नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 220 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ नीतिवाक्यामृतम्
उसके अमात्य आदि उसकी ठीक सेवा नहीं करते, क्योंकि उनको यह अनु-
भव होता है कि यह हमारे न रहने पर हमारे बच्चों के साथ भी ऐसा ही
कृतघ्नता का व्यवहार करेगा ।
स्वामिनः पुरःसरणं युद्धेऽश्वमेधसमम् ॥ ६४ ॥
युद्ध में स्वामी के आगे होना अश्वमेघ यज्ञ करने के समान पुण्यदायक है ।
युधि स्वामिनं परित्यजतो नास्तीहामुत्र च कुशलम् ॥ ६५ ॥
युद्ध में स्वामी का साथ छोड़नेवाले का इस लोक और परलोक में भी
कल्याण नहीं होता ।
विग्रहायोच्चलितस्यार्द्धं बलं सर्वदा सन्नद्धमासीत, सेनापतिः
प्रयाणमावासं च कुर्वीत, चतुर्दिशमनीकान्यदूरेण सञ्चरेयुस्तिष्ठे-
युश्च ॥ ६६ ॥
राजा जब युद्ध के लिये प्रस्थान करे तब आधी सेना से तो वह व्यावहा-
रिक रूप में युद्ध करे और उसकी आधी सेना सदा तैयार रहे । उसका सेना-
पति युद्ध में जाय भी और एक स्थान पर आवास बनाकर—डेरा डालकर
अवसर के अनुकूल वास भी करे, और शत्रु के चारों ओर अपनी सेनायें घूमती
रहें और टिकी रहें ।
धूमाग्निरजोविषाणध्वनिव्याजेनाटविकाः प्रणिधयः परबलान्याग-
च्छन्ति इति, निवेदयेयुः ॥ ६७ ॥
विजिगीषु राजा के गुप्तचर सदा जङ्गलों में घूमते रहें और 'शत्रुसेना
आ रही है' इसका निवेदन धूम, अग्नि तथा धूलि के प्रदर्शन से शृंग ध्वनि के
व्याज से करे ।
पुरुषप्रमाणोत्सेधमबहुजनविनिवेशनाचरणापसरणयुक्तमग्रतो महा-
मण्डपावकाशं च तदंगमध्यस्य सर्वदाऽऽस्थानं दद्यात् ॥ ६७ ॥
विजिगीषु को अपना आस्थान अर्थात् पड़ाव ऐसी जगह डालना चाहिए
जो पुरुष प्रमाण अर्थात् पांच-छह फुट ऊंचा हो, जहाँ बहुत अधिक नहीं
किन्तु थोड़े आदमी चल फिर सकें और आ जा सकें, उसके आगे मण्डप
के लिये विस्तृत स्थान हो—राजा सदा इस प्रकार के पड़ाव के मध्य में
स्थित हो ।
सर्वसाधारणभूमिकं तिष्ठतो नास्ति शरीररक्षा ॥ ६६ ॥
जहाँ सर्वसाधारण का आना जाना हो ऐसे स्थान पर ठहरने से शरीर
रक्षा में संशय रहता है ।
भूचरो दोलाचरस्तुरङ्गचरो वा न कदाचित् परभूमौ प्रवि-
शेत् ॥ १०० ॥