नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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विवाहसमुद्देशः १८७
दिखलाई पड़ें और वे सुडोल न हों, तालु, जीभ, और नीचे के होठ हरड़ के
रङ्ग के अर्थात् काले हों, दांत ऊंचे नीचे और पृथक्-पृथक् हों, गालों में गड्ढे
पड़ते हों, आंखें पीली-पीली हों, पैर की आखिरी अंगुलि सटी हुई हों, माथा
उभरा हुआ या धंसा हुआ हो, कान ठीक जगह पर न हों, बाल, मोटे, पीले
और कड़े हों, बहुत लम्बी, बहुत लम्बी, बहुत छोटी, और शरीर से बहुत
हीन अर्थात् बहुत ही पतली दुबली हो, कमर शरीर के अन्य भागों के अनुकूल
न हों, कुबड़ी हो, बौनी हो, अथवा टेढ़े-मेढ़े अंगोंवाली हो, वर के जन्म और
देहसे समानता न हो अथवा अधिकता हो, इनके अतिरिक्त घर में अकस्मात्
आये हुए अथवा स्वयं बुलाये गये व्यक्ति से मिलने-जुलने वाली हो, रोगिणी
हो, सदा रोती रहनेवाली हो, पति की हिंसा करनेवाली, सदा सोनेवाली,
अल्पायु, बाहर भागी हुई, कुलटा, सदा उदास, दुःखी और लड़ने के लिये
तत्पर, नौकर-चाकरों के लिये उद्वेग उत्पन्न करनेवाली, अप्रियदर्शना और
अभागिन—कन्या से विवाह न करे ।
शिथिले पाणिग्रहणे वरः कन्यया परिभूयते ॥ १५ ॥
पाणिग्रहण में यदि शिथिलता हो तो वर को कन्या से दबकर रहना
पड़ता है ।
मुखमपश्यतो वरस्य, निमीलितलोचना कन्या भवति प्रचण्डा ॥ १६॥
पाणिग्रहण के समय कन्या वर का मुख न देखे और आंखें बन्द कर ले
तो समझना चाहिए कि कन्या बड़ी प्रचण्ड अर्थात् उग्र स्वभाव की होगी ।
सह शयने तूष्णीं भवन् पशुवन्मन्येत ॥ १७ ॥
स्त्री के साथ सोते सयय यदि वर चुपचाप रहता है तो कन्या उसे पशु-
तुल्य समझती है ।
बलादाक्रान्ता जन्मविद्वेष्यो भवति ॥ १८ ॥
यदि वर कन्या के साथ प्रारम्भ में ही बलप्रयोग करता है तो कन्या
जन्मभर उससे द्वेष ही करती है ।
धैर्यचातुर्यायत्तं हि कन्याविस्रम्भणम् ॥ १६ ॥
कन्या को अपना विश्वासभाजन एवं प्रीतिपात्र बनाने के लिये धैर्य और
चातुर्य आवश्यक होता है ।
समविभवाभिजनयोरसमगोत्रयोश्च विवाहसम्बन्धः ॥ २० ॥
समान ऐश्वर्य, समानकुल, किन्तु भिन्न-भिन्न गोत्रवालों का विवाह
सम्बन्ध होना चाहिए ।
महतः पितुरैश्वर्यादल्पमवगणयति ॥ २१ ॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu