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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 345

२२. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२७
आकाशासर्वंगतत्वं वा ? ॥ १९ ॥
अथैतन्नेष्यते—परमाणोरन्तर्नास्त्याकाशमिति असर्वंगतत्वं प्रसज्यते इति ?
अन्तर्बहिश्च कार्यद्रव्यस्य कारणान्तरवचनादकार्ये तदभावः ॥ २० ॥
अन्तरिति पिहितं कारणान्तरैः कारणमुच्यते । बहिरिति च व्यवधायक-
मव्यवहितं कारणमेवोच्यते । तदेतत् कार्यद्रव्यस्य सम्भवति; नाणोरकार्यत्वात् ।
अकार्ये हि परमाणौवन्तर्बहिरित्यस्याभावः । यत्र चास्य भावोऽणुकार्यं तन्न
परमाणुः, यतो हि नाल्पतरमस्ति स परमाणुरिति ॥ २० ॥
शब्दसंयोगविभवाच्च सर्वंगतम् ॥ २१ ॥
यत्र क्वचिदुत्पन्नाः शब्दा विभवन्त्याकाशे तदाश्रया भवन्ति, मनोभिः पर-
माणुभिस्तत्कार्यैश्च संयोगा विभवन्त्याकाशे, नासंयुक्तमाकाशेन किञ्चिन्मूर्त्तं-
द्रव्यमुपलभ्यते, तस्मान्नासर्वंगतमिति ॥ २१ ॥
अव्यूहाविष्टम्भविभुत्वानि चाकाशधर्माः ॥ २२ ॥
या फिर 'आकाश सर्वंगत है' यह अपना सिद्धान्त छोड़ना पड़ेगा ? ॥ १९ ॥
यदि परमाणु में आकाश नहीं मानते हो तो आप ( नैयायिक ) का 'आकाश सर्वंगत
हैं' यह सिद्धान्त खण्डित हो जायेगा ? ॥ १९ ॥
अवयवाभिधायक 'अन्तर्' तथा 'बहिर्' शब्द कार्यद्रव्य ( अवयवी ) के कारण-
विशेष को ही बतलाते हैं, अतः अकार्यं होने से ( अनवयवी ) परमाणु के वे दोनों
सम्भव नहीं हो सकते ॥ २० ॥
'अन्तर्' अर्थात् पिहित प्रदेश जो घट के अन्दर उसके बाह्य अवयवों से ढका हुआ
हो, इसी तरह 'बहिर्' वह कहलाता है जो घट के अन्दर के अवयवों को ढका रखे ।
'अन्तर्' यह कारणान्तर से कारण का बोधन कर रहा है तथा बहिर्' यह स्वयं कारण
है । ये दोनों शब्द कार्यद्रव्य के बोध में सम्भव हो सकते हैं, परन्तु परमाणु के नहीं, क्योंकि
वह अकार्यं है । अकार्य ( निरवयव ) परमाणु में 'अन्तर्' 'बहिर्' क्या बनेंगे ! जिसके ये
होते हैं वह अणु-कार्य है, उसे परमाणु नहीं कहते । जैसा कि हम अभी पीछे कह आये हैं
कि परमाणु उसे कहते हैं जिसका कोई अन्य लघुतर विभाग न किया जा सके ॥ २० ॥
हमारा आकाश का सर्वंगतत्व शब्दसंयोग के सार्वत्रिक होने से उपपन्न हो
जाता है ॥ २१ ॥
जहाँ कहीं उत्पन्न शब्द वर्तमान होते हैं वहाँ वे आकाश में रहते ही हैं क्योंकि वे
आकाशाश्रित हैं । तथा मन, परमाणु और कार्य-द्रव्यों के संयोग आकाश में आश्रय पाते
हैं । ऐसा कोई मूर्त द्रव्य नहीं जो आकाश से असंयुक्त हो । अतः यह मानना ही पड़ेगा
कि आकाश असर्वगत नहीं है ॥ २१ ॥
अव्यूह ( मिश्रित द्रव्य का अपरावर्तन ), अविष्टम्भ ( अन्य देश में गत्यभाव )
तथा विभुत्व—ये आकाश के धर्म हैं ॥ २२ ॥