ॥
(छ) प्रवृत्तिलक्षणम्
क्रमप्राप्ता तु—
प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ॥ १७ ॥ उद्योग
मनोऽत्र बुद्धिरित्यभिप्रेतम्, बुध्यतेऽनेनेति बुद्धिः । सोऽयमारम्भः—शरीरेण
वाचा मनसा च पुण्यः पापश्च दशविधः । तदेतत्कृतभाष्यं द्वितीयसूत्र इति ॥१७॥
(ज) दोषलक्षणम्
प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः ॥ १८ ॥
प्रवर्त्तना—प्रवृत्तिहेतुत्वम्, ज्ञातारं हि रागादयः प्रवर्त्तयन्ति पुण्ये पापे वा ।
मन को अतिरिक्त प्रमेय मानने से ही युगपद् ज्ञान बन पायेगा ॥ १६ ॥
बाह्येन्द्रियां स्मृत्यादिक की निमित्त नहीं बन सकतीं, अतः कोई न कोई अन्य कारण
उनका निमित्त मानना पड़ेगा; दूसरे, घ्राणादि तथा गन्धादि का युगपत् सन्निकर्ष होने
पर सभी ज्ञान एक साथ उत्पन्न नहीं होंगे, अतः यह अनुमान होता है कि अवश्य कोई
अन्य तदिन्द्रिय-संयोगी, सहकारी, अव्यापी निमित्त है जिसकी सन्निधि (सामीप्य) के बिना
ज्ञान उत्पन्न नहीं हो पाता, तथा सन्निधि होने पर उत्पन्न हो जाता है । यह अनुमान ही
मन की सत्ता में हेतु है । दूसरी बात यह भी है कि यदि बाह्येन्द्रियों के साथ मनःसन्निकर्ष
की अपेक्षा न रखेंगे तो अनेक ज्ञान एक साथ उत्पन्न होने लग जायेंगे ॥ १६ ॥
क्रमप्राप्त (प्रवृत्ति का लक्षण कर रहे हैं)—
वाणी, बुद्धि (मन), शरीर से किये जाने वाले कार्य प्रवृत्ति कहलाते हैं ॥ १७ ॥
सूत्र में 'बुद्धि' शब्द से मन अभिप्रेत है 'जिससे जाना जाये' वह बुद्धि (अर्थात्
मन) है ।
शरीर वाणी मन से, पुण्य तथा पाप रूप में कार्य दश प्रकार का होता है । इसका
विशद वर्णन पीछे द्वितीय सूत्र (दुःखजन्मप्रवृत्ति.........) में कर चुके हैं ॥ १७ ॥
प्रवर्त्तना ही दोष हैं ॥ १८ ॥
प्रवर्त्तना = प्रवृत्ति के कारण (हेतु) दोष हैं । रागादि दोष ज्ञाता को पुण्य या पाप
में प्रवृत्त करते हैं । जहाँ मिथ्याज्ञान होगा वहीं रागादि दोष होंगे ।
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