न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें१. सू० ] दोषत्रैराश्यप्रकरणम् २७७
नीयाः सङ्कल्पा रागहेतवः, कोपनीयाः सङ्कल्पा द्वेषहेतवः, उभये च सङ्कल्पा
न मिथ्याप्रतिपत्तिलक्षणत्वान्मोहादन्ये, ताविमौ मोहयोनी रागद्वेषाविति ।
तत्त्वज्ञानाच्च मोहनि वृत्तौ रागद्वेषानुत्पत्तिरित्येकप्रत्यनीकाभावोपपत्तिः ।
एवं च कृत्वा तत्त्वज्ञानाद् 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये
तदनन्तराभावादपवर्गः' ( १. १.. २ ) इति व्याख्यातमिति ॥ ६ ॥
प्राप्तस्तर्हि—
निमित्तनैमित्तिकभावादर्थान्तरभावो दोषेभ्यः ? ॥ ७ ॥
अन्यद्धि निमित्तम्, अन्यच्च नैमित्तिकमिति दोषनिमित्तत्वाददोषो मोह
इति ? ॥ ७ ॥
न; दोषलक्षणावरोधान्मोहस्य ॥ ८ ॥
'प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः' ( १. १. १८ ) इत्यनेन दोषलक्षणेणावरुध्यते
दोषेषु मोह इति ॥ ८ ॥
निमित्तनैमित्तिकोपपत्तेश्च तुल्यजातीयानामप्रतिषेधः ॥ ९ ॥
की उत्पत्ति हो जाती है । विषयों में रागविषयक सङ्कल्प रागहेतु हैं, कोपविषयक संकल्प
द्वेष हेतु हैं । ये दोनों ही प्रकार के संकल्प मिथ्याज्ञानरूप होने से वस्तुतः मोह से
अतिरिक्त नहीं हैं, अतः मोह के कारण ही ये रागद्वेष होते हैं । तत्त्वज्ञान से मोह
निवृत्त होने पर रागद्वेष भी नहीं होते —यों एकविरोधिभाव भी बन जाता है ।
इसी अर्थ का समर्थक पूर्वसूत्र—तत्त्वज्ञान से 'दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या
ज्ञानों में से उत्तरोत्तर के नष्ट हो जाने पर उससे पीछे वाले के न होने से अपवर्ग हो
जाता है' ( १. १. २) है, जिसकी विस्तृत व्याख्या पीछे यथास्थान की जा चुकी है ॥६॥
तब तो मोह का—
निमित्त-नैमित्तिकभाव होने के कारण दोषों से अर्थान्तरत्व ॥ ७ ॥
प्राप्त हुआ ?
'कारण कार्य से भिन्न होता है' यह सभी मानते हैं । इस तरह मोह यदि दोषों का
निमित्त कारण है तो वह उनसे भिन्न होगा, तब मोह में दोषत्व कैसे रहेगा ? ॥ ७ ॥
मोह के दोषलक्षणों में जकड़ा रहने से ऐसा नहीं कह सकते ॥ ८ ॥
'दोष प्रवृत्ति के हेतु हैं' ( १. १. १८ ) इस दोषलक्षण के मोह में भी घट जाने से
यह भी दोषों में ही परिगणित हैं ॥ ८ ॥
निमित्त-नैमित्तिकोपपादन से तुल्यजातियों का प्रतिषेध नहीं होता ॥ ९ ॥