नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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उसका अभ्यास किया जाता है तो उस कर्म में कुशलता अवश्य प्राप्त
होती है ।
गुरु की आज्ञा का पालन—
गुरुवचनमनुल्लङ्घनीयमन्यत्राधर्मानुचिताचारात्मप्रत्यवायेभ्यः ॥ ९ ॥
जो धर्मानुकूल हों, उचित आचरण के प्रतिकूल न हों तथा जिनसे आत्म-
कल्याण होता हो ऐसे गुरुवचनों का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए !
गुरु की विशेषता—
युक्तमयुक्तं वा गुरुरेव जानाति यदि न शिष्यः प्रत्यर्थवादी ॥ १० ॥
यदि शिष्य गुरु के प्रतिकूल बोलने वाला नहीं है तो उसके लिये उचित
और अनुचित कर्त्तव्यों को गुरु ही जानता है ।
क्रोधित गुरुजनों के प्रति कर्त्तव्य—
गुरुजनरोपेऽनुत्तरदानमभ्युपपत्तिश्चौषधम् ॥ ११ ॥
गुरु लोग जब कुपित हों तब उत्तर न देना और सेवा करना ही उस
क्रोध की शान्ति के लिये औषध है ।
गुरु के प्रति कर्त्तव्यों का निर्देश—
शत्रूणामभिमुखः पुरुषः श्लाघ्यो न पुनर्गुरूणाम् ॥ १२ ॥
पुरुष वह प्रशंसनीय है जो शत्रुओं से मोर्चा ले न कि गुरुओं से ।
आराध्यं न प्रकोपयेद् यद्यसावाश्रितेषु कल्याणशंसी ॥ १३ ॥
यदि आराध्य गुरु अपने आश्रितों के सदा कल्याणकामी हों तो उनको
कुपित नहीं करना चाहिए ।
गुरुभिरुक्तं नातिक्रमितव्यं यदि नेहिकामुत्रिकफलविलोपः ॥ १४ ॥
यदि इहलोक और परलोक की फलप्राप्ति में बाधा न पड़ती हो तो
गुरुओं के वचन का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए ।
सन्दिहानो गुरुम् अकोपयन्नापृच्छेत् ॥ १५ ॥
पढ़ते समय किसी बात में संशय होने पर गुरुजी क्रोधित न हों इस
बात का ध्यान रखते हुए सन्दिग्ध विषय को पुनः पूछ ले ।
गुरूणां पुरतो न यथेष्टमासितव्यम् ॥ १६ ॥
गुरुओं के आगे मनमाने ढंग से न बैठे ।
नानभिवाद्योपाध्यायाद् विद्यामाददीत ॥ १७ ॥
अभिवादन किये बिना गुरु से विद्या न ग्रहण करे ।
अध्ययनावस्था का आचार—
अध्ययनकाले व्यासङ्गं पारिप्लवमन्यमनस्कतां च न ब्रजेत् ॥ १८ ॥
अध्ययन के समय विरोधी विचार, चञ्चलता और अन्यमनस्कता न करे।
५ नी०