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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 220 में से

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पृष्ठ 82

६६ नीतिवाक्यामृतम्
सहाध्यायी के प्रति कर्त्तव्य—
सहाध्यायिषु बुद्धयतिशयेन नाभिभूयेत ॥ १९ ॥
अपनी बुद्धि यदि अन्य छात्रों की अपेक्षा अधिक तीक्ष्ण हो तो उससे सह-
पाठियों का पराभव-तिरस्कार न करे ।
गुरु के साथ व्यवहार—
प्रज्ञायातिशायानो न गुरुमवज्ञायेत ॥ २० ॥
अपनी बुद्धि यदि गुरु से अधिक श्रेष्ठ हो तो उससे गुरु का अनादर
न करे ।
सकिमभिजातो मातरि यः पुरुषः शूरो वा पितरि ॥ २१ ॥
क्या वह पुत्र कुलीन कहा जा सकता है जो कि माता अथवा पिता के
प्रति शूरता प्रदर्शित करता है ।
अननुज्ञातो न क्वचिद् व्रजेत् ॥ २२ ॥
गुरु से बिना आज्ञा लिये हुए कहीं न जाय ।
मार्गमचलं जलाशयं च नैकोऽवगाहयेत् ॥ २३ ॥
लम्बे मार्ग पर, पहाड़ पर और जलाशय पर अकेले नहीं जाना चाहिए।
पितरमिव गुरुमुपचरेत् ॥ २४ ॥
पिता के समान ही गुरु की सेवा करे ।
गुरुपत्नीं जननीमिव पश्येत् ॥ २५ ॥
गुरुपत्नी को माता के समान देखे ।
गुरुमिव गुरुपुत्रं पश्येत् ॥ २६ ॥
गुरु के समान ही गुरु पुत्र को भी समझे ।
सब्रह्मचारिणि बान्धव इव स्निह्येत् ॥ २७ ॥
साथी ब्रह्मचारियों और सहपाठियों के साथ बान्धवों के समान
स्नेह करे ।
ब्रह्मचर्यमाषोडशाद्वर्षात्ततो गोदानपूर्वकं दारकर्म चास्य ॥ २८ ॥
सोलह वर्ष तक ब्रह्मचर्य से रहे अनन्तर गोदान करके विवाह करे ।
पढ़ने का क्रम—
समविद्यैः सहाधीतं सर्वदाभ्यस्येत ॥ २९ ॥
पढ़े हुए विषय का अपने सहपाठियों के साथ सदा अभ्यास करे ।
अपनी दुर्दशा का गुप्त रखना —
गृहदौःस्थित्यमागन्तुकानां पुरतो न प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥
अपने घर की दुरवस्था आगन्तुकों के आगे न प्रकाशित करे ।