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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 344

३२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ०
माणोर्निवर्तते न सर्वप्रलयाय कल्पते । निरवयवत्वं खलु परमाणोर्विभागैरल्पतर-
प्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्रावस्थानात् । लोष्टस्य खलु प्रविभज्यमानावयवस्या-
ल्पतरमल्पतममुत्तरमुत्तरं भवति । स चायमल्पतरप्रसङ्गो यस्मान्नाल्पतरमस्ति यः
परमोऽल्पस्तत्र निवर्त्तते, यतश्च नाल्पीयोऽस्ति तं परमाणुं प्रचक्ष्महे इति ॥१६॥
परं वा त्रुटेः १ ॥ १७ ॥
अवयवविभागस्यानवस्थानाद् द्रव्याणामसंख्येयत्वात् त्रुटित्वनिवृत्तिरिति ॥१७
औपोद्धातिकं निरवयवप्रकरणम् [ १८-२५ ]
अथेदानीमानुपलम्भिकः सर्वं नास्तीति मन्यमान आह—
आकाशव्यतिभेदात् तदनुपपत्तिः ॥ १८ ॥
तस्याणोर्निरवयवस्य नित्यस्यानुपपत्तिः । कस्मात् ? आकाशव्यतिभेदात् ।
अन्तर्बहिश्चाणुराकाशेन समाविष्टो व्यतिभिन्नो व्यतिभेदात् सावयवः; सावयव-
त्वादनित्य इति ? ॥ १८ ॥
निरवयव होने से परमाणु में यह सिद्धान्त लागू नहीं होता, अतः सर्वप्रलय की कल्पना
नहीं हो सकती । निरवय से तात्पर्य है कि छोटे-से छोटा विभाग करने पर उससे छोटा
कोई विभाग न हो पाये । परमाणु की यही स्थिति है, इसका कोई विभाग नहीं हो
पाता । जैसे ढेले को जब हम खण्डशः विभक्त करते हैं तो उसका अल्प से अल्प या बड़े
से बड़ा विभाग हो सकता है, यह विभाग परमाणु में प्रसक्त नहीं होता । अर्थात् यह
विभागवाली बात जहाँ जाकर रुक जाती है जिससे कोई अल्पतर विभाग न हो, यों जो
स्वयं सबसे छोटा हो । जिससे कोई अल्पतर नहीं है उसे ही हम परमाणु कहते हैं, वह
निरवयव है ॥ १६ ॥
त्रसरेणु से परे अन्तिम (सबसे लघु विभाग) है ॥ १७ ॥
अवयवविभाग की कोई सीमा न मानोगे तो अवयवपरम्परा में द्रव्यों के असंख्य
होने से त्रसरेणु का 'त्रसरेणु' यह नाम व्यर्थ हो जायेगा । क्योंकि उसमें भी अनन्त
विभागों की कल्पना होती चलेगी, उसकी विरति कहाँ होगी ! ॥ १७ ॥
अब शून्यवादी 'सव कुछ नहीं हैं' मानता हुआ कहता है—
अणु आकाश से अन्तर्भिद्यमान होने के कारण वह निरवयव नहीं है, अतएव नित्य
नहीं माना जा सकता ? ॥ १८ ॥
वह अणु नित्य, निरवयव नहीं हो सकता; क्योंकि वह भी आकाश से संयुक्त होने
के कारण अन्तर्भिद्यमान है । अणु भीतर और बाहर देशभेद से आकाश से व्याप्त है,
इस आकाशव्याप्ति से उसमें भी अवयव उपपन्न हो सकता है । यदि वह सावयव सिद्ध
हो गया तो उसमें नित्यता कैसी ? ॥ १८ ॥
१. त्रुटिः = त्रसरेणुरिति तात्पर्यकृतः । द्व्यणुक एवेत्यन्ये । जालसूर्यमरीचिस्थं
त्रसरेणुरजः स्मृतम् ।