सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 170

१५२ · वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० २. आ०
अध्यापनं लिङ्गम्; असति सम्प्रदानेऽध्यापनं न स्यादिति ॥ २७ ॥
उभयोः पक्षयोरन्यतरस्याध्यापनादप्रतिषेधः ? ॥ २८ ॥
समानमध्यापनमुभयोः पक्षयोः, संशयानिवृत्तेः—किमाचार्यस्थः शब्दोऽन्तेवा-
सिनमापद्यते तदध्यापनम् ? आहोस्विन्नृत्योपदेशवद् गृहीतस्यानुकरणमध्याप-
नमिति ? एवमध्यापनमलिङ्गं सम्प्रदानस्येति ॥ २८ ॥
अयं तर्हि हेतुः—
अभ्यासात् ? ॥ २९ ॥
अभ्यस्यमानमवस्थितं दृष्टम् । 'पञ्चकृत्वः पश्यति' इति रूपमवस्थितं पुनः
पुनर्द्दश्यते । भवति च शब्देऽभ्यासः—दशकृत्वोऽधीतोऽनुवाकः, विंशतिकृत्वोऽधीत
इति । तस्मादवस्थितस्य पुनः पुनरुच्चारणमभ्यास इति ॥ २९ ॥
नान्यत्वेऽप्यभ्यासस्योपचारात् ॥ ३० ॥
अनवस्थानेऽप्यभ्यासस्याभिधानं भवति-द्विर्नृत्यतु भवान्, त्रिर्नृत्यतु भवान्
शिष्य के सम्प्रदानत्व में अध्यापन ही लिंग है; क्योंकि सम्प्रदान के न होने पर
अध्यापन कैसा बनेगा ? ॥ २७ ॥
दोनों ही पक्षों में अध्यापन से, सम्प्रदान में हेतुत्व सिद्ध नहीं किया जा
सकता ॥ २८ ॥
अध्यापन में दोनों ( गुरु तथा छात्र ) ही पक्षों के तुल्य होने से इस हेतु की संशय-
ग्रस्तता के कारण सम्प्रदानत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता । आप अध्यापन किसे मानते
हैं—क्या आचार्यस्थ शब्द शिष्य के पास जाता है, वह अध्यापन है ? या नृत्योपदेश में
गृहीत के अनुकरण की तरह अध्यापन है ? (दोनों ही अवस्थाओं में स्थिरत्व नहीं
बना, ) अतः अध्यापन से सम्प्रदानत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता । ( उसके सिद्ध न
होने पर शब्द की नित्यता फिर अहेतुक रह गयी । ) ॥ २८ ॥
तो फिर, इसे हेतु मान लें—
अभ्यास से ? ॥ २९ ॥
अभ्यस्यमान ( आवृत्तियोग्य ) पदार्थ स्थिर देखा गया है, जैसे—'पांच बार देखता
हैं' । जो रूप स्थिर है वही बार बार दिखायी दे सकता है । शब्द में भी अभ्यास देखा
गया है, जैसे—'अनुवाक दस बार पढ़ा गया, बीस बार पढ़ा गया' । यहाँ स्थित
( नित्य ) शब्द के बार-बार उच्चारण को ही अभ्यास कहते हैं ? ॥ २९ ॥
नहीं; अस्थिरत्व मनाने पर भी उसमें औपचारिक अभ्यास बन सकता है ॥ ३० ॥
अन्य = अनवस्थित (अस्थिर = अनित्य) में भी अभ्यास हो सकता है, जैसे—'आप
१. अस्य भाष्यत्वमेव केचिद् वदन्ति ।