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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 220 में से

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पृष्ठ 24

८ नीतिवाक्यामृतम्
बुद्धिमान् व्यक्ति धर्माचार में स्वयं ही प्रवृत्त होता है—
कःसुधी भेषजमिवात्महितं धर्मं परोपरोधादनुतिष्ठति ॥ ३६ ॥
कौन बुद्धिमान् औषध के समान आत्महितकारी धर्म को दूसरे के अनुरोध
से करता है ? अर्थात् बुद्धिमान् व्यक्ति स्वयं ही धर्माचरण में प्रवृत्त होते हैं।
धर्माचरण की कठिनाइयां—
धर्मानुष्ठाने भवत्यप्रार्थितमपि प्रतिलोभ्यं लोकस्य ॥ ३७ ॥
धर्म का अनुष्ठान करते समय विघ्न बिना बुलाये ही उपस्थित हो
जाते हैं ।
पापकर्म में मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति—
अधर्मकर्मणि को नाम नोपाध्यायः पुरस्कारी वा ? ॥ ३८ ॥
अधर्म के काम में कौन नहीं स्वयम् उपाध्याय और अग्रसर होता ।
अधर्म करने के लिये किसी उपदेशक और मुखिया की आवश्यकता नहीं
होती मनुष्य स्वयम् ही उस ओर प्रवृत्त होता है ।
चतुर व्यक्ति का कर्त्तव्य—
कण्ठगतैरपि प्राणैर्नाशुभं कर्म समाचरणीयं कुशलमतिभिः ॥ ३६ ॥
प्राण कण्ठ को भी आ जाय तब भी बुद्धिमान् पुरुष को निन्दित कर्म नहीं
करना चाहिए ।
धूर्तों का धनिकों को पाप कर्म में प्रवृत्त करना—
व्यसनतर्पणाय धूर्त्तैर्दुरीहितवृत्तयः क्रियन्ते श्रीमन्तः ॥ ४० ॥
अपने दुर्व्यसनों की पूर्ति के लिये धूर्त्त लोग धनिकों को पापमार्ग पर
प्रवृत्त करते हैं ।
दुष्ट की संगति त्याज्य है—
खलसंगमेन किं नाम न भवत्यनिष्टम् ? ॥ ४१ ॥
दुष्ट की संगति से कौन सा अनिष्ट नहीं होता है ।
दुर्जन निन्दा—
अग्निरिव स्वाश्रयमेव दहन्ति दुर्जनाः ॥ ४२ ॥
जिस प्रकार अग्नि अपने आधार काष्ठ को जलाकर नष्ट कर देती है उसी
प्रकार दुष्ट पुरुष भी अपने आश्रयदाता का नाश कर डालते हैं ।
क्षणिक सुख के लोभ की निन्दा—
वनगज इव तदात्वसुखलुब्धः को नाम न भवत्यास्पद्माप-
दाम् ? ॥ ४३ ॥
जंगली हाथी के समान तात्कालिक सुख के लोभ में पड़कर कौन व्यक्ति
आपत्तिग्रस्त नहीं होता ?