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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 220 में से

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पृष्ठ 177

षाड्गुण्यसमुद्देशः १६१
२९. षाड्गुण्यसमुद्देशः
शमव्यायामौ योगक्षेमयोर्योनिः ॥ १ ॥
शम और व्यायाम योग क्षेम के कारण हैं।
कर्मफलोपभोगानां क्षेमसाधनः शमः, कर्मणां योगाराधनो
व्यायामः ॥ २ ॥
अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त फल को भोगने में सहायक कल्याणकारी
साधनों का नाम शम है, और नवीन कर्म करने के उद्योग का नाम
व्यायाम है।
दैवं धर्माधर्मौ ॥ ३ ॥
अपना ही पूर्व जन्म का किया हुआ धर्म अथवा अधर्म, सुकृत अथवा
दुष्कृत 'दैव' है।
मानुषं नयानयौ ॥ ४ ॥
अपना ही नीतिपूर्ण अथवा अनीतिपूर्ण व्यवहार मानुष कर्म है।
दैवं मानुषं च कर्म लोकं यापयति ॥ ५ ॥
दैव और मानुष दोनों कर्मों के योग से मनुष्य का दैनिक जीवन निर्वाह
होता है।
तच्चिन्त्यमचिन्त्यं वा दैवम् ॥ ६ ॥
मनुष्य चाहे तो दैव कर्म की चिन्ता करे चाहे न करे क्योंकि वह तो
होकर ही रहेगा। अतः उसकी उपेक्षा करनी चाहिए।
अचिन्तितोपस्थितोऽर्थसम्बन्धो दैवायत्तः ॥ ७ ॥
बिना सोच विचार के प्राप्त विषयों से सम्बन्ध होना दैवाधीन है।
बुद्धिपूर्वं हिताहितप्राप्तिपरिहारसम्बन्धो मानुषायतः ॥ ८ ॥
ज्ञानपूर्वक हितकर कार्य करना और अहितकर से बचना मनुष्य के
अधीन है।
सत्यपि दैवेऽनुकूले न निष्कर्मणो भद्रमस्ति ॥ ९ ॥
दैव के अनुकूल होने पर भी बिना कर्म किये मनुष्य का कल्याण नहीं
हो सकता।
न खलु दैवमीहमानस्य कृतमप्यन्नं मुखे स्वयं प्रविशति ॥ १० ॥
दैव वादी के समक्ष उपस्थित भोजन स्वयं ही उसके मुखमें नहीं प्रविष्ट
हो जाता।
न हि दैवमवलम्बमानस्य धनुः स्वयमेव शरान् सन्धत्ते ॥ ११ ॥
दैववादी का धनुष अपने आप बाणों को नहीं चढ़ा लेता।
११ नी०

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक) · पृष्ठ 177, कुल 220 में से · SarvaKosh