सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 215

३३. सू० ] इन्द्रिपरीक्षाप्रकरणम् १९७
कुतः संशयः ?
कृष्णसारे सत्युपलम्भाद् व्यतिरिच्य चोपलम्भात् संशयः ॥ ३२ ॥
कृष्णसारं भौतिकम्, तस्मिन्ननुपहते रूपोपलब्धिः, उपहते चानुपलब्धिरिति ।
व्यतिरिच्य कृष्णसारमवस्थितस्य विषयस्य उपलम्भः, न कृष्णसारप्राप्तस्य ।
न चाप्राप्यकारित्वमिन्द्रियाणां तदिदमभौतिकत्वे विभुत्वात्सम्भवति । एवमुभय-
धर्मोपलब्धेः संशयः ॥ ३२ ॥
साङ्ख्यमतखण्डनम्
अभौतिकानीत्याह १। कस्मात् ?
महदणुग्रहणात् ॥ ३३ ॥
'महत्' इति महत्तरं महत्तमं चोपलभ्यते, यथा—न्यग्रोधपर्वतादि । 'अणु'
इति अणुतरमणुतमं च गृह्यते, यथा—न्यग्रोधधानादि । तदुभयमुपलभ्यमानं
चक्षुषो भौतिकत्वं बाधते । भौतिकं हि यावत्तावदेव व्याप्नोति । अभौतिकं तु
विभुत्वात् सर्वव्यापकमिति ॥ ३३ ॥
यह संशय क्यों उठा ?
कनीनिका के होने पर रूपोपलब्धि होने से, तथा उस कनीनिका के समीपस्थ
विषय की उपलब्धि होने से ॥ ३२ ॥
कृष्णसार ( = कनीनिका ) भौतिक ( तैजस ) है । क्योंकि उसके रहने पर रूपो-
पलब्धि होती है, न रहने पर नहीं हो पाती । कनीनिका से कुछ दूर पड़े पदार्थ की
उपलब्धि हो पाती है, परन्तु उसको कनीनिका से सर्वथा सम्बद्ध कर देने पर रूपोपलब्धि
नहीं होती । और, इन्द्रियाँ अप्राप्यकारी नहीं हैं, अतः उन्हें अभौतिक मानने पर भी
विभुत्व धर्म से उनमें यह उपलब्धि बन सकती है । यों इन्द्रियों के विषय में दोनों तरह
की कोटि मिलने से संशय होता है ॥ ३२ ॥
'इन्द्रियाँ अभौतिक हैं'—ऐसा सांख्यमत हैं; कैसे ?—
बड़े से बड़े तथा न्यून से न्यून परिमाण का ग्रहण होने से ॥ ३३ ॥
'महत्' से महत्तर, महत्तम का भी ग्रहण होता है, जैसे—विशाल वट वृक्ष या पर्वत
आदि । 'अणु' से भी अणुतर, अणुतम का ग्रहण होता है, जैसे—वटबीज आदि । इन
दोनों—'महद्' तथा 'अणु' के कनीनिका द्वारा गृहीत होने से चक्षु का भौतिकत्व बाधित
होता है, क्योंकि भौतिक विकार एक सीमित परिमाण को ही व्याप्त कर सकता है ।
हाँ, अभौतिक अपेक्षानुसार व्यापक परिमाण को भी व्याप्त कर सकता है; क्योंकि वह
विभु है ॥ ३३ ॥
१. सांख्य इति शेषः । इदानीं सूत्रकारः सांख्यमतमुत्थाप्य 'अक्षिकनीनिकैवेन्द्रियम्'
इति बौद्धमतं दूषयति ।