न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ११३
जातिविशेषस्य प्रत्ययानुवृत्तिलिङ्गस्याप्रत्याख्यानम्, प्रत्याख्याने वा प्रत्यय-
व्यवस्थानुपपत्तिः । व्यधिकरणस्यानभिव्यक्तेरधिकरणवचनम् । अणुसमवस्थानं
विषय इति चेत् ? प्राप्ताप्राप्तसामर्थ्यवचनम् । किमप्राप्ते अणुसमवस्थाने तदाश्रयो
जातिविशेषो गृह्यते ? अथ प्राप्ते इति ? अप्राप्ते ग्रहणमिति चेत् ? व्यवहित-
स्याणुसमवस्थानस्याप्युपलब्धिप्रसङ्गः, व्यवहितेऽणुसमवस्थाने तदाश्रयो जाति-
विशेषो गृह्येत । प्राप्ते ग्रहणमिति चेत् ? मध्यपरभागयोरप्राप्तावनभिव्यक्तिः ।
यावत्प्राप्तं भवति तावत्यभिव्यक्तिरिति चेत् ? तावतोऽधिकरणत्वमणुसमवस्था-
नस्य । यावति प्राप्ते जातिविशेषो गृह्यते तावदस्याधिकरणमिति प्राप्तं भवति ।
तत्रैकसमुदाये प्रतीयमानेऽर्थभेदः । एवं च सति योऽयमणुसमुदायो वृक्ष इति
प्रतीयते, तत्र वृक्षबहुत्वं प्रतीयेत—यत्र यत्र ह्यणुसमुदायस्य भागे वृक्षत्वं गृह्यते
स स वृक्ष इति ।
तस्मात् समुदिताणुसमवस्थानस्यार्थान्तरस्य जातिविशेषाभिव्यक्तिविषयत्वा-
दवयव्यर्थान्तरभूत इति ॥ ३७ ॥
४. एकाकारप्रतीतिक हेतु के जातिविशेष का अप्रत्याख्यान भी, समूह को अवयवी
मानने पर, नहीं बनेगा । यदि किसी तरह बन भी जाये तो भी उक्त प्रतीतिव्यवस्था
नहीं बन पायेगी; क्योंकि आश्रयप्रतीति के बिना जातिप्रतीति कैसे होगी !
यदि व्यधिकरण की अभिव्यक्ति न होने से परमाणु का अधिकरणत्व अप्रत्याख्यात
होता है तो जाति मानेंगे तब वह व्यधिकरण कौन सा है ? बताइये । यदि कहें कि
परमाणु ही किसी संयोगविशेष से रहते हुये उस जाति को व्यक्त करते हैं, तो यह बता-
इये कि संयुक्त अणुसमूह में जातिविशेष को व्यक्त करता है, या असंयुक्त अणुसमूह में ।
यदि असंयुक्त में व्यक्त करता है ? तो व्यवहित अणुसंयुक्त को उपलब्धि होने लगेगी;
अर्थात् व्यवहित अणुसंयुक्त में भी तदाश्रित जातिविशेष गृहीत होने लगेगा । यदि कहें
कि संयुक्त में ग्रहण होता है ? तो उस अणुसमूह के मध्य तथा पृष्ठभाग से संयोग न
होने के कारण उनमें ही अनभिव्यक्ति रहेगी । यदि कहें कि जितने के साथ संयोग हुआ,
उतने में जाति की अभिव्यक्ति हो जायेगी ? तो अभिव्यक्त जातिविशेष का अधिकरण
कौन है—यह बताइये । अर्थात् जितने अणुसमूह के संयुक्त होने पर जातिविशेष गृहीत
होता है, उतना उसका अधिकरण हो जायेगा । एवं च—वहाँ एकसमुदाय की प्रतीति में
विषय का बहुत अर्थभेद है । इस तरह जो 'अणुसमुदाय वृक्ष है'—ऐसी प्रतीति होती
है, वहाँ वृक्षबहुत्व प्रतीत होने लगेगा । उस अणुसमुदाय के जिस जिस भाग में वृक्षत्व गृहीत
होगा वह वह भाग वहाँ 'वृक्ष' कहलायेगा । इसलिए निष्कर्ष यह निकला कि वृक्षत्व का
अधिकरण कह कर जो लिया जाता है वह अणुसमूह न होकर अर्थान्तर ही जातिविशेष
का आश्रय बन सकता है । वह अर्थान्तर अवयवी हो सकता है, न कि अणुसमूह ॥३७॥
न्याय द० : ८