न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
न महदणुग्रहणमात्रादभौतिकत्वं विभुत्वं चेन्द्रियाणां शक्यं प्रतिपत्तुम्।
इदं खलु—
रश्म्यर्थसन्निकर्षविशेषात् तद्ग्रहणम् ॥ ३४ ॥
तयोर्महदण्वोर्ग्रहणं चक्षूरश्मेरर्थस्य च सन्निकर्षविशेषाद्भवति, यथा-प्रदीप-
रश्मेरर्थस्य चेति । रश्म्यर्थसन्निकर्षश्चावरणलिङ्गः । चाक्षुषो हि रश्मिः कुड्या-
दिभिरावृतमर्थं न प्रकाशयति, यथा-प्रदीपरश्मिरिति ॥ ३४ ॥
आवरणानुमेयत्वे सतीदमाह—
तदनुपलब्धेरहेतुः ॥ ३४ ॥
रूपस्पर्शवद्धि तेजः, महत्त्वदनेकद्रव्यवत्त्वाद् रूपवत्त्वाच्चोपलब्धिरिति प्रदीप-
वत् प्रत्यक्षत उपलभ्येत चाक्षुषो रश्मिर्यदि स्यादिति ? ॥ ३५ ॥
नानुमीयमानस्य प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धिरभावहेतुः ॥ ३६ ॥
सन्निकर्षप्रतिषेधार्थेनावरणेन लिङ्गेनानुमीयमानस्य रश्मेर्या प्रत्यक्षतोऽनुप-
[ अब नैयायिक सांख्यमत का खण्डन करता है— ] केवल महद् या अणु परिमाण-
ग्रहण से इन्द्रियों का अभौतिकत्व या विभुत्व सिद्ध नहीं होता; यह—
महद्-अणु का ग्रहण रश्मि तथा अर्थ के सन्निकर्षविशेष से होता है ॥ ३४ ॥
उन दोनों—महत् तथा अणु का ग्रहण चक्षूरश्मि तथा अर्थ के सन्निकर्षविशेष से
होता है, जैसे—प्रदीपप्रभा तथा अर्थ के सन्निकर्ष से महदणु का ग्रहण होता है। यह
रश्मि-अर्थ का सन्निकर्ष आवरण से अनुमित है । चाक्षुष रश्मि भित्ति-आदि का आवरण
रहते अर्थ को प्रकाशित नहीं कर पातीं, जैसे प्रदीपप्रभा भित्ति-आवरण के रहते द्रव्य को
प्रकाशित नहीं करती ॥ ३४ ॥
शङ्का—आवरण से अनुमेय मानने पर साङ्ख्यवादी कहता है—
उसकी उपलब्धि न होने से वह अहेतु है ? ॥ ३५ ॥
तेज रूपस्पर्शवाला है । महत्त्व, अनेकद्रव्यवत्त्व तथा रूपवत्त्व होने से उसकी उप-
लब्धि, प्रदीपप्रभावाले दृष्टान्त की तरह, प्रत्यक्ष से हो सकती थी, यदि चाक्षुष रश्मि वहाँ
होती ! तात्पर्य यह है कि अनुपलब्धिलक्षणप्राप्त भी यदि उपलभ्यमान नहीं है तो आव-
रणादि का अनुमेय बनाना उचित नहीं; अन्यथा नरविषाण आदि का भी अनुमान होने
लगेगा ? ॥ ३५ ॥
उत्तर—
अनुमीयमान की प्रत्यक्षतः अनुपलब्धि उसके अभाव का कारण नहीं बना
करती ॥ ३६ ॥
सन्निकर्षप्रतिषेधार्थक आवरण से अनुमीयमान रश्मि की प्रत्यक्षतः अनुपलब्धि रश्मि
के अभाव का प्रतिपादन नहीं करती, जैसे—चन्द्रमा का परभाग या पृथ्वी का अधोभाग