नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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विवाहसमुद्देशः
शत्रु के प्रदेश में भूमिपर अर्थात् पैदल, पालकी पर चढ़कर और घोड़े
पर चढ़कर कभी भी प्रवेश नहीं करना चाहिए।
करिणं जंपाणं वाप्यध्यासाने न प्रभवन्ति क्षुद्रोपद्रवाः ॥ १०१ ॥
हाथी अथवा जंपान ( पहाड़ी प्रदेशों में प्रसिद्ध वाहन मनुष्य की पीठ
पर बंधे हुए बेंत के आसन पर चलना ) पर चढ़कर चलने से छोटे मोटे उप-
द्रवों की संभावना नहीं रहती ।
[ इति युद्धसमुद्देशः ]
३१. विवाहसमुद्देशः
द्वादशवर्षा स्त्री षोडशवर्षः पुमान् प्राप्तव्यवहारौ भवतः ॥ १ ॥
बारह वर्ष की स्त्री, सोलह वर्ष का पुरुष, यह दोनों काम सम्बन्धी व्यव-
हारों को समझने योग्य हो जाते हैं ।
विवाहपूर्वो व्यवहारश्चातुर्वर्ण्यं कुलीनयति ॥ २ ॥
विवाह-पूर्वक काम व्यवहार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों
वर्णों की सन्तान को कुलीन बनाता है।
युक्तितो वरणविधानम्, अग्निदेवद्विजसाक्षिकं च पाणिग्रहणं
विवाहः ॥ ३ ॥
विधिपूर्वक कन्या और वर का वरण अर्थात् अङ्गीकार या चुनाव करके
अग्नि, देवता और ब्राह्मण की साक्षी में उन दोनों का परस्पर पाणिग्रहण
कराने का नाम विवाह है ।
स ब्राह्मो विवाहो यत्र वरायालंकृत्य कन्या प्रदीयते ॥ ४ ॥
जिस विवाह में कन्या को सुन्दर आभूषणों से अलंकृत कर वर को दिया
जाता है वह ब्राह्म विवाह है ।
स दैवो विवाहो यत्र यज्ञार्थमृत्विजः कन्याप्रदानमेव दक्षिणा ॥ ५ ॥
यज्ञ का विधान करके उसमें वर के रूप में वर्त्तमान ऋत्विज् अर्थात्
पुरोहित को यज्ञ की दक्षिणा के रूप में कन्यादान करना 'दैवविवाह' है ।
गोमिथुनपुरः सरं कन्यादानादार्षः ॥ ६ ॥
गाय-बैल की जोड़ी देकर कन्यादान करना 'आर्ष' विवाह है ।
विनियोगेन कन्याप्रदानात् प्राजापत्यः ॥ ७॥
तुम दोनों एक साथ धर्माचरण करो इस उपदेश या प्रवचन के साथ
कन्यादान प्राजापत्य विवाह है ।
एते चत्वारो धर्म्या विवाहाः ॥ ८ ॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu