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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 410 में से

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पृष्ठ 130

११२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
अनेकसमूहः समुदाय इति चेद्, न; द्वित्वेन समानाधिकरणस्य ग्रहणात् ।
द्वाविमौ संयुक्तावर्थाविति ग्रहणे सति नानेकसमूहाश्रयः संयोगो गृह्यते । न च
द्वयोरण्वोर्ग्रहणमस्ति । तस्मान्महती द्वित्वाश्रयभूते द्रव्ये संयोगस्य स्थानमिति ।
३. प्रत्यासत्तिः प्रतीघातावसाना संयोगो नार्थान्तरमिति चेत् ? न; अर्थान्तर-
हेतुत्वात् संयोगस्य । शब्दरूपादिस्यन्दनां हेतुः संयोगः । नच द्रव्ययोर्गुणान्त-
रोपजनन मन्तरेण शब्दे रूपादिषु स्पन्दे च कारणत्वं गृह्यते तस्माद् गुणान्तरम्,
प्रत्ययविषयश्चार्थान्तरं तत्प्रतिषेधो वा-कुण्डली गुरुः, अकुण्डलश्छात्र इति ।
संयोगबुद्धेश्च यद्यर्थान्तरं न विषयः, अर्थान्तरप्रतिषेधस्तर्हि विषयः ? तत्र प्रति-
षिध्यमानवचनम् । ‘संयुक्ते द्रव्ये' इति यदर्थान्तरमन्यत्र दृष्टमिह प्रतिषिध्यते,
तद्वक्तव्यमिति । द्वयोर्महतोराश्रितस्य ग्रहणान्नाण्वाश्रय इति ।
अनेक संयोगसमूह को समुदाय मान लें ? नहीं मान सकते; क्योंकि युक्त द्वित्व से
समानाधिकरणत्व का ही संयोग में ग्रहण कर पाता है, 'ये दो अर्थ ( घट पट ) संयुक्त
हैं—इस ज्ञान में अनेकसमूह में संयोग गृहीत नहीं होता ! ओर फिर दो अणु का तो
( अतीन्द्रिय होने से ) ज्ञान भी नहीं हो पाता । अतः निष्कर्ष यह निकला कि द्वित्वा-
श्रयभूत महान् द्रव्य में ही संयोग बन सकता है ।
३. अवरोध ( रोक ) समाप्त होकर समीप आ जाना ही संयोग है, इसके अतिरिक्त
यह कुछ नहीं ? —ऐसा कहना भी उचित नहीं; क्योंकि संयोग अर्थान्तर का हेतु हैं, न
कि स्वयं अर्थान्तर । संयोग शब्द, रूप आदि तथा स्पन्द का हेतु हैं। दो द्रव्यों में गुण-
विशेष की उत्पत्ति के बिना, शब्द, रूप तथा स्पन्द निरूपित कारणत्व ( जनकत्व ) नहीं
गृहीत हो सकता, अतः यह गुणान्तर है । इस अर्थान्तर का या उसके प्रतिषेध का
प्रत्यक्ष भी होता है, जैसे 'गुरु कुण्डल धारण किये हुए हैं' 'छात्र कुण्डल धारण किये हुए
नहीं हैं' । (यदि यह अर्थान्तर न होता तो 'कुण्डलगुरु' या 'गुरुकुण्डल' ऐसा शब्द
प्रयुक्त होता, न कि मत्वर्थक 'कुण्डली' । इसी प्रकार 'अकुण्डल छात्र' या 'छात्रांकुण्डल'
शब्द-प्रयोग होता, न कि बहुव्रीहि समास' वाला । यह अर्थान्तर हैं तभी 'समर्थः पदविधिः'
(२. १. १) इस पाणिनि के अनुशासन से मतुप्प्रत्यय तथा बहुव्रीहि .समास की प्रवृत्ति
हुई; क्योंकि उक्त शास्त्र अर्थ-सम्बन्ध में ही प्रवृत्त होता है; अन्यथा लोकशास्त्रविरोध-
प्रसङ्ग होने लगेगा । 'गुरु कुण्डल से संयुक्त हैं' इस बुद्धि का यदि अर्थान्तर विषय नहीं
है, तो अर्थान्तरप्रतिषेध ही उसका विषय मानना पड़ेगा। तब वहाँ प्रतिषिध्यमान क्या
है—यह स्पष्टतः बतावें । अर्थात् उस 'संयुक्त द्रव्य में' इस प्रतीति में जो अर्थान्तर अन्यत्र
देखा गया है, परन्तु उसका यहाँ प्रतिषेध कर रहे हैं तो उसे शब्दतः बताइये कि वह
क्या है ! दो 'महत्' में समवायेन वृत्तिमान् संयोग का ग्रहण होने से वह अण्वाश्रित नहीं
हो सकता (;क्योंकि वैसा सम्भव नहीं है) ।