न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें२७. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् '१५१
दृष्टम् । अस्पर्शत्वादित्येतस्य साध्यसाधर्म्येणोदाहरणम् ?—
न; कर्मानित्यत्वात् ॥ २३ ॥
अयं तर्हि हेतुः साध्यवैधर्म्येणोदाहरणम् ?
न; अणुनित्यत्वात् ॥ २४ ॥
उभयस्मिन्नुदाहरणे व्यभिचारान्न हेतुः ॥ २४ ॥
अयं तर्हि हेतुः—
सम्प्रदानात् ? ॥ २५ ॥
सम्प्रदीयमानमवस्थितं दृष्टम्, सम्प्रदीयते च शब्द आचार्येणान्तेवा ,
तस्मादवस्थित इति ? ॥ २५ ॥
तदन्तरालानुपलब्धेरहेतुः ॥ २६ ॥
येन सम्प्रदीयते तस्मै च, तयोरन्तरालेऽवस्थानमस्य केन लिङ्गेनो-
पलभ्यते ? सम्प्रदीयमानो ह्यवस्थितः सम्प्रदातुरपैति, सम्प्रदानं च प्राप्नोति-
इत्यवर्जनीयमेतत् ॥ २६ ॥
अध्यापनादप्रतिषेधः ? ॥ २७ ॥
स्पर्शवान् अणु नित्य तथा अस्पर्शवान् कर्म अनित्य देखा गया है। अस्पर्शवत्त्व इस हेतु
का साध्यसाधर्म्य से उदाहरण है ?
नहीं; कर्म का अनित्यत्व देखा जाने से ॥ २३ ॥
तो यह साध्यवैधर्म्य से उदाहरण हेतु है ?
नहीं; अणु का नित्यत्व देखा जाने से ॥ २४ ॥
दोनों ही उदाहरणों में व्यभिचार देखा जाने से 'अस्पर्शत्व' नित्यत्व में हेतु
नहीं है ॥ २४ ॥
तो यह हेतु मान लें—
सम्प्रदान से ? ॥ २५ ॥
सम्प्रदीयमान स्थिर देखा गया है, शब्द का भी आचार्य द्वारा छात्र को सम्प्रदान
होता है, अतः यह स्थिर ( नित्य ) है ? ॥ २५ ॥
यह सम्प्रदान हेतु नहीं बन सकता; क्योंकि तदन्तराल की उपलब्धि नहीं
होती ॥ २६ ॥
जिसके द्वारा जिसके लिये सम्प्रदान किया जाता है, उन दोनों के मध्य में इसका
अवस्थान किस ज्ञापक हेतु से सिद्ध करोगे ? क्योंकि सम्प्रदीयमान पूर्वसिद्ध वस्तु दाता
से दूर होकर सम्प्रदान को प्राप्त करती है। यह अपरिहार्य है। शिष्य सम्प्रदान
नहीं है। ॥ २६ ॥
अध्यापन हेतु से सम्प्रदानत्व ज्ञापित हो सकता है ? ॥ २७ ॥