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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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१८८ नीतिवाक्यामृतम्
कन्या का पिता यदि अधिक ऐश्वर्यशाली हुआ तो कन्या पति को सदा
छोटा समझती है।
अल्पस्य कन्यापितुर्दौःस्थ्यं महता कष्टेन विज्ञायते ॥ २२ ॥
यदि कन्या का पिता अल्प विभव वाला और वर विशेष विभव वाला
हुआ तो कन्या की मनःस्थिति अथवा मन के दुःखों का ठीक-ठीक अनुभव
वर को बड़ी कठिनाई से होता है।
अल्पस्य महता सह संव्यवहारे महान् व्ययोऽल्पश्चायः ॥ २३ ॥
छोटे कुल का बड़े कुल के साथ सम्बन्ध होने से व्यय अधिक और आय
कम होती है।
वरं वेश्यायाः परिग्रहो नाविशुद्धकन्याया परिग्रहः ॥ २४ ॥
वेश्या को अङ्गीकार करना अच्छा है किन्तु वंश अथवा चरित्र से शुद्ध
जो न हो ऐसी कन्या का वरण नहीं अच्छा है।
वरं जन्मनाशः कन्यायाः नाकुलीनेष्ववक्षेपः ॥ २५ ॥
कन्या का जन्म भले ही नष्ट हो जाय, किन्तु उसे अकुलीन के साथ
विवाहित कर देना अच्छा नहीं है।
सम्यग् वृत्ता कन्या तावत् सन्देहास्पदं यावन्न पाणिग्रहः ॥ २६ ॥
सदाचार सम्पन्न भी कन्या तब तक सन्देह का स्थान बनी रहती है
जब तक कि उसका विवाह नहीं हो जाता।
विकृतप्रत्यूढापि पुनर्विवाह मर्हतीति स्मृतिकाराः ॥ २७ ॥
स्मृतिकारों का मत है कि संयोग या भ्रमवश अन्धे, लूले, लंगड़े आदि
विकृत अंगवाले पुरुष के साथ विवाहित कन्या पुनर्विवाह के योग्य होती है।
आनुलोम्येन चतुस्त्रिद्विवर्णाः कन्याभाजनाः ब्राह्मण-क्षत्रिय-
विशः ॥ २८ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये अनुलोम क्रम से अर्थात् ब्राह्मण—ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार कन्याओं से क्षत्रिय इसी प्रकार तीन और
वैश्य दो कन्याओं से विवाह कर सकता है।
देशापेक्षा मातुलसम्बन्धः ॥ २९ ॥
मामा की लड़की के साथ विवाह करना देश की प्रथा के अधीन है।
धर्मसन्ततिरनुपहतारतिगृहवार्तासुविहितत्वमाभिजात्याचारविशुद्धि-
र्देवद्विजातिथिबान्धवसत्कारानवद्यत्वं च दारकर्मणः फलम् ॥ ३० ॥
धर्मानुसार सन्तानोत्पादन, दोषरहित कायसम्बन्ध, गृह के कार्यों का
सुव्यवस्थित रूप से होना, कुलीनता और शुद्ध आचार-व्यवहार का होना,