न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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द्रव्याणां गुणानां वाऽनेकविधविकल्पो निमित्तनैमित्तिकभावे तुल्यजातीयानां
दृष्ट इति ॥ ९ ॥
प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् [ १०-१३ ]
दोषानन्तरं प्रेत्यभावः।
तस्यासिद्धिः, आत्मनो नित्यत्वात्। न खलु नित्यं किञ्चिज्जायते म्रियते
वा इति जन्ममरणयोर्नित्यत्वादात्मनोऽनुपपत्तिः, उभयं च प्रेत्यभाव इति ?
तत्रायं सिद्धानुवादः—
आत्मनित्यत्वे प्रेत्यभावसिद्धिः ॥ १० ॥
नित्योऽयमात्मा प्रैति—पूर्वशरीरं जहाति, म्रियते इति; प्रेत्य च पूर्वशरीरं
हित्वा भवति = जायते, शरीरान्तमुपादत्त इति। तच्चैतदुभयम् 'पुनरुत्पत्तिः
प्रेत्यभावः' ( १. १. १९ ) इत्यत्रोक्तम्—'पूर्वशरीरं हित्वा शरीरान्तरोपादानं
प्रेत्यभावः' इति। तच्चैतन्नित्यत्वे सम्भवतीति।
यस्य तु सत्त्वोत्पादः सत्त्वनिरोधः प्रेत्यभावः, तस्य कृतहानमकृताभ्यागम श्च
दोषः। उच्छेदहेतुवादे ऋष्युपदेशाश्चानर्थका इति ॥ १० ॥
तुल्यजातीय द्रव्यों तथा गुणों के पारस्परिक निमित्त-नैमित्तिक भाव में अनेक तरह
का विकल्प देखा जाता है। अतः निमित्तनैमित्तिकभाव से मोह को दोष न मानना युक्त
नहीं ॥ ९ ॥
दोष के बाद क्रमोपात्त प्रेत्यभाव की परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है—
शङ्का—आत्मा के नित्य होने से प्रेत्यभाव नहीं बनता; क्योंकि जो नित्य है उसका
न जन्म होता है न मरण। आत्मा के नित्य होने से उसमें जन्म-मरणरूप प्रेत्यभाव की
उत्पत्ति नहीं बनती ?
इसका सिद्धान्तवर्णन यह है—
आत्मा के नित्य होने पर भी प्रेत्यभाव सिद्ध है ॥ १० ॥
यह नित्य आत्मा प्रयाण करता है अर्थात् पूर्व शरीर को छोड़ देता है ( मर जाता
है )। प्रयाण करके पूर्व शरीर को छोड़कर पुनः होता है, उत्पन्न होता है, शरीरान्तर
को ग्रहण करता है। ये दोनों बातें—'पुनरुत्पत्ति प्रेत्यभाव कहलाती हैं' ( १.१.१९ )
इस सूत्र में कह आये हैं कि पूर्व शरीर को छोड़ कर शरीरान्तर का ग्रहण करना 'प्रेत्य-
भाव' कहलाता है। यह बात आत्मा को नित्य मानने पर ही बन पाती है।
जो यह मानता है कि सत्त्व ( शरीर ) का नितान्त उत्पाद तथा नितान्त नाश
प्रेत्यभाव' है, उसके मत में कृतहान तथा अकृताभ्यागम दोष होने लगेंगे। इस उच्छेद-
वाद में धर्मशास्त्रोक्त विधि-निषेधवाक्यों की क्या आवश्यकता रह जायगी ! जब उस
सत्त्व का नितान्त नाश ही होना है और वह होना निश्चित है, तो वह सुकर्म तथा
धर्माचरण के लिए क्यों प्रयास करेगा ! ॥ १० ॥