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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 220 में से

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पृष्ठ 176

१६० नीतिवाक्यामृतम्
क्रीतेष्वाहारेष्विव परस्त्रीषु क आस्वादः ॥ ३९ ॥
खरीदे हुए भोजन के समान बाजारू स्त्री अर्थात् वेश्या में क्या स्वाद मिल
सकता है ?
यस्य यावानेव परिग्रहस्तस्य तावानेव सन्तापः ॥ ४० ॥
जिसका जितना बड़ा परिवार है उसको उतना ही दुःख है ।
गजे गर्दभे च राजरजकयोः सम एव चिन्ताभारः ॥ ४१ ॥
राजा और धोबी को हाथी और गदहे की चिन्ता समान रूप से
होती है ।
मूर्खस्याग्रहो नापायमनवाप्य निवर्त्तते ॥ ४२ ॥
मूर्ख पुरुष का आग्रह ( मिथ्या हठ ) बिना उसके नाश के नहीं दूर
होता ।
कार्पासाग्नेरिव मूर्खस्य शान्तावुपेक्षणमौषधम् ॥ ४३ ॥
कपास में लगी आग जिस प्रकार शान्त नहीं की जा सकती उसी प्रकार
मूर्ख का दुराग्रह नहीं दूर किया जा सकता । अतः उसकी उपेक्षा करना ही
उसकी ओषध है ।
मूर्खस्याभ्युपपत्तिकरणमुद्दीपनपिण्डः ॥ ४४ ॥
मूर्ख को समझाना उसे और उकसाना है ।
कोपाग्निप्रज्वलितेषु मूर्खेषु तत्क्षणप्रशमनं घृताहुतिनिक्षेप
इव ॥ ४५ ॥
क्रोध की आग में जलते हुए मूर्ख को तत्काल शान्त करने की चेष्टा आग
में घी की आहुति देने के समान है ।
अनस्तिकोऽनड्वानिव ध्रियमाणो मूर्खः परमाकर्षति ॥ ४६ ॥
जिस तरह बिना नकेल के बैल को पकड़ने में वह पकड़ने वाले को ही
घसीट ले जाता है उसी प्रकार कुपित मूर्ख को समझाना भी आपत्ति में
पड़ना है ।
स्वयमगुणं वस्तु न खलु पक्षपाताद् गुणवद्भवति न गोपालस्नेहा-
दुक्षा क्षरति क्षीरम् ॥ ४७ ॥
निर्गुण वस्तु किसी के पक्षपात से गुणवान् नहीं बन जाती । ग्वाले के
स्नेह से बैल नहीं दूध देने लगता ।
[ इति विवादसमुद्देशः ]