नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 220 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्रिसमुद्देशः ५१
अकेला आदमी कितने कार्यों के लिये अपने को विभाजित कर सकता है ?
अर्थात् एक व्यक्ति राज्य के नानाप्रकार के कार्यों की स्वयं देख-भाल नहीं कर
सकता अतः सहायकों का होना आवश्यक है ।
दृष्टान्त—
किमेकशाखस्य शाखिनो महती भवतिच्छाया ॥ ८२ ॥
क्या एक शाखा वाले वृक्ष की विशाल छाया होती है ।
अवसर की अपेक्षा से कार्य करना अनुचित है—
कार्यकाले दुर्लभः पुरुषसमुदायः ॥ ८३ ॥
अवसर पड़ने पर अर्थात् आपत्ति आ जाने पर पुरुष समुदाय अर्थात्
सहायकों का मिलना दुर्लभ होता है । अतः सहायकों का संग्रह पहले से करना
चाहिए ।
दृष्टान्त—
दीप्ते गृहे कीदृशं कूपखननम् ॥ ८४ ॥
घर में आग लग जाने पर कुआं खोदना कहाँ तक उचित है ?
धनकी अपेक्षा सहायक संग्रह की उत्तमता—
न धनं पुरुषसंग्रहाद् बहु मन्तव्यम् ॥ ८५ ॥
धन को सहायक पुरुषों के संग्रह से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए ।
अर्थात् धन बटोरने की अपेक्षा सहायकों का संग्रह अच्छा है ।
दृष्टान्त द्वारा समर्थन—
सत्क्षेत्रे बीजमिव पुरुषेषूप्तं कार्यं शतशः फलति ॥ ८६ ॥
अच्छे खेत में बोये गये बीज से जिस प्रकार बहुत अन्न उत्पन्न होता है
उसी प्रकार अच्छे सहायकों में बांटा गया कार्य सुन्दर फल देता है ।
कार्य पुरुष का लक्षण—
बुद्ध्यावर्थे युद्धे च ये सहायास्ते कार्यपुरुषाः ॥ ८७ ॥
बुद्धि अर्थात् सन्मति और सत्परामर्श, धन तथा संग्राम में सहायता देने
वाले पुरुष कार्य पुरुष अर्थात् काम के आदमी होते हैं ।
समर्थन—
खादनवेलायां को नाम न सहायः ॥ ८८ ॥
खाने के समय कौन नहीं सहायक होता है ।
मूर्ख के साथ मन्त्रणा का निषेध—
श्राद्ध इवाश्रोत्रियस्य न मन्त्रे मूर्खस्याधिकारोऽस्ति ॥ ८९ ॥
श्राद्ध में जिस प्रकार अश्रोत्रिय ब्राह्मण का अधिकार नहीं है उसी प्रकार
मन्त्रणा देने के लिये मूर्ख को भी अधिकार नहीं है ।